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पुस्तक अंशः कैंसर ट्रेन, जिंदगी की जंग लड़ते पंजाबियों की दास्तान

जानें- कैसा है पंजाबी कथा-साहित्य में नछत्तर का लिखा हुआ उपन्यास कैंसर ट्रेन

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उपन्यास कैंसर ट्रेन (फोटो:आजतक)
उपन्यास कैंसर ट्रेन (फोटो:आजतक)

पंजाबी कथा-साहित्य में नछत्तर की अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है. उनका जन्म 20 मार्च,1950 को पंजाब के बरनाला में हुआ. हिंदी साहित्य प्रेमी भी उन्हें बखूबी जानते हैं. नछत्तर ने जहां अपनी कहानियों से पंजाबी कथा साहित्य में अपना अलहदा मुकाम बनाया, वहींहिंदी की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में अपनी अनूदित कहानियों और उपन्यासों से भी वह बखूबी पहचाने जाते हैं. पंजाबी में उनके अब तक छह कहानी संग्रह और छह उपन्यास छप चुके हैं. 'अंधेरी गलियां' और'स्लोडाउन' नामक उनके उपन्यास अपनी विशिष्ट शैली और भिन्न कथावस्तु के चलते काफी चर्चित रहे.

 

साल 2017 में अपनी पुस्तक 'स्लोडाउन' के लिए नछत्तर को साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया. उनके ये दोनों उपन्यासशहरी जीवन की त्रासदी से जुड़े थे, पर नया उपन्यास 'कैंसर ट्रेन' पंजाब के मालवा क्षेत्र केउन गांवों के गरीब लोगों की त्रासदी को रेखांकित करता है, जो पिछले कई वर्षों से कैंसर जैसी भयानक बीमारी कीभीषण मार झेल रहे हैं. नछत्तर का यह उपन्यास एक तरफ ग्रामीण जनता की पीड़ा और संघर्ष को उजागर करता है, तो दूसरी तरफ मदद के नाम पर चल रही सियासीनौटंकी की भी पोल खोलता है.

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इस उपन्यास को लिखने के लिए लेखक ने पंजाब के कैंसर पीड़ित गांवों की बहुतेरी यात्राएं कीं, पीड़ितलोगों से संवाद किया और अब तक हुए तमाम सर्वे और रिपोर्टों को खंगाला. इस दौर में जिस सच्चाई ने नछत्तर की लेखकीय चेतना को स्पर्श और उद्वेलित किया, उसे उनके अंदर के लेखक ने रचनात्मक स्तर पर जीने की ईमानदारकोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप उनकी यह औपन्यासिक कृति 'कैंसर ट्रेन' पहले पंजाबी में प्रकाशितहोकर पाठकों के सम्मुख आई और फिर चर्चित लेखक अनुवादक सुभाष नीरव के द्वारा अनूदित होकर हिंदी में छपी.

 

अनुवादक सुभाष नीरव खुद भी बड़े लेखक हैं. उनके छह कहानी संग्रह, दोकविता संग्रह, दो लघु कथा संग्रह और दो बाल कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उन्होंने पंजाबी से लगभग 600 कहानियों और40 साहित्यिक पुस्तकों का अनुवाद किया है और अपने लेखकीय कर्म के लिए कई पुरस्कारों से नवाजेजा चुके हैं.

 

साहित्य आजतक के पाठकों के लिए 'कैंसर ट्रेन' उपन्यासका एक अंशः

 

कई गाँवों के सुबह से आए लोग गुरुद्वारे के सामने वाले पेड़ों की छाया तले छोटी-छोटी टोलियों में बैठे थे और आपस में बातें कर रहे थे. इनके परिवारका कोई न कोई सदस्य कैंसर की बीमारी से पीड़ित था. जिले के मुख्य दफ्तर की ओर से उन्हें रेड क्रॉस फंड में से आर्थिक सहायता प्रदान की जानी थी. इसलिए गाँवों की पंचायतों के माध्यम से संदेशे भिजवाकर उन्हें यहाँ बुलाया गया था. मंत्री साहिबा ने खुद अपने हाथों चैक बाँटनेथे.

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                "सरपंच साहब, अभी और कितनी देर बैठना होगा?" ऊबेहुए नाजर ने एक दरख़्त के नीचे बिछी कुर्सियों पर कुछ सरकारी व्यक्तियों के बीच बैठे अपने गाँव के सरपंच सज्जन सिंह के पास जाकर पूछा.

 

                "मैं तो खुद तुम्हारे जैसा ही हूँ. कहते तो थे कि बीबी जी दोपहर तक आ जाएँगे." सरपंच का जवाब सुन नाजर ने ढलती दोपहर के सूरज कीओर देखना चाहा तो दरख़्तों की टहनियों के बीच में से छनकर आई सूरज की तेज़ किरणें उसकी आँखों में तीर की भाँति चुभीं.

 

                "अब तो दोपहर भी ढल चली है. सवेरे के भूखे-प्यासे बैठे हैं. आप कुछ पूछ-पड़ताल करो." भूख के कारण नाजर के पेट की अंतड़ियाँ ऐठनें लगीथीं.

 

                "थोड़ी देर पहले ही मैंने किसी जानकार से पूछा है. वह कहता था, मंत्रीसाहिबा ने चंडीगढ़ से आना है. इतने लंबे सफ़र में थोड़ी-बहुत देर तो हो ही जाती है. और थोड़ी देर इतंज़ार कर लो." सरपंच का जवाब सुनकर नाजर मुँह में ही बड़बड़ाता अपने गाँव के लोगों की टोली की ओर चल पड़ा.

 

                पिछले दो सालों से अख़बारों और टी.वी. चैनलों पर मालवा के गाँवों में फैली कैंसर की बीमारी के कारण मर रहे लोगों के बारे में समाचारआते रहे थे. कई गाँवों के लोगों ने इकट्ठे होकर भिन्न-भिन्न दलों के नेताओं के सम्मुख दुखड़े भी रोये. साथ ही, उन्होंने सरकारी दफ्तरों के चक्कर भी लगाए. चंडीगढ़ जाकर मंत्रियों के आगे मरीज़ों की दवा-दारू के लिएआर्थिक मदद देने की अर्जियाँ भी रखीं. इन सबके बाद ही सरकार के कानों पर थोड़ी-सी जूं रेंगी थी.

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                करीब छह महीने पहले तहसील से आए सरकारी लोगों ने गाँवों में जाकर कैंसर पीड़ित मरीज़ों के विवरण इकट्ठे करने प्रारंभ किए. उसके बादपरिवार के मुखिया से कैंसर पीड़ित मरीज़ के लिए आर्थिक मदद के लिए फॉर्म भरवाये गए. उस काम को समाप्त हुए भी कई महीने हो गए थे, पर मामला अभी भी बीच में लटक रहा था.

 

                "ज़िले के बड़े दफ्तर में चैक आ गए हैं. जल्दी ही पीड़ित परिवारों को कोई फंक्शन आयोजित करके चैक बाँटे जाएँगे." पिछले महीने सरपंचने नाजर को बताया था.

 

                "आपका बहुत बहुत धन्यवाद सरपंच जी. आपने बहुत भागदौड़ की है. नहीं तो हमारी कौन सुनता है यहाँ."  नाजर के मुँह से ये शब्द निकले अवश्य,पर अंदर से वह बहुत बुरी तरह खीझा हुआ था.

 

                "गाँवों के लोगों का ध्यान रखना तो मेरा फर्ज़ है." नाजर के मुँह से निकले धन्यवाद के शब्द सुनकर सरपंच ने छाती फुला कर उत्तर दिया.

 

                "खा गया साला ऊपर से आई सारी ग्रांटें, अब यह गाँव के लोगों का भला सोचेगा."उस दिन अंदर ही अंदर कुढ़ते नाजर ने अपने आपको सुनाकर ही सरपंच को कई गालियाँ दी थीं.

 

                "क्यों भई नाजर सिंह, क्या कहता है तेरा सरपंच?" नाजरको गर्दन झुकाये चला आते देख उसके साथ गाँव से आए एक आदमी ने पूछा.

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                "कहना क्या है, साले नौटंकी करते हैं. कहता है, बीबीने चंडीगढ़ से आना है, रास्ते में थोड़ी-बहुत देर तो हो ही जाती है."  नाजर ने अपने कंधे पर रखा अंगोछा नीचे ज़मीन पर बिछा बैठते हुए बताया.

 

                "इतने में तो एक आदमी दिल्ली से दक्खन पहुँच जाता है. मंत्री ने कोई पैदल आना है? उनकीकारें तो हवा से बातें करती हैं." नाजर की बात सुन वहाँ बैठे हुए लोगों में से एक बोला.

 

                "कहते हैं, चैक आए को दो महीने हो गए, परइन मंत्रियों के पास उन्हें बाँटने के लिए टैम ही नहीं. चैक तो कोई भी अफसर दे सकता है." बैठी हुई ढाणी में से एक नौजवान के गुस्से भरे शब्द वायुमंडल में गूंजे.

 

                "लीडर लोगों के चोचले हैं. चैक बाँटते हुओं की फोटो भी अखबारों में छपवानी होती हैं. तभी लोगों को पता चलेगा कि सरकार काम कर रहीहै." यह एक अन्य के मन की भड़ास थी.

 

                "मुझे लगता है, जब तक मंत्री चैक बाँटेगा, तबतक तो दवा-दारू के बिना बेचारे आधे मरीज़ यूँ ही लुढ़क जाएँगे." एक और ने अपने मन का संशय प्रकट किया.

 

                वहाँ बैठा एक एक व्यक्ति बहुत दुखी लगा. उनके धैर्य का प्याला लबालब भर जाने के कारण किसी भी पल छलक पड़ने को तैयार था.

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                "सब माई-भाई से बिनती है कि वे अपने अपने गाँवों को वापस चले जाएँ. मंत्री साहिबा ज़रूरी काम आ जाने के कारण आज नहीं आ सकेंगी. अबवे अगले बुधवार को अपना जन्मदिन आप सब के साथ मनाएँगी और उसी समय चैक भी बाँटे जाएँगे." गुरुद्वारे के लाउड स्पीकर से आई यह आवाज़ सुन दरख़्तों के नीचे टोलियाँ बनाकर बैठे मर्दों-औरतों के बीच एकदम हलचल मच गई और वे अपने कपड़े झाड़ते हुए उठ खड़े हुए.

 

                कइयों ने तेज कदमों के साथ गुरुद्वारे के बाहर खड़े उस व्यक्ति के इर्दगिर्द घेरा डाल लिया जिसने लाउड स्पीकर पर चैक न बाँटे जानेके बारे में लोगों को बताया था.

 

                "तुम्हें अकेले अकेले को अब लिखकर दूँ? एक बार बता तो दिया कि चैक अबबुधवार को बाँटे जाएँगे." अपने इर्दगिर्द इकट्ठे हो गए औरतों-मर्दों के झुंड द्वारा पूछे गए तरह तरह के सवालों के जवाब खीझकर देते हुए वह आदमी तेज़-तेज़ कदमों से गुरुद्वारे के निशान साहिब के करीब खड़ी अपनी कार की तरफ बढ़ा.

 

                "तू तो यार ऐसी बात कर रहा है जैसे ये पैसे तेरी जेब में से जाने हों. ये पैसा सरकार ने टैक्स उगाहकर लोगों से इकट्ठा किया है. हमतो अपना हक मांग रहे हैं." इससे पहले कि वह आदमी अपनी कार के अंदर बैठता, एक पढ़े-लिखे नौजवान ने आगे बढ़कर कार की खिड़की पकड़ तर्क देते हुए उस आदमी को फटकारा तो कार वाले ने उसकी ओर गुस्से में भरकर देखा.

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                "ये बात अपने दिमाग में से निकाल दो कि ये सरकारी पैसे हैं. ये तो गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से भेजे गए हैं." उस आदमी ने बोलनेवाले नौजवान को अपना मुँह बंद करने का इशारा किया.

 

                "गुरुद्वारे का चढ़ावा भी माथा टेकते समय हमारी ही जेबों में से ही जाता है."  वह नौजवान किसी भी तरह चुप नहीं रहना चाहता था.

 

                "अगर ये पैसे गुरुद्वारे के हैं तो मिनिस्टर का हाथ लगवाना ज़रूरी है." पहले नौजवान के पीछे से एक और ने बोलना शुरू कर दिया.

 

                उन सभी को बोलता देख कारवाले आदमी ने कार के अंदर बैठ तीव्रता से खिड़की बंद की और कार भगाकर ले गया.

 

                "नाजर सिंह, अपने परिवारों के लोग मर रहे हैं, इनसालों को अपने जन्मदिन मनाने की सूझती हैं." उसके साथ आए जागर ने कितनी ही देर बाद अपने अंदर इकट्ठा हो रहे गुस्से को थूकते हुए यह बात कही तो तेज़ कदमों से चले जाते नाजर ने पश्चिम दिशा में छिपने को तैयार खड़े सूरज की ओर देखा. उस सूरज को जिसने कुछ ही मिनट बाद उन सभीके इर्दगिर्द अँधेरे की चादर फेंक देनी थी.

 

                'ये भी साला अपने आप को मंत्री ही समझता है.' सूरज की ओर देख नाजर केमन में यह ख्याल आया तो उसके पैरों में और तेज़ी आ गई.

 

                "नाजर सिंह, बुधवार को बीबी ने इधर चैक बाँटने नहीं आना. वह तो अपने गाँवमें जन्मदिन मनाने आएगी. उस दिन भी अगर उसे टैम मिला तो चैक बाँटेगी, नहीं तो वैसा ही होगा, जैसा आज हुआ है." नाजर के पीछे-पीछे चले आते जागर ने एकबार फिर उसके ज़ख़्म में सुई चुभा दी.

 

                लेकिन जागर के कहे शब्द सुन नाजर अपने दिल में उठती टीस के बारे में बता न सका.

 

                'मैंने तो सोचा था, हाथ में पैसे आ जाएँ तो लड़की को एक बार फिर बीकानेरलेकर जाऊँ, पर इन साले लीडरों ने तो हमारे घर तबाह करके रख दिए.' अपने गाँव की ओर जाने वाली किसी सवारी की खोज में तेज़-तेज़ कदम उठाते नाजर ने सोचा.

 

                'घर जाने पर क्या जवाब दूँगा उस बच्ची को?' बीकानेर के अस्पताल ले जाकरएक बार फिर चैकअप करवाने के लिए नाजर कई बार निर्मल से कह चुका था, पर पैसों का जुगाड़ न हो सकने के कारण बात आगे से आगे बढ़ती चली गई.

 

                "डैडी, तुम मेरी फिक्र न करो. मेरी वजह से कहीं तुम न मंजे पर पड़ जाना.अगर तुम पड़ गए तो घर का क्या होगा. तुम अपना ख्याल रखो. जितने दिन मुझे जीना है, वो तो जिऊँगी ही." काफ़ी अँधेरा हो जाने पर सुबह से घर से निकला नाजर मुँह लटकाकर जब घर लौटा तो आँगन में बिछी चारपाई पर आकर लेटगए नाजर की ओर निर्मल देखने लगी. लेकिन दो-तीन मिनट भी जब उसके मुँह से कोई शब्द न निकला तो निर्मल ने चिंतित होकर यह बात कही.

 

                'जो एक आध खेत मेरे पास बचा है, मैं तो वो बेचकर लड़की का इलाज करवाताहूँ.' यद्यपि नाजर सवेरे का भूखा-प्यासा घूम रहा था, पर फिर भी मन में यह ख्याल आ जाने पर जसवीर द्वारा सामने ला रखी थाली में से रोटी की बुरकी तोड़नेको उसका मन न किया.

 

                "डैडी, ये ज़मीन नहीं बेचनी." नाजर को रोटी न खाते देख जैसे निर्मल नेउसके मन की बात बूझ ली हो.

 

                निर्मल के मुँह से निकले शब्द सुन, बिना कुछ बोले नाजर ने उसके चेहरेकी तरफ देखा.

 

                "ज़मीन बेचकर हम क्या करेंगे? तुम मेरा फिक्र न करो. मैं इतनी जल्दी नहींमरने वाली." ठंडे शब्दों से कही निर्मल की बात सुन नाजर ने अपने सामने पड़ी रोटी की थाली दूर सरका दी.

 

                "बेटा, जिनके पास ज़मीनें नहीं हैं, वोक्या रोटी नहीं खाते?" नाजर ने मंजे पर से उठ निर्मल के तपते माथे पर हाथ रखा तो निर्मल ने अपना मुँह दूसरी तरफ घुमाकर अपनी भर आई आँखें बंद कर लीं.

 

                "ज़मीन के बगै़र हम क्या करेंगे?" रसोई के अंदर का काम निपटाकर उनके करीबआ खड़ी जसवीर ने भी नाजर से पूछा.

 

                "और बहुतेरे काम हैं! कोई दिहाड़ी-मजदूरी कर लूँगा. तुम्हें भूखे नहीं मरने दूंगा." निर्मल की चारपाई की बाही पर बैठे नाजर के कंधेपर हाथ रख खड़ी जसवीर ने जब यह बात सुनी तो एक पल उसके मन के अंदर काफ़ी हलचल हुई, पर उसका प्रभाव जसवीर ने अपने चेहरे पर न आने दिया.

 

                "लड़की को दिया कुछ खाने को?" नाजर ने बल्ब की रोशनी में कुछ ज्यादा हीपीले दिखते निर्मल के चेहरे की ओर देखकर पूछा.

 

                "खिचड़ी दी थी बनाकर. दो-एक चम्मच खाकर बस कर गई. कहती है, भूख ही नहींलगती." जसवीर कौर की बात सुन जैसे नाजर की भी भूख मर गई हो.

 

                "अब कोई दवाई देनी है इसको?" नाजर ने अपने पास गर्दन झुकाए खड़ी जसवीरसे पूछा.

 

                "डैडी जी, तुम्हारे आने से पहले ही रात में लेने वाली सारी दवाइयाँ लेली हैं. जो दवाई पिछले हफ्ते से खत्म हुई पड़ी थी, वो भी आज अमन वीरा लुधियाने से लाया है." निर्मल की बात सुन एक पल अमन का चेहरा उसकी आँखों के सामने आया तो उसको लगा जैसे अमन भी फरिश्ता बन इस दुख की घड़ी मेंउनके साथ आ खड़ा हुआ हो.

 

                "तुम रोटी तो खा लो, ठंडी हुई जाती है." चारपाई पर पड़ी रोटी वाली थालीदेख जसवीर बोली.

 

                "रोटी खाने को चित्त नहीं करता." नाजर के उदासी भरे शब्द सुन गर्दन घुमा एक तरफ पड़ी निर्मल ने पलभर पिता के उतरे हुए चेहरे की ओरध्यान से देखा.

 

                "डैडी जी, तुमने तो सवेरे की दो ही रोटियाँ खाई हुई हैं. मुझे लगता है,दोपहर में भी कुछ नहीं खाया होगा. तुम ही गिर पड़े तो हमें कौन संभालेगा?" निर्मल की कहीं बातें सुन कुर्सी पर से उठकर चलते समय नाजर के पैर वहीं के वहीं रुकगए.

 

                "मेरी लाडो, तू फिक्र न कर. मैं नहीं कहीं मरता." प्यार में भरकर कहतेहुए नाजर ने निर्मल का माथा चूम लिया.

 

                "सो जा अब." यह कहकर नाजर ने चारपाई पर पड़ी थाली में से एक बुरकी तोड़कर मुँह में डाली तो वह जैसे उसके गले में फँसने लग पड़ी हो.

 

                बड़ी ही मुश्किल से उससे डेढ़ रोटी खाई गई. पानी का गिलास पी वह उसी चारपाई पर लेट गया.

 

                उस रात वे तीनों अपने अपने बिस्तर पर आँखें बंद किए पड़े थे, पर उन तीनोंमें से किसी को भी नींद नहीं आ रही थी. ज़मीन बेचने के बारे में नाजर की बात सुन सबके दिलों में उथल-पुथल सी होने लगी. वे सब यह हालात ठीक करने के लिए प्रयत्नशील थे जैसे, पर कामयाब नहीं हो पा रहे थे.

 

पुस्तकः कैंसर ट्रेन (उपन्यास), लेखकः नछत्तर, मूल पंजाबी सेहिंदी अनुवाद:सुभाष नीरव, पृष्ठ संख्या-178,प्रकाशकभारत पुस्तकभंडार

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