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प्रयागपथ: लघु पत्रिकाओं के बहुरते दिन

इलाहाबाद छायावाद के स्‍तंभों के लिए जाना जाता है. परिमल जैसी संस्‍था ने गोष्‍ठियों का इतिहास रचा है. नई कविता के अंक मानक माने जाते रहे हैं. उसी शहर से हाल ही में निकली प्रयाग-पथ नामक लघु पत्रिका ने अपने दूसरे अंक में ही प्रौढता प्राप्‍त कर ली है.

बुक का कवर बुक का कवर

इलाहाबाद छायावाद के स्‍तंभों के लिए जाना जाता है. परिमल जैसी संस्‍था ने गोष्‍ठियों का इतिहास रचा है. नई कविता के अंक मानक माने जाते रहे हैं. उसी शहर से हाल ही में निकली प्रयाग-पथ नामक लघु पत्रिका ने अपने दूसरे अंक में ही वह प्रौढता प्राप्‍त कर ली है जिसकी अपेक्षा हम इलाहाबाद से निकलने वाली पत्रिकाओं से करते हैं.

हितेश कुमार सिंह के संपादन में निकली प्रयाग-पथ का नया अंक जाने माने कवि विजेंद्र की दारुण कविताओं से शुरु होता है. प्रगतिशील खेमे के एक बड़े कवि विजेंद्र ने अपने उत्‍तर जीवन में जैसे एक कवि का संताप ही दर्ज कर दिया है. विजेंद्र की कविताओं से गुजरते हुए जहां उनकी खुद की पीड़ा के साथ हम जुड़ते हैं, वहीं इस पीड़ा में भी कविता की शक्‍ल साफ दिखाई देती है.

ऐतिहासिक आख्‍यान में माहिर सुधीर विद्यार्थी ने तिरसठ दिन लंबी मौत का हलफनामा में क्रांतिकारी यतींद्रनाथ दास की यातना कथा लिखी है. अभी हाल ही में उनकी पुस्‍तक बरेली: एक कोलाज खासा चर्चित रही है. विष्‍णु नागर के छोटे-छोटे व्‍यंग्‍य निबंधों ने पत्रिका में जान डाल दी है.

नया अनुभव देती कहानियां
कहानियों की फेहरिस्त में इस अंक में ममता कालिया की कहानी ‘निरा निरर्थक दिन’, हरियश राय की ‘जिद हो तो ऐसी’, नरेंद्र सैनी की ‘बास्‍टर्ड’ और हुस्‍न तबस्‍सुम निहॉं की ‘हुए तुम दोस्‍त जिसके....’ प्रकाशित हुई हैं. रपटीला राजपथ इंदिरा दांगी का उपन्‍यास अंश है. ममता कालिया ने इस बार बिल्‍कुल एक नए विषय पर कहानी लिखी है. एटीएम से पैसे निकालने की बाबत. पर वे जहां भी जाती हैं एटीएम में कैश नदारद होता है, कहीं बिजली नदारद रहती है. कहीं कार्ड ही मशीन में फंस जाता है और काम नहीं होता. ऊपर से ऑटो से हिचकोले खाती सड़कें.

कहानी एक नया अनुभव देती है. एक भोली और सच्‍ची जिद आदमी को जीवन के एक मोड़ पर किस कदर अकेला और निस्‍सहाय बना देती है हरियश राय की कहानी में शिखा मेहता की कहानी कुछ ऐसी ही है. वे अध्‍यापिका थीं. मुस्‍लिम लड़कियों को गणित व साइंस पढाने को उन्‍होंने अपना मिशन बनाना चाहा तो उन्‍हें ट्यूशन का आरोप लगा कर तंग किया गया. इस्‍तीफा देकर वे यह काम करने तो लगीं पर परिवार की बेपरवाही में डायबिटीज का शिकार हो गयीं. लिहाजा मिशन भी बिखर गया और जीवन भी.

कथाकार नरेंद्र सैनी इन दिनों सुर्खियों में हैं. स्‍त्री पुरुष संबंधों और सेक्‍स के साइके को अपनी किस्‍सागोई में तरह तरह से निरूपित करने वाले सैनी की कहानी बास्‍टर्ड श्रुति और उसके दोस्‍त के बीच के संबंधों की कहानी है. श्रुति का जीवन कुछ अलग और बिंदास किस्‍म का है. बॉस को वैसे ही नापसंद करती है जैसे डैड को जिन्‍होंने मां को गाली देते हुए कहा था यह बेटी भी तूने किसी और की अपनी कोख में डाली होगी. तभी तो इसकी नीली आंखें हैं. यह शक उसके जीवन को भी तबाह करता है जब जब श्रुति खुद अपने प्रेमी राजीव से मिलन के चरम क्षणों में होती है तो उसके गले में लाल निशान देख कर उसे परे झटक देती है. जीवन एक शक के चलते कैसे दुखांत बन जाता है यह कहानी उसके ब्‍यौरों को खूबसूरती से बुनती है.

सुधीर विद्यार्थी के बाद पत्रिका का दूसरा महत्वपूर्ण लेख बोल्‍शेविक क्रांति के दर्पण: सर्गेइ एम.आईसेंस्‍टिन है. फिल्‍मकार आईसेंस्‍टिन के जीवन, संघर्ष और सिनेमा के क्षेत्र मे किये गए कार्यों का विशद दस्‍तावेज है यह आलेख जिसे जवरीमल्‍ल पारख ने शोध और अध्‍ययनशीलता से तैयार किया है. सोवियत सिनेमा के इतिहास में इस फिल्‍मकार भूमिका इसी बात से जानी जा सकती है कि उनकी फिल्‍में मार्क्‍सवादी सिद्धांतों का एक व्‍यावहारिक फलक निर्मित करने में काफी सहायक रही हैं. पृथ्‍वीराज कपूर के पृथ्‍वी थियेटर को कौन नहीं जान. कहते हैं प्रगतिशील कवि शील जी के किसान नाटक का मंचन पृथ्‍वीराज कपूर ने किया था तथा वे खुद एक मंजे हुए अभिनेता रहे है. अपनी सीमा में रहते हुए कपूर ने अनेक ऐसे नाटक अभिनीत किए जिनकी भूमिका सामाजिक जागरूकता से जुड़ती है. प्रयाग पथ में छायावाद युगीन पत्रिकाओं पर कुमार वीरेंद्र का गवेषणात्‍मक आलेख प्रकाशित है जो शोधार्थियों के लिए उपयोगी है.

अन्‍य आलेखों में प्रसाद की कहानी गुंडा पर श्रीराम त्रिपाठी का विश्‍लेषण, तुलसीदास के एक दोहे पर सवाई सिंह का आर्थिक राजनीतिक विश्‍लेषण, प्रेमचंद और प्रसाद की कहानियों की प्रासंगिकता की भारतयायावर की पड़ताल पठनीय है. उस जनपद का कवि हूं कह कर त्रिलोचन ने अपने गांव को याद किया है. इसी संदर्भ में बदायूं के अपने घर गांव को सुपरिचित कवि विजेंद्र कैसे याद करते हैं उनके शिष्‍य अमीरचंद वैश्‍य ने जन्‍मभूमि मम पुरी सुहावनि में आत्‍मीयता और गहन अनुशीलन से विश्लेषित किया है। कहना न होगा कि प्रयाग-पथ से लघु पत्रिकाओं की जमीन और पुख्‍ता होती है.

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