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जयंती विशेषः क्लीव और बौनों की दुनिया पर राजेन्द्र यादव

अफ़सरों और सांसदों की कोठियों से लेकर दस-दस मंज़िले एम्प्लायमेंट एक्सचेंजों के दरवाज़ों के सामने एड़ियां रगड़ती भीड़ है...जो कुछ कर-दिखाने के साहसहीन, साधनहीन सपने देखकर, अपने को निर्ममता से तोड़कर बेच देती है...

 राजेन्द्र यादव और एक दुनिया: समानान्तर का आवरण-चित्र राजेन्द्र यादव और एक दुनिया: समानान्तर का आवरण-चित्र

कथाकार, संपादक राजेन्द्र यादव की आज जयंती है. हिंदी साहित्य की कई पीढ़ियों को अपने विचारों और लेखों से झकझोरने वाले यादव ने अपनी संपादकीय कुशलता से 'हंस' पत्रिका को एक ऊंचाई तो दी ही, कई नए रचनाकारों को भी अवसर दिया. 28 अगस्त, 1929 को आगरा में पैदा हुए यादव ने हिंदी से स्नातकोत्तर किया और लेखन से जुड़ गए. आपकी चर्चित प्रकाशित पुस्तकों में देवताओं की मूर्तियाँ, खेल-खिलौने, जहाँ लक्ष्मी कैद है, अभिमन्यु की आत्महत्या, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, ढोल और अपने पार, चौखटे तोड़ते त्रिकोण, वहाँ तक पहुँचने की दौड़, अनदेखे अनजाने पुल, हासिल और अन्य कहानियाँ, श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ (कहानी-संग्रह); सारा आकाश, उखड़े हुए लोग, शह और मात, मन्नू भंडारी के साथ 'एक इंच मुस्कान', 'मंत्र-विद्ध और कुलटा' 'उपन्यास; आवाज तेरी है कविता-संग्रह; कहानी: स्वरूप और संवेदना, प्रेमचन्द की विरासत, अठारह उपन्यास, काँटे की बात (बारह खंड), कहानी: अनुभव और अभिव्यक्ति, उपन्यास: स्वरूप और संवेदना (समीक्षा-निबन्ध-विमर्श); वे देवता नहीं हैं, एक दुनिया: समानान्तर, कथा जगत की बागी मुस्लिम औरतें, वक्त है एक ब्रेक का, औरत: उत्तरकथा, पितृसत्ता के नए रूप, पच्चीस बरस: पच्चीस कहानियाँ, मुबारक पहला कदम (सम्पादन); औरों के बहाने (व्यक्ति-चित्र); मुड़-मुड़के देखता हूँ... (आत्मकथा); राजेन्द्र यादव रचनावली (15 खंड) शामिल है. प्रेमचन्द द्वारा स्थापित कथा-मासिक 'हंस' का अगस्त, 1986 से 27 अक्टूबर, 2013 तक सम्पादन करने के अलावा आपने चेखव, तुर्गनेव, कामू आदि लेखकों की कई कालजयी कृतियों का अनुवाद भी किया. आपका निधन 28 अक्टूबर, 2013 को हुआ.

आज राजेन्द्र यादव की जयंती पर उनकी लिखी यह भूमिका 'एक दुनिया: समानान्तर' पुस्तक से ली गई है. आधुनिक साहित्य की सबसे अधिक सशक्त, जीवन्त और महत्त्वपूर्ण साहित्य विधा -कहानी- को लेकर इधर जो विवाद, हलचलें, प्रश्न, जिज्ञासाएं और गोष्ठियां हुई हैं, उन सभी में कला-साहित्य के नये-पुराने सवालों को बार-बार उठाया गया है. कथाकार राजेन्द्र यादव ने पहली बार कहानी के मूलभूत और सामयिक प्रश्नों को साहस और व्यापक अन्तर्दृष्टि के साथ खुलकर सामने रखा, देशी-विदेशी कहानियों के परिप्रेक्ष्य में उन पर विचार और उनका न विवेचन किया. बहुतों की अप्रसन्नता और समर्थन की चिंता से मुक्त, यह गंभीर विश्लेषण जितना तीखा है, उतना ही महत्त्वपूर्ण भी. लेकिन उन कहानियों के बिना यह सारा विश्लेषण अधूरा रहता जिनका जिक्र समीक्षक, लेखक, सम्पादक, पाठक बार-बार करते रहे हैं; और जिनसे आज की कहानी का धरातल बना है. निर्विवाद रूप से 'एक दुनिया: समानान्तर' की भूमिका ने कथा-समीक्षा में भीषण उथल-पुथल मचायी थी और मूल्यांकन को नये धरातल दिये थे. तो पढ़िए इस चर्चित- भूमिका को.

पुस्तक अंशः 'एक दुनिया: समानान्तर'

हिंदी कथाकार की यह समस्या बीसवीं शताब्दी के ठीक मध्य से शुरू होती है, जहां विश्व- आकाश पर एक महायुद्ध लटका हुआ है; और यह महायुद्ध हमारे बौद्धिक, मानसिक, आर्थिक या राजनीतिक प्रेरणा देने वाली दुनिया के इतिहासों को ठीक बीच से काट देता है- और हमारे सारे दिशा-ध्रुव अपनी-अपनी जगहें बदलने लगते हैं.
युगों की पराधीनता के बाद किसी देश का स्वतंत्र होना ही अपने आप में बहुत बड़ी घटना है, फिर अपने यहां तो इस घटना के साथ ही देश का विभाजन भी जुड़ा है...शरणार्थियों और विस्थापितों के वे काफ़िले जुड़े हैं जो भूखे-प्यासे, ख़ून से लथपथ एक देश से दूसरे देश में आए; वे सारी हत्याएं और नृशंसताएं भी जुड़ी हैं जो दोनों देशों के लोगों को भुगतनी पड़ीं; लाखों लोगों के अतीत की जलती चिताएं जुड़ी हैं जहां पिछला सब कुछ, सभी कुछ भस्म हो गया... अच्छा भी और बुरा भी... तेज़ी से विघटित होते जीवन-मूल्यों के भू-कम्प जुड़े हैं.
साथ ही खुले आसमान और फैली धरती के बीच आ पड़े लोगों की, सिर पर छत तलाश कर लेने की वह बेचैनी आती है जिसमें पौरुष, प्रयत्न और आपा-धापी का अजीब सम्मिश्रण है. रहने के लिए घर बनाने हैं, जीविका के साधन खोजने हैं और साथ ही उन स्वतंत्र देशों के बीच अपना व्यक्तित्व भी स्थापित करना है, जिनकी बिरादरी में हम अब सगर्व शामिल हो गए हैं. सबसे प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक गौरव के दयनीय खोखलेपन से आक्रांत- ऑब्सेस्ड- इस नए राष्ट्र से सबको सहानुभूति है, इसलिए सब हमें हमदर्दी और सम्मान देते हैं. किसी ने हमें उधार और दान पैसा दिया है, किसी ने गेहूं और चावल; कोई हमें टेक्नीकल मदद, मशीनें और माल देता है तो कोई अपने विशेषज्ञ भेजता है; सांस्कृतिक और वैज्ञानिक डेलीगेशनों का तो जैसे तांता ही बंध गया है... और इन पिछले दस-पंद्रह वर्षों में हमारे देखते-देखते कहीं 'एशिया का सबसे बड़ा बांध' बन गया है, कहीं 'दुनिया की सबसे बड़ी नहर' निकल आई है, कहीं स्काई-स्क्रैपर्स उठे हैं तो कहीं आसमान-छूते पहाड़ उड़ा दिए गए हैं... आधुनिकतम फ़ॉर्म, शोध और प्रयोगों के बड़े-बड़े संस्थान, यूनिवर्सिटियां, बड़ी-बड़ी मिलें, वृहदाकार कारख़ाने, प्लांट और प्रोजेक्ट, सड़कें और रेलें, मेले और नुमाइशें, उत्सव और जयंतियां, अकादमियां और ट्रस्ट, मीटिंगें और कांफ्रेंसें, कमेटियां और कमीशन, चुनाव और प्रेस... पंचवर्षीय योजनाओं के सिलसिले... उत्थान और प्रगति की दिशा में आशा और उत्साह-भरे क़दम... भीतरी और बाहरी ख़तरों से लड़ते हुए निरन्तर बढ़ते जाने का संकल्प; हर कमज़ोरी और दुर्बलता से लड़ने की कटिबद्धता, अधिक-से-अधिक आत्म-निर्भर होने की जी-तोड़ कोशिशें...सूचनाओं और प्रसार के बड़े-बड़े वाक्य हैं जो सारे आसमान पर इस सिरे से उस सिरे तक एक-दूसरे को काटते हुए मँडरा रहे हैं, किसी बड़ी फ़िल्म के ट्रेलर की तरह, कभी ऊपर से और कभी नीचे से धमाके के साथ एक नई सनसनी सामने रख दी जाती है और आप उसे समझें-समझें तब तक एक बड़ी विज्ञापन-लाइन के साथ दूसरी सनसनी आ-जुड़ती है...प्रजातांत्रिक तरीक़ों से समाजवादी व्यवस्था का प्रयोग!...और सब मिलाकर कुछ ऐसा होता रहा है कि दुनिया के बड़े-से-बड़े देश ने भारत को साथ लेने में उत्साह दिखाया है. सभी यहां आए हैं और सभी ने हमें बुलाया है, हमारी प्रगति और परम्परा की प्रशंसा की है, प्रतिभा और परिश्रम का लोहा माना है, समान स्तर पर औद्योगिक और राजनीतिक सम्पर्क रखे हैं...
लेकिन इसी दुनिया में रहता है एक और व्यक्ति, और वह कलाकार है...या कहें, कलाकार होने की मज़बूरी के अभिशाप को ढो रहा है. उसे इस दुनिया से बेहद-बेहद नफ़रत है...यह सारी चमक-दमक, शोर-शराबा, दिखावा और ग्लैमर उसे ज़्यादा दुखी करते गए हैं; अकेला काटते गए हैं और सब कुछ उसे अछूता और अनछुआ छोड़ गया है.
उसके सामने की दुनिया तो बिलकुल ही दूसरी है...और ये ताश के महल जितने ऊंचे होते जाते हैं, उसका दिल धसकता जाता है- कब निचला पत्ता अपनी जगह से ज़रा-सा सरक जाए. और जो दुनिया उसके सामने है, वह उसकी कहानियों, उपन्यासों, कविताओं, चित्रों में उभर रही है और सब मिलाकर एक ही बड़े चित्र के डिटेल्स भरते चले जाते हैं...तोरण-पताकाओं के ऊपर ग़ुब्बारे और आतिशबाज़ियों के सुनहरे सितारे नाच रहे हैं, कदली-स्तम्भों और बन्दनवारों के ऊपर सतरंगे बल्ब हैं, शंखों और लाउडस्पीकरों में होड़ लगी है और कैमरों की कौंधती बिजलियों में आंखें खोलना मुश्किल है; लेकिन यह सब तो उस चित्र की पृष्ठभूमि है...सामने पूरे कैनवास पर छाया हुआ बैठा है एक नौजवान...माथा झुकाए, घुटनों पर कुहनियां टिकाए, हथेलियों में सिर पकड़े, हताश, दिशाहारा-पस्त, बीमार...हर बार कलाकार की कूंची इसी व्यक्ति की कुछ और करुण रेखाओं को उभार देती है; हर बार कहीं एक और जगह टूटने की चटख सुनाई देती है, हर बार उसकी दृष्टि कहीं कुछ संवेदनशील के मर जाने का समाचार लाती है...अजीब पराजय है, अजीब भाग्यवाद है कि यह 'बूढ़ा-युवक' हाथ पर हाथ धरे किसी चमत्कारी घटना की प्रतीक्षा में बैठा है और जो कुछ आस-पास हो रहा है, उसे सब झूठ-फ़रेब, दग़ाबाज़ी और धोखा लगता है; झल्लाहट से भर जाता है....
"कहते हैं: युद्ध से सबसे भीषण नुक़सान, विध्वंस और हत्याओं के रूप में नहीं होता, एक और रूप में होता है. देश का सारा श्रेष्ठ, सुन्दर और स्वस्थ तो युद्ध की लपटों में स्वाहा हो चुकता है, बच जाती है जूठन...हट्टे-कट्टे नौजवान युद्ध में खपते चले जाते हैं, बच जाते हैं बूढ़े, बीमार, घायल और असमर्थ पुरुष—आनेवाली पीढ़ी के पिता बनने के लिए. इस प्रकार पूरी एक जाति का भयानक ह्रास हो जाता है... आनेवाली पीढ़ी बौनी और क्लीव होती है... लेकिन कैसा क्रूर है स्थिति का यह व्यंग्य कि जिन देशों ने सचमुच युद्ध लड़े हैं, जिस धरती ने ध्वंस और नाश को अपनी आंखों देखा और भोगा है वहां क्रुद्ध और आहत पीढ़ियां जागती हैं; और जहां यह सब नहीं हुआ वहां वास्तविक युद्ध के बाद का डिप्रैशन है... वहां की नौजवान पीढ़ी बूढ़ी और निर्वीर्य है... लगता है उसका कोई भविष्य नहीं है..."
बारहा कथाकार ने ख़ुद अपने आपसे और दूसरों ने उससे पूछा है कि क्यों नहीं देश के नव-निर्माण, उत्थान और प्रगति में वह भी अपनी सामाजिक, नागरिक और तात्कालिक ज़िम्मेदारी निभाता? क्यों नहीं कर्म के इस उल्लास और आह्लाद को अपनी लेखनी समर्पित करता जो देश के हर ख़म और ख़ामी को भर रहा है? स्वतंत्र राष्ट्र का एक जीवन्त युवक क्यों नहीं उसकी पंक्तियों से झांकता? क्यों नहीं कहीं कुछ भी उजला उसे दीखता, महान और महत् उसकी निगाहों में आता? और अक्सर उस पर आरोप लगाया गया है कि वह अपनी ज़िम्मेदारी से भागता है. वह किसी मानसिक असन्तुलन और रोग का शिकार है कि हर उत्सव और त्योहार देखकर भीतर से कुढ़ता और ग़मग़ीन हो जाता है...वह गला फाड़कर यह भी नहीं चीख़ पाता कि यह सब झूठ है! नक़ली है! फ़रेब है!...असलियत जो है उसे मैं जानता हूं, उसे मैं भोगता हूं...
और जिस असलियत को वह जानता-भोगता है, वही सब तो उसकी कहानियों में फैल गई है; जिस यातना में वह जीता है वही तो ज़हरीली लहर की तरह उसके चेहरे की हर रेखा से बोलने लगती है...जो दुनिया उसके भीतर कुलबुला रही है, वही तो सारे रेशमी गिलाफ़ फाड़कर बाहर झांकने लगती है; लेकिन जिसके भीतर ख़ुद झांकते डरता है...वहां खुर्राट, झूठे, मक्कार, स्वार्थी, रिश्वतखोर, अहंकारी, धन-लोलुप, व्यभिचारी लोगों का राज है और सरल, ईमानदार, उत्साही, प्रतिभावान, महत्त्वाकांक्षी युवक पीढ़ी बेकार और फ़ालतू भटकती है...अफ़सरों और सांसदों की कोठियों से लेकर दस-दस मंज़िले एम्प्लायमेंट एक्सचेंजों के दरवाज़ों के सामने एड़ियां रगड़ती भीड़ है...जो कुछ कर-दिखाने के साहसहीन, साधनहीन सपने देखकर, अपने को निर्ममता से तोड़कर बेच देती है...जिस झूठ और ग़लत की शिकार है उसी का अंग बन जाने की मज़बूरी के साथ समझौता कर लेती है और आत्मा में अपराध और पाप का नासूर लेकर उसे भूल जाने का ढोंग करती है...भीतर के मरते हुए की कराहट और चीख़ों को राजनीतिक और सांस्कृतिक मनोरंजनों की कान-फोड़ माइक-ध्वनियों में भुला देना चाहती है. एक-दूसरे को शंका और आशंका-भरी निगाहों से देखती है और आरोप और अपराध को दूसरों पर डालकर आपस में निगाहें चुराती हैं; उस स्तर पर मिलते डरती है और एक-दूसरे से दिन-ब-दिन अपरिचित और दूर होती जाती है...जो कुरसी पर बैठा है और जो फुटपाथ पर खड़ा है, दोनों अपने को फ़ालतू और अजनबी महसूस करते हैं. जहां वह है, वह उसका प्रतीक्षाकाल है; क्योंकि वह मनलायक़ नहीं है, उसे अपनी असली योग्यता का सही उपयोग वहां नहीं, कहीं और करना है; और साथ ही वह यह भी अच्छी तरह जानता है कि कभी कोई ट्रेन नहीं आएगी और वह ज़िन्दगी-भर यों ही प्लेटफ़ॉर्म पर बैठा रहेगा...अजीब खिझलाहट है और इस सब में परिवार ढह रहे हैं, सम्बन्ध टूट रहे हैं और सह-भावना निरवधि काल के लिए निष्कासित हो गई है...
क्लीव और बौनों की यह दुनिया, यह क्षुद्र और घिनौना संसार जितना अस्वीकार्य है, उतना ही सच भी है...लेकिन कथाकार अपने को इसी दुनिया का अंग मानने को मज़बूर है, उसका अंग होने का अभिशप्त जिम्मेदार है
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पुस्तकः 'एक दुनिया: समानान्तर'
संपादकः राजेन्द्र यादव
विधाः कथा
भाषाः हिंदी
प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 210 पेज

 

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