बहुत खोजने पर भी मनचाहा व्यक्ति नहीं मिलता या जो हमारे साथ वर्षों से विश्वसनीय हमराही की तरह चल रहे होते हैं, वे भी किसी बिंदु पर छिटककर अलग हो जाते हैं और हम सोचते रह जाते हैं, क्या हुआ? इतनी लंबी दोस्ती को एकाएक लकवा क्यों मार गया? अपनेपन के बड़े-बड़े दावे बीमार क्यों हो गए? गांवों, कस्बों के जाने-पहचाने सुगम रास्तों पर तो हम साथ चलते रहे, लेकिन जब हम महानगर की अनजान और बेरहम दुनिया में आए और जब हमें एक-दूसरे के साथ की बेहद जरूरत थी, तब अलग हो गए और अपनी-अपनी सुविधा की दुनिया में खोने लगे. क्यों होता है ऐसा? और क्यों होता है ऐसा कि आप अपने घर अपने में खोए हुए बैठे हैं और आपके सामने एक अजनबी आदमी आकर खड़ा हो जाता है. आप उसे देखते हैं, मन ही मन सोचते हैं -कौन है यह निपट देहाती सा आदमी. शक्ल-सूरत से गांव का, वेशभूषा में गांव का, आंखों में राग-दीप्त उर्जा और पूरे अस्तित्व में एक संकुचित शालीनता. वह पूछता है, "बिना बुलाए और सूचना दिए चला आया, क्षमा चाहता हूं. क्या आपका थोड़ा समय ले सकता हूं?"
"अरे आइए...आइए!" कहकर आप उठ खड़े होते हैं और आपके उल्लास से आगंतुक का संकोच कुछ कम होता है, वह बैठकर धीरे-धीरे अपना परिचय देता है. आपको लगता है, देहाती सा दिखने वाला वह व्यक्ति बहुत पढ़ा-लिखा है, उसने आपको भी बहुत पढ़ा है. स्तर-स्तर दूरियां टूटती हैं और परिचय की एक खुशबू उभरने लगती है दोनों ओर. पहली भेंट में ही कई घंटे बीत जाते हैं और आपको लगता है यह आदमी कुछ दूसरी तरह का है. इसके अपनेपन में सच्चाई है, सिधाई है. वह चला जाता है तो आपको लगता है, यह गया नहीं है, पहली ही भेंट में वह अपने को आप में कहीं छोड़ गया है और शायद वह आपको भी अपने साथ लिए चला गया है.
हां, प्रकाश मनु मेरे यहां ऐसे ही आए थे. जाड़े की दोपहर थी, मैं अपने बरामदे में धूप में खाट पर लेटा कुछ पढ़ रहा था. गेट पर हलकी-हलकी दस्तक सी होती महसूस हुई. देखा तीन सज्जन खड़े थे. "आइए-आइए." मैंने कहा.
"कृपया बैठिए." सामने पड़ी कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा.
"क्षमा कीजिए, बिना पूर्व सूचना के हम चले आए. आपका फोन नंबर ज्ञात नहीं था, बस, पता मालूम था." एक ने कहा.
मैंने उसकी ओर ध्यान से देखा- पैंट, आधी बांह का कुर्ता, बाल सफ़ेद, चेहरा एकदम किसानी. मैं उनके चेहरे को ध्यान से देखने लगा और वे संकोच के साथ कह रहे थे, "मेरे साथ में मित्र देवेंद्र कुमार जी हैं और ये हैं मित्र श्री रमेश तैलंग और मेरा नाम प्रकाश मनु है."
"बहुत अच्छा लग रहा है आप लोगों से मिलकर." मैंने घर में आवाज दी, "तीन गिलास पानी भेज दीजिएगा."
पत्नी पानी लेकर आई. मैंने उनसे इन लोगों का परिचय कराया. वे सहज प्रसन्न हो आईं और पूछा, "आप लोग चाय में चीनी तो लेते हैं न."
"अरे भाभी जी, यह कष्ट क्यों कर रही हैं?"
"नहीं, मैंने पूछा है चीनी लेते हैं न. मेरे सुख को कष्ट का नाम मत दीजिए."
"हां, लेते हैं." सबने स्वीकृति दी.
"डाक्टर साहब, मेरी और देवेंद्र कुमार जी की कविताओं का एक संयुक्त संग्रह आया है, आपको देना चाहते हैं."
"यह तो मेरे लिए ख़ुशी की बात है."
प्रकाश मनु ने वह संग्रह दिया. फिर परिचय का ज़रा गाढ़ा दौर चला, फिर समकालीन साहित्य पर बातें होने लगीं. मनु ने मेरी जो कविताएं पढ़ीं और पढ़ाई थीं, उनकी चर्चा छेड़ दी. जाड़े की खुशनुमा धूप में हमारी बातें बहती रही, बहती रहीं. इस प्रारंभिक परिचय में ही बहुत कुछ ऐसा था जो भविष्य की ओर संकेत कर गया था.
कुछ दिनों बाद दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित कवि उपेंद्र के घर पर मनु और देवेंद्र की कविता पुस्तक पर विचार-गोष्ठी आयोजित की गई. मैंने उसकी अध्यक्षता की. वास्तव में प्रकाश मनु और देवेंद्र कुमार की कविताओं के रंग अलग-अलग तो थे ही, उनकी उपलब्धियां भी अलग-अलग थीं. प्रकाश मनु की कविताएं कविता के रूप में कमजोर थीं. वहां उपस्थित लोगों ने इन दोनों कवियों की कविताओं को उनके सही परिप्रेक्ष्य में आकलित किया और मनु की कविताओं के आक्रोशी शोर पर आपत्ति की. मुझे याद है, मनु ने जवाब देते हुए कहा था, "यदि कोई मेरा गला दबाएगा तो मैं चिल्लाऊंगा नहीं?" मैंने कहा था, "चिल्लाइए, जरूर चिल्लाइए, लेकिन उसे कविता तो मत कहिए."
प्रकाश मनु एक ईमानदार लेखक हैं. वे जिस तरह औरों की रचनाओं पर अपनी बेबाक राय देते हैं, उसी तरह अपनी रचनाओं पर बेबाक राय सुनकर बुरा नहीं मानते, बल्कि कुछ सीखते हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि उस गोष्ठी में अपनी कविताओं के बारे में लोगों की कटु आलोचना सुनकर बुरा नहीं माना होगा. और भीतर-भीतर महसूस किया होगा कि लोग सच कह रहे हैं और उन्होंने अपनी कमजोरी से लड़ाई रखनी जारी रखी होगी.
कुछ समय बाद गिरिजाकुमार माथुर न्यास की और से उनकी स्मृति में नए कवियों की कविताओं पर एक पुरस्कार देने का निश्चय किया गया. निर्णायकों में मैं भी एक था. विचार के लिए प्रकाश मनु की नई कविता पुस्तक 'छूटता हुआ घर' भी रखी हुई थी. मुझे इस संग्रह की कविताएं देखकर सुखद आश्चर्य हुआ. ये अलग तरह की कविताएं थी, बहुत संयत और सघन भाव वाली कविताएं. पहली कविताओं का सारा उफान और आक्रोशी स्फीति गायब थी. मैं सोचने लगा, कोई अपनी आलोचनाओं से इतना सीख सकता है क्या, जितना कि मनु ने सीखा है. हम सबने इन कविताओं को पसंद किया और उसे पुरस्कृत किया.
प्रकाश मनु काम करते हैं, खूब जमकर काम करते हैं और सहज भाव से उनके काम को स्वीकृति मिलती है तो वे बहुत प्रसन्न होते हैं, लेकिन यह स्वीकृति पाठकीय प्रतिक्रिया के रूप में होनी चाहिए, इनाम इकराम के रूप में नहीं. गिरिजाकुमार माथुर सम्मान उन्हें सहज भाव से ही मिला था. उन्हें कतई पता नहीं था कि उनकी पुस्तक पर विचार हो रहा है. फिर भी जब मैंने उन्हें फोन से पुरस्कार की सूचना दी तब वे उल्लसित नहीं हुए. संकोच से बोले, "डाक्टर साहब, यह क्या हुआ? मुझ से योग्य कई लेखक पड़े हैं, पहले उन्हें मिलना चाहिए था." मुझे उनकी उदासीनता से थोड़ा बुरा भी लगा. मैंने कहा, "यहां उनके अनेक लोगों के योग्य-अयोग्य होने का सवाल नहीं था. एक सीमित अवधि में प्रकाशित जो कविता पुस्तकें उपलब्ध हुईं, उनपर विचार हुआ और आपकी पुस्तक सबको पसंद आई तो इसमें क्या किया जाए?"
"अच्छा, एक काम हो सकता. वह यह कि इस राशि का उपयोग मैं अपने लिए नहीं करूंगा, चाहूंगा कि इस राशि से मेरे कुछ समकालीन अच्छे कवियों की कविताओं का संकलन प्रकाशित हो."
"यह तो आपको तय करना है. इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है."
और उन्होंने पुरस्कार प्राप्ति के अवसर पर यह घोषणा कर दी कि वे इस राशि का उपयोग कुछ समकालीन कवियों की कविताओं के संकलन के प्रकाशन के लिए करेंगे. उन्होंने किया. उनके संपादन में इंद्रप्रस्थ प्रकाशन से 'सदी के आखिरी दौर में' नामक एक कविता-संकलन निकला, जिसमें वे कवि थे जो मुख्यधारा की पहचान से बाहर हैं, किन्तु अपनी शक्ति में उनसे कमतर नहीं हैं. मनु ने यह अच्छा काम किया. उन्हें प्राप्त पुरस्कार से अनेक कवि पुरस्कृत हो गए और पुरस्कार स्वयं व्याप्ति पा गया.
खैर, यह कुछ बाद की बात है. मनु की रचनाएं यहां-वहां दिखाई पड़ जाती थीं और मुझे महसूस होने लगा था कि वे स्वयं संकोची व्यक्ति भले हों, किंतु किसी झूठ और गलाजत के विरुद्ध खरी-खरी कहने में उन्हें न संकोच होता है, न भय. धीरे-धीरे मुझे ज्ञात हो गया था कि मनु ने शिक्षा जगत के क्रूर व्यवहार को बहुत सहा है. इतना सहा है कि अब कुछ भी सहने से भय नहीं लगता और किसी भी व्यक्ति या व्यवस्था से उन्हें झुककर पाने की लालसा नहीं है, इसलिए डर नहीं लगता और उनके भीतर का खरा मनुष्य किसी के भी किसी भी प्रकार के अमानवीय व्यवहार को बर्दाश्त नहीं करता. जहां संभव होता है, बोलता है, नहीं तो चुप रहकर स्वयं लहूलुहान होता है. जिस साहित्य-जगत के यात्री बनकर वे चल रहे हैं, उस जगत में क्या कम क्रूरताएं और कुरूपताएं हैं, कम स्वार्थ-समीकरण हैं, परिदृश्य को छोटा और असुंदर करने के क्या कम षडयंत्र हैं? वे इस जगत के बीच से गुजरते हैं, आहत होते हैं और खुलकर बोलते हैं.
धीरे-धीरे मैंने यह भी अनुभव किया कि मेरे प्रति उनका लगाव गहराता जा रहा है. मिलने पर कभी-कभी यह भी कहते रहे कि हिंदी आलोचना का जो रवैया है, उसके कारण कुरुक्षेत्र में रहते हुए मैं उन अच्छे और समर्थ कवियों को अधिक नहीं पढ़ सका, जो उस समय चर्चा में न थे. बाद में ऐसे बहुत से कवियों के जीवित संपर्क में आया, तब लगा कि मैंने कितना कुछ खोया था. इस संदर्भ में वे मुझे भी याद करते थे.
याद आ रहा है वह प्रसंग, जब उन्होंने बहुत आहत होकर 'हिंदुस्तान' में एक टिप्पणी लिखी थी. साहित्य अकादेमी से 'समकालीन हिंदी कविता' संकलन प्रकाशित हुआ. संपादक थे परमानंद श्रीवास्तव. उस संकलन में स्वयं परमानंद तो थे और बहुत मजे में थे, किंतु मुझ समेत अन्य अनेक कवि नहीं थे, क्योंकि उन कवियों पर साहित्य के आईएसआई का ठप्पा नहीं लगा था. ठप्पा तो स्वयं परमानंद के कवि पर भी नहीं लगा है, किंतु वे संपादक थे, तो उन्हें उसमें घुसने से कौन रोक सकता था? यह बात अलग है कि वे संपादक बनाए गए थे, आईएसआई की ही मेहरबानी से. सो प्रकाश मनु विचलित हो गए और इस संग्रह की विसंगतियों पर जमकर प्रहार कर दिया. इस संग्रह में कुछ विशिष्ट कवियों को अनुपस्थित कर दिए जाने की चालाक हरकत उन्हें नागवार गुजरी और खुलकर विरोध किया. उसके बाद उनके स्वर में विरोध के और स्वर मिल गए.
दरअसल यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा था. यह संकलन किसी बनिया की दुकान से नहीं छपा था कि जिसे चाहो लो, जिसे चाहो छोड़ो की छूट मिल जाए. यह साहित्य अकादेमी जैसी एक राष्ट्रीय संस्था से प्रकाशित हुआ था. अतः एक मामूली से संपादक को इतनी मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती.
मुझे एक ओर प्रकाश मनु की सघन होती सारस्वत साधना सुख दे रही थी, दूसरी ओर मेरे प्रति निरंतर व्यापक और गहन होती उनकी आत्मीयता मुझे बहुत कुछ दे रही थी. हम लोग आत्मीयता के उस बिंदु पर पहुंच गए थे, जहां पहुंचकर प्रायः मिलने की इच्छा होती रहती है और कई दिन तक साक्षात या दूरभाषीय संपर्क न होने पर खालीपन लगने लगता है. मैं जब भी शहर की ओर निकलता, मनु के दफ्तर पहुंच जाता. कभी वैसे भी उनसे मिलने निकल जाता. कभी वे दफ्तर जाने से पूर्व सुबह-सुबह मेरे घर पहुंच जाते और हम जब भी मिलते, कुछ बतियाते और खूब हंसते रहते. बातें, कहकहे ही कहकहे.
हमारे उनके बीच कभी यह संकट आया ही नहीं कि आखिर बात किस विषय पर की जाए. साहित्य से लेकर घर-परिवार तक न जाने कितने विषय एक दूसरे में से निकलते चले जाते थे. हमारे साझे के न जाने कितने स्मरणीय दिन अंकित हैं यहां-वहां. और वह दिन तो कितना मूल्यवान था जिस दिन मनु सुबह-सुबह फरीदाबाद से मेरे मकान पर आ धमके थे और दिन भर एक लंबा साक्षात्कार चलता रहा- चाय के साथ, नाश्ते के साथ, भोजन के साथ, कमरे में, लान में, पास के छोटे से उद्यान में बैठे हुए हम लोगों के बीच भावों और विचारों की गुनगुनी नदी बह रही थी.
अद्भुत बात यह थी कि वहां साक्षात्कार की कोई औपचारिकता नहीं थी, बस अनौपचारिक रूप से वार्ता बह रही थी और मनु जी सहज ही सबको अपनी स्मृति में समेट रहे थे. जब वह लंबा साक्षात्कार छपा तो मैं चकित था कि इतनी सारी बातें मनु ने बिना लिखे ही अपने में समेट ली थीं और वह साक्षात्कार एक तरह से मेरी छोटी सी, किंतु संपूर्णता का आभास देती हुई जीवन-कथा बन गया था. यह साक्षात्कार 'वैचारिकी' में छपा था- और यही क्यों, प्रकाश मनु द्वारा लिए गए अनेक लेखकों के खूब लंबे साक्षात्कार छपे थे. मनु ने इन लेखकों को अनेक व्यक्तिगत एवं साहित्यिक सवालों के रू-ब-रू किया था और उन्हें खूब जमकर खुलने के लिए बाध्य किया था. अतः ये साक्षात्कार हमारे साहित्य की निधि बन गए हैं जो उनकी पुस्तक 'मुलाकात' में संगृहीत हैं. सच पूछिए तो प्रकाश मनु ने साक्षात्कार विधा को बहुत जीवंतता और अनौपचारिकता प्रदान की.
प्रकाश मनु की अपनी पसंद-नापसंद है जो उनकी मानवीय और मार्क्सवादी दृष्टि से संचालित है, लेकिन वे अपनी पसंद-नापसंद लेकर किसी रचना के पास नहीं जाते. वे किसी भी रचना के पास रचना के होकर जाते हैं, उसमें गहरे उतरते हैं, तब उसे पसंद या नापसंद करते हैं. नापसंद रचना को भी उसका अपना प्राप्य देते हैं और पसंद रचना की भी सीमाओं और अंतर्विरोधों को उजागर करने में नहीं हिचकिचाते. सच पूछिए तो वे उन लेखकों और आलोचकों में हैं जो साहित्य के परिदृश्य को बड़ा करते हैं, जहां कहीं जो कुछ लिखा जा रहा है, यथासंभव उससे गुजरना चाहते हैं और कहना चाहते हैं, "देखो कुछ लोगों ने मिलकर आपस में एक-दूसरे को बड़ा बनाकर शेष जगत को हाशिए पर या हाशिए से बाहर डाल रखा है, किंतु यह सच तो नहीं है. सच तो यह है कि उसकी दुनिया से बाहर काफी कुछ लिखा गया है और बहुत अच्छा लिखा गया है. कितना अच्छा लिखा गया है, देखो मैं तुम्हें दिखाता हूं."
उन्होंने समकालीन कहानियों पर लेख लिखा, उत्तरशती के उपन्यासों पर पुस्तक लिखीं और उन अनेक कहानियों और उपन्यासों के महत्त्व को रेखांकित किया जो अपनी बड़ी अस्मिता के बावजूद साहित्य के महंतों द्वारा उपेक्षित थे. मनु खूब पढ़ते हैं और जो पढ़ते हैं उसे गुनते हैं, उस पर प्रायः समीक्षाएं लिखते हैं, लेकिन वे अलग तरह के समीक्षक हैं. समीक्षा के पारंपरिक ढर्रे पर चलने वालों को यह समीक्षा नहीं लगती. बात यह है कि प्रकाश मनु अनौपचारिक और सर्जनात्मक ढंग से समीक्षा लिखते हैं. लगता है, बातचीत करते हुए चल रहे हैं. इनकी सीमाएं बहुत खुली हुई होती हैं और उनका अपना रस होता है. अनौपचारिकता की प्रक्रिया में रह-रहकर उनकी व्यक्ति व्यंजक प्रतिक्रियाएं भी उभर आती हैं और धनात्मक या निषेधात्मक अतिरेकवादी स्वर उभर आते हैं. सब कुछ अच्छा चल रहा है, किंतु कहीं कुछ ऐसा आ गया जो उन्हें पसंद नहीं तो कह उठेंगे, "सब चौपट हो गया." कभी अपने शीर्षक में ही किसी को प्रेमचंद के बाद का सबसे बड़ा कहानीकार कह देंगे या ऐसे ही बहुत कुछ. इसके पीछे उनकी अपनी पसंद तो होती ही है, यह कसक भी होती है कि इतने ताकतवर लेखक की उपेक्षा की गई है तो उसके बारे में बोलना है तो जरा कम जम के बोलो.
हां, निश्चय ही मनु जी ने यह बड़ा काम किया है कि कई लेखकों के महत्त्व की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया. इस संदर्भ में देवेंद्र सत्यार्थी और शैलेश मटियानी का नाम लिया जा सकता है. सत्यार्थी जी तो साहित्य के परिदृश्य से विलुप्त ही कर दिए गए थे. प्रकाश मनु ने उन पर लिखा, उनकी पुस्तकें संपादित कीं, उन पर पुस्तकें लिखवाईं और उनके परिवार में धंसकर उसके लिए प्रसन्नता का कारण बने. इसी प्रकार शैलेश मटियानी पर बहुत मन से काफी लिखा-लिखाया. उन्हें प्रेमचंद के बाद का सर्वाधिक सशक्त कहानीकार घोषित किया. मेरे और मेरे साहित्य पर भी बहुत लिखा- बहुत डूबकर लिखा. उनके मन में मेरे और मेरे लेखन में जहां कहीं कमजोरी दिखाई पड़ी, उसे भी कहने से नहीं चूके, बल्कि खुलकर कहा और मेरे प्रति उनके लगाव का ही परिणाम है कि मेरे 80वें जन्मदिवस पर वाणी प्रकाशन से उनकी पुस्तक आई, 'रामदरश मिश्र: एक अंतर्यात्रा.'
प्रकाश मनु खूब पढ़ते हैं और उनमें निश्चय ही प्रतिभा की बड़ी तेजस्विता है. उनके भीतर आस-पास की जिंदगी के दुखों और संघर्षों से उपजे अनुभवों का पुंज है, और है एक गहरी संवेदना तथा मूल्य-दृष्टि. इसके तहत उनकी कविताएं आईं, कहानियां आईं, उपन्यास आए. विधा कोई भी हो, प्रकाश मनु अपने लेखन में अलग से दिखाई पड़ते हैं. उनकी भाषा अलग है, शैली अलग है और कथ्य तो उनका अपना है ही इसलिए उनमें खांटी जिंदगी का रस प्राप्त होता है. पढ़ते जाइए, कहीं कोई उलझन नहीं, सर्वत्र एक खुलापन और उस खुलेपन के भीतर दर्द और सामाजिक विसंगतियों तथा उजास की परतें.
उन्होंने तीन उपन्यास लिखे, तीनों के अपने-अपने रंग हैं, लेकिन सबमें अपना समय समाया हुआ है. मूल्यवादी कहे जाने वाले साहित्य के क्षेत्र की अनंत विसंगतियां एवं मूल्यहीनताएं इन उपन्यासों में व्याप्त हैं. 'यह जो दिल्ली है' बहुत ही प्रभावशाली उपन्यास है. 'कथा सर्कस' अपने आकार में महाकाव्यात्मक है और साहित्य जगत की विराट भूमि पर यात्रा करता है, किंतु बिखर गया है, फ़ैल गया है. वह तमाम लीलावादी लेखकों को सामने रखकर बैठा है. केंद्रीय कथा इतनी प्रभावशाली है कि अनावश्यक और अवांतर प्रसंगों से उसका घिरना तकलीफ देता है. मनु भी इसे स्वीकारते हैं और इस प्रयत्न में हैं कि उसकी मूल कथा के सूर्यीय प्रकाश को तमाम अनावश्यक प्रसंगों के राहु-केतुओं से मुक्त किया जाए. बाल साहित्य पर भी प्रकाश मनु का कार्य अत्यंत मूल्यवान है. उन्होंने अंधकार में खोए और बिखरे हुए बाल साहित्य को संचित किया है और उसका प्रामाणिक इतिहास लिखा है.
अच्छा है कि प्रकाश मनु मंच से लगाव नहीं रखते हैं. मंच से कुछ बोलना भी होता है तो लिखकर लाते हैं और इस तरह उनका श्रम वाणी का जादू बनकर हवा में खो नहीं जाता, बल्कि सदा के लिए कागज़ पर अंकित हो जाता है. अतः उनकी वाणी भी उनके लेखन के साथ ही चलती है. उन्होंने इस रूप में अनेक गोष्ठियों से शिरकत की है और उस शिरकत को अपने ग्रंथों से जोड़ दिया है. प्रकाश मनु मंच के वक्ता भले न हों, लेकिन लेख पढ़ते समय उनकी वाणी में ओज भर आता है. जहां आवश्यक होता है वहां वे साहित्यिक और सामाजिक विसंगतियों को ललकारते से लगते हैं. प्रकाश मनु को आप यों देखिए तो शांत भाव से बैठे दिखाई पड़ेंगे. फोन कीजिए तो थोड़ा ठहरकर धीमी आवाज में कहेंगे, 'हेलो.' लेकिन बात शुरू होते ही उनकी आवाज ऊपर चढ़ने लगेगी और हंसी-कहकहों में बदल जाएगी. बातचीत में भी उनकी आवाज मंद सुर में शुरू होगी, कुछ ठहरकर चलेगी, फिर काफी तेज हो जाएगी और प्रवाह में आ जाएगी.
प्रकाश मनु बहुत ही संवेदनशील हैं. किसी के भी दुःख से आर्द्र हो जाते हैं, रोने लगते हैं. अपने अग्रज लेखकों के लिए मन में बहुत सम्मान भाव है. उन्हें याद करते हुए उनकी आंखें भीग जाती हैं. कई बार तो उनपर लेख पढ़ते हुए इतने भावुक हो जाते हैं कि गोष्ठी में ही उनकी आंखें बरसने लगाती हैं, गला भर आता है. प्रकाश मनु के साथ दिल्ली में मेरा समय तो बीता ही है. हमने एक बार साथ साथ कानपुर की भी यात्रा की थी. एस.एन. बाल विद्यालय के प्रबंधक अरुण प्रकाश अग्निहोत्री के आमंत्रण पर हम लोग कानपुर गए थे. मनु और मैं एक ही कमरे में ठहरे थे. हमारी वह यात्रा तमाम छोटे-छोटे सुखों से स्पंदित हो आई थी.
उसी अवसर पर मुझे कानपुर विश्वविद्यालय में एक मौखिकी लेनी थी. मनु साथ हो लिए. शोध-छात्रा ने किसी आंचलिक उपन्यास पर काम किया था. जब मैं औपचारिक रूप से बात कर चुका, तब प्रकाश मनु अनौपचारिक रूप से एक बात पूछ दी, "आपने 'जल टूटता हुआ' पढ़ा है?" उसने 'नहीं' में सिर हिलाया तो मनु उत्तेजित हो उठे. आपने एक आंचलिक उपन्यास पर काम किया है, तो क्या केवल उसी को पढ़ना पर्याप्त था. आंचलिक उपन्यास के पूरे परिदृश्य की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक नहीं लगा. और क्या यह परिदृश्य 'जल टूटता हुआ' के बिना पूरा होता है?"
वह महिला तो घबरा ही गई, मैं भी संकोच में पड़ गया. बोला, "अरे, छोड़िए मनु जी, इन्होंने 'जल टूटता हुआ' नहीं पढ़ा तो क्या हो गया?"
"अरे नहीं डाक्टर साहब, हुआ क्यों नहीं? आपका उपन्यास है तो आपको संकोच होना स्वाभाविक है, परंतु यह एक साहित्यिक मुद्दा है, उठना ही चाहिए."
"ठीक है आप जाइए." मैंने महिला से कहा और अपने को संकोच से मुक्त किया.
मैंने अपनी लंबी जीवन-यात्रा में अनुभव किया है कि बहुत से लोगों की दोस्ती और दुश्मनी इकहरी होती है. यानी वे चाहते हैं कि जिसे वह पसंद करता है, उसे दोस्त भी पसंद करें, जिससे उनकी दुश्मनी है, उससे दोस्त की भी दुश्मनी हो, यह बहुत घटिया और अव्यावहारिक सोच है. मैं इसे पसंद नहीं करता. मेरे बहुत से ऐसे अच्छे मित्र और आत्मीय हैं, जो उन्हें खूब पसंद करते हैं पर जो मुझे बिल्कुल भी नहीं चाहते या वे उन्हें बिल्कुल नहीं चाहते, जिन्हें मैं खूब चाहता हूं. लेकिन इस बात का तनिक भी मलाल मुझमें नहीं व्यापा. सोचता रहा कि वे मेरे मित्र हुए तो क्या हुआ, दूसरों के बारे में उनकी अपनी पसंद-नापसंद है और उन्हें इस बात का पूरा अधिकार है.
मैं महसूस करता रहा हूं कि मनु भी कुछ ऐसा ही सोचते-विचारते हैं. कई लोग हैं जिन्हें वे खूब चाहते हैं और वे लोग मुझे खूब नापसंद हैं, किंतु मनु उनके भी घने मित्र हैं और मेरे भी. जहां तक संभव हो सकता है, ऐसी स्थितियों में वे पुल बनाने की कोशिश करते हैं. यानी मुझसे उनकी और उनसे मेरी तारीफ करेंगे और यह भी कहेंगे की वे आपकी अमुक रचना की प्रशंसा कर रहे थे. शिकायत करना उनके स्वभाव में नहीं है, क्योंकि शिकायत पीठ पीछे की जाती है. वे तो अपनी नापसंद, संबद्ध व्यक्ति के सामने ही व्यक्त कर देते हैं. नहीं कर पाते तो अपनी चुप्पी से ही संकेत दे देते हैं. ऐसे लोगों के विरोधी कम नहीं होते. मनु के भी हैं, किंतु उनकी परवाह उन्हें नहीं है. उन्हें परवाह अपने कुछ उन आत्मीय लोगों की होती है जिन्हें वे सच्चा और संवेदनशील मानते हैं. वे उनके भीतर के उजास को सहेजकर एक छोटी सी ही सही, प्यारी दुनिया बनाना चाहते हैं और उसमें चलते रहना चाहते हैं.
हां, तो शुरू में ही जो बात कहते-कहते मैं रह गया था, वह यह थी कि कभी-कभी एक दिन अचानक मिल जाने वाले लोग आपके कितने अपने हो जाते हैं और विश्वास दिलाते से लगते है कि कोई बात नहीं, आपके अपने कहे जाने वाले लोग अब आपके साथ नहीं हैं तो क्या हुआ, हम तो हैं न!
**
वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु ने आज जीवन के तिहत्तर वर्ष पूरे कर चौहत्तरवें वर्ष में प्रवेश किया है. इस अवसर पर पढ़िए वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर रामदरश मिश्र का लिखा यह विशेष संस्मरण लेख.
संपर्कः डॉ रामदरश मिश्र, आर-38, वाणी विहार, उत्तम नगर, दिल्ली-110059