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हिंदी और हिंदुस्तान के लिए 'रेत समाधि' के इंटरनेशनल बुकर प्राइज की आखिरी पायदान तक पहुंचने के मायने

अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2022 की शॉर्टलिस्ट में गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' का डेजी रॉकवेल द्वारा किया अनुवाद 'Tomb of Sand' भी शामिल है. क्यों न इस उपलब्धि को भारतीय साहित्य के एक बेहतर अवसर के रूप में बदल दिया जाये.

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गीतांजलि श्री, उपन्यास 'रेत समाधि', डेजी रॉकवेल और Tomb of Sand गीतांजलि श्री, उपन्यास 'रेत समाधि', डेजी रॉकवेल और Tomb of Sand

साहित्य केवल शब्दों से ही चलता है क्या? कोरे अक्षर तो साहित्य नहीं गढ़ते? अगर केवल अक्षर ही साहित्य सृजित करते तो फिर विषय, भाव, संवेदना, शिल्प, विधा, भाषा और गढ़न का अर्थ भला क्या होता? पर हमारे साहित्यकार अपने लेखकीय कौशल को खुद निजी कसौटी पर कसना नहीं चाहते और कई बार तो सामान्य शिष्टाचार को भी मानने से कतराते दिखते हैं. भारतीय साहित्य जगत में व्यावहारिकता का भरपूर अकाल दिखता है, और इसकी वजह काफी हद तक गुटबंदी और खेमेबाजी है. ईर्ष्या, आत्ममुग्धता जैसे शब्द शायद थोड़े कड़े और कड़ुवे हैं. पर सामान्य शिष्टाचार, जो बुनियादी मानवीय मूल्य है उसकी अपेक्षा तो हम इस वर्ग से कर ही सकते हैं. स्थिति यह है कि समकालीन लेखकों की अच्छी कृतियों को सराहने की कृपणता तो इनमें है ही, अपने वरिष्ठ साहित्यकारों तक का आदर करने में भी ये कोताह हैं. यह बात तब और खराब होने लगती है जब यह विभाजन सोशल मीडिया के दौर में और भी अधिक दिखता है. इससे हिंदी पाठकों के बीच गलत संदेश जाता है, जिसका नुकसान अंततः समूचे भारतीय साहित्य को होता है. 
इनदिनों जब अंग्रेजी मीडिया और साहित्य जगत अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2022 की शॉर्टलिस्ट में शामिल लेखकों की चर्चा में डूबा है और 26 मई, 2022 को घोषित होने वाले संभावित विजेता के पक्ष में माहौल बना रहा है, तब हिंदी साहित्य जगत में गीतांजलि श्री और उनकी चर्चित कृति 'रेत समाधि' को लेकर एक अजीब सा बंटवारा है. कुछ लोग बेहद खुश हैं, तो कुछ यह भी पूछते दिखते हैं कि यह गीतांजलि श्री हैं कौन? या अब तक कितने लोगों ने 'रेत समाधि' पढ़ा है? या बुकर प्राइज में है क्या? या फिर उन्हें पुरस्कार मिला तो हमें क्या? या हमें विदेशी पुरस्कारों से क्या मतलब? जबकि हकीकत यह है कि 'रेत समाधि' उपन्यास अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के गौरव को बढ़ा रहा है. इसे अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2022 की शॉर्टलिस्ट में देखने के अपने मायने हैं. याद रहे कि हिंदी कथाकार गीतांजलि श्री का यह उपन्यास 2018 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था. 'रेत समाधि' का अंग्रेजी भावांतर जानीमानी अनुवादक डेजी रॉकवेल ने किया. यह 'Tomb of Sand' नाम से प्रकाशित हुआ, जो अब इंटरनेशनल बुकर प्राइज की दौड़ की आखिरी सूची में शामिल है. दुनिया की अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को अंग्रेजी जगत में सम्मान दिलाने के लिए 2004 से बुकर पुरस्कार समिति ने इंटरनेशनल बुकर प्राइज की शुरुआत की थी. तब से अब तक के समय में यह पहली ऐसी हिंदी कृति है, जो इस पायदान तक पहुंची है. जबकि खुद रॉकवेल यशपाल से लेकर भीष्म साहनी, उपेंद्रनाथ अश्क, कृष्णा सोबती तक की श्रेष्ठ कृतियों का अनुवाद कर चुकी हैं. पर इससे पहले कोई कृति बुकर प्राइज की दौड़ में शामिल नहीं हो सकी थी.
अब  'रेत समाधि' के अंग्रेजी रूप 'Tomb of Sand' का मुकाबला कोरियाई, नॉर्वेजियन, जापानी, स्पेनिश और पोलिश से अनूदित कृतियों से है. इन देशों और भाषाओं के साहित्यकार जहां अपने रचनाकारों की उपलब्धि को देश की पहचान से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं हमारे यहां कुछेक हलकों को छोड़ दें तो लोग इसके लिए माहौल बनाने में कोताही कर रहे हैं. अगर हम 'रेत समाधि' के अंग्रेजी अनुवाद 'Tomb of Sand' के मुकाबले में खड़ी अन्य पांच कृतियों को देखें, तो उसमें पिछले विजेताओं ओल्गा टोकार्ज़ुक और जेनिफर क्रॉफ्ट की भी एक कृति शामिल है. इस बार यह जोड़ी अपनी कृति 'द बुक्स ऑफ जैकब' को लेकर दौड़ में शामिल हुई है. पोलिश भाषा का यह लेखक और उसकी अनुवादक जोड़ी पहले भी कई पुरस्कार जीत चुके हैं. इंटरनेशनल बुकर प्राइज की शॉर्टलिस्ट में शामिल अन्य कृतियों में बोरा चुंग की कोरियाई से एंटोन हूर द्वारा अनूदित 'कर्स्ड बनी', जॉन फॉसे की नॉर्वेजियन से डेमियन सियर्स द्वारा अनूदित 'ए न्यू नेम: सेप्टोलॉजी VI-VII', मीको कावाकामी की जापानी से सैमुअल बेट और डेविड बॉयड द्वारा अनूदित 'हेवेन' और क्लाउडिया पिनेरो की स्पेनिश से फ्रांसिस रिडल द्वारा अनूदित 'एलेना नोज़' शामिल है. साहित्य की ये मूल रचनाएं व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर दुनिया भर में हो रहे बदलावों और मानवीय संवेदनाओं की बात करती हैं, पर खुद हिंदी के साहित्यिक जगत को क्या कहें?
हालांकि इंडिया टुडे समूह ने अपने साहित्यिक मंच पर इस उपलब्धि को बहुत अहमियत दी है और साहित्य तक पर लगातार कवरेज के साथ ही इंडिया टुडे के ताजा अंक में गीतांजलि श्री, रेत समाधि और डेजी रॉकवेल को लेकर विशेष सामग्री प्रकाशित की है. साहित्य तक ने तो एक बड़ी परिचर्चा भी आयोजित की जिसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कवयित्री-कथाकार अनामिका, मेडागास्कर में भारत के राजदूत और अंग्रेजी साहित्यकार, अनुवादक अभय के., असमिया के सम्मानित साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कथाकार और असम के पूर्व पुलिस महानिदेशक कुला सैकिया, राजकमल प्रकाशन समूह के कर्ताधर्ता अशोक महेश्वरी और चर्चित स्पैनिश अनुवादक-प्राध्यापक मनीषा तनेजा शामिल थीं. 
इस चर्चा में शामिल सभी वक्ताओं का मत था कि 'रेत समाधि' की इस उपलब्धि को साहित्य के लिए एक बेहतर अवसर के रूप में बदला जाये. भारतीय भाषाओं के साहित्य का आपसी आदान-प्रदान हो, अनुवाद कर्म को सृजनात्मकता का दर्जा मिले, भारतीय प्रकाशक अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशकों से कॉपी राइट साझीदारी के लिए माहौल बनाएं, सचल पुस्तकालयों को चलन में लाया जाए और सार्वजनिक उपयोग के स्थलों, यथा विवाह घर, सामुदायिक भवन आदि में कोई कोना किताबों के लिए सुरक्षित कराया जाए. यही वजह है कि वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल ने इस परिचर्चा पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा, "रेत समाधि के बहाने इतनी सुचिंतित, सुसंचालित, सटीक प्रश्नों और चिंताओं के साथ साहित्य को परिधि में खड़ा करके और उसमें अनुवादक की भूमिका वाली चर्चा बहुत दिनों बाद देखी. 'रेत समाधि' ने बुकर की दौड़ में शामिल होकर हम हिंदी वालों को ही नहीं बल्कि भारतीय भाषाओं को सम्मानित होने का अवसर दिया है. इस संदर्भ में हमें यह भी याद रखना चाहिए कि रबींद्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' से लेकर गीतांजलि श्री की 'रेत समाधि' के अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने में लेखक और उसके अनुवादक की भी बड़ी भूमिका है. गीतांजलि के सभी उपन्यास पढ़े हैं मैंने और उसकी जटिल प्रयोगधर्मिता ने हमेशा सोचने पर विवश किया है मुझे. बधाई!" पर ऐसी सदाशयता अन्य साहित्यकारों ने नहीं दिखाई. यों ब्रिटिश काउंसिल ने भी एक कार्यक्रम कराया, जिसमें साहित्य अकादमी से सम्मानित चर्चित लेखिका नमिता गोखले ने गीतांजलि श्री से उनके लेखन पर बातचीत की. पर ये प्रयास देश के स्तर पर साहित्य को जन-जन के बीच पहुंचाए जाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. वह भी तब, जब कोविड महामारी के दौर से उबरते ही हिंदी और भारतीय साहित्य जगत को यह उपलब्धि हाथ लगी हो. 
यहां यह बात गौर करने लायक है कि 'रेत समाधि' जब इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लॉन्ग लिस्ट में 13 किताबों के बीच शामिल हुआ था, तब राजकमल प्रकाशन ने राजधानी के साहित्यकारों, पत्रकारों के लिए 'रेत समाधि: कृति उत्सव' नाम से एक आयोजन किया था. जहां अशोक वाजपेयी, हरीश त्रिवेदी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, वीरेन्द्र यादव और वंदना राग जैसे लेखकों ने इस उपन्यास के बारे में अपनी राय रखी थी और लेखक, प्रकाशक को बधाई दी थी. कथाकार वंदना राग का कहना था कि रेत समाधि का ऐश्वर्य चंद बातों में नहीं  समा सकता है, तो हरीश त्रिवेदी ने इसे अभूतपूर्व घटना बताया था. आलोचक वीरेंद्र यादव का कहना था कि 'रेत समाधि' की उपलब्धि ने वैश्विक स्तर पर हिंदी और अन्य दक्षिणी एशियाई भाषाओं के लिए मार्ग खोल दिए हैं. वरिष्ठ लेखक पुरुषोतम अग्रवाल का कहना था कि यह उपन्यास संवेदना को समृद्ध करता है तो उसे चुनौती भी देता है, तो वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी का कहना था कि गीतांजलि ने यथार्थ की आम धारणाओं को ध्वस्त किया है और एक अनूठा यथार्थ रचा है, जो हमारे आस-पास के यथार्थ से मिलता-जुलता है और उसके सरहदों के पार भी जाता है.
डेजी रॉकवेल ने अपने ही अंदाज में इसकी तारीफ की और कहा- एक शानदार वाइन की तरह, एक प्रतिभाशाली कृति की प्रतिभा की पहचान कभी-कभी देर से आती है. रेत समाधि एक जटिल और समृद्ध उपन्यास है, जिसे बार-बार पढ़ने पर भी आश्चर्य और रोमांच गहराता है. मैं यह निस्संदेह कह सकती हूं क्योंकि अनुवाद करते-करते मैंने खुद इसे बार-बार पढ़ा है. उसको पूरी तरह समझने मे देर लगती है इसलिए कि हमारे छोटे जलेबी-दिमाग यह काम अकेले में नहीं कर सकते हैं. इसका प्रकाशन 2018 में हुआ आज चार साल बाद भी लोग उसे अंग्रेजी और फ्रेंच में भी पढ़ रहे हैं. 'रेत समाधि' की फ्रेंच अनुवादक एनी मोताड का कहना था कि- 'रेत समाधि की कहानी की गति एक और रहस्य है, कभी रुक जाती है पचास पृष्ठों तक, कभी अचानक बहुत तेज़ हो जाती है. कभी शांति नदी के तरह रहती है,  कभी हांफती है, कभी बहुत लम्बे वंशों के साथ तो कभी बहुत छोटे. जिस तरह ये कहा जाता है कि महाभारत मे सबकुछ मिलता है उसी  ही तरह ये कहा जा सकता है कि सारा हिंदुस्तान रेत समाधि में निहित है.'
राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी का मानना है कि बुकर की दौड़ में शामिल होकर 'रेत समाधि' ने दुनिया की सभी भाषाओं के सचेत पाठकों, लेखकों, प्रकाशकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है. भारतीय भाषाओं, विशेष रूप से हिंदी पाठकों को तो जैसे झकझोर कर जगा दिया है. हिंदी में हाल के बरसों में किसी बड़ी रचना का जो इंतजार था, 'रेत समाधि' ने इसे समाप्त किया है. साहित्य आजतक पर पढ़िए 'रेत समाधि' का एक अंश और जानिए यह उपन्यास क्यों इतना चर्चित हुआ.
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पुस्तक अंशः 'रेत समाधि' 
ज़िन्दगी का क्या? छोटे से दायरे में चलना जानती है, जैसे एक पगडण्डी पे जो शुरू हुई नहीं कि ख़तम. पर विशाल विकराल भी जानती है, जैसे पगडण्डी से खुली सड़क पे निकल आये और बड़ी सड़क से जा मिले जो महामार्ग हो, ग्रैंड ट्रंक रोड जैसा ऐतिहासिक हाईवे हो. इनका पगडण्डी से दूर सुदूर जुड़ जाना कहानी में नए मोड़ लाता है, ट्रक ट्रैक्टरों की दहाड़ से पगडण्डी थर्रा जाती है, या सिल्क रूट से चिरकाल से उतारे रेशमी एहसास उसको नरमी से लपेट लेते हैं. पगडण्डी चमत्कृत होती है कि कहां से आ रही होंगी ये सड़कें, किन वक्तों से, काफ़िलों से, सरहदों से. और कहां से कहां आ गयी मैं, कितने अलग अलग जीवन पार करके. क्या अभी भी वही पगडण्डी हूं, या उसके भी पहले की ज़रा सी रविश?
पर ये सवाल कौन पूछेगा, कब, अभी किसे ख़बर?
अभी कमरा है, मौन है और बेटी माँ के पास आ रही है.
वो बड़े की बहन है और उसे देख वे चिल्ला पड़े हैं.
चिल्लाना परम्परा है. बड़े बेटों का चिल्लाने का पुराना रिवाज़ है. मालिकाना ढंग से. रिवाज़ मुलम्मा है. कोई दिल में खूंखार हो न हो, लिबास उसी का ओढऩा पड़ता है. कहा जाता है कि बड़े के पिता दिल से चिल्लाते थे जबकि बड़े का दिल ज़्यादा खौलन नहीं मारता. पर ज़बान दोनों की एक सी है. रिटायरमेंट तक पिता चिल्लाते थे, फिर चिल्लाना बेटे को सौंप कुछ शान्त हो चले. बड़े ने और ज़ोरों से चिल्लाने की शान ओढ़ी और चमकने दमकने लगे. अब कुछेक महीनों में अवकाशप्राप्ति होगी, तब चिल्लाना सिड की झोली में गिरेगा, पर अभी तो बड़े में जोश मारता है.
लेकिन बड़े बहन पर नहीं चिल्लाये थे. उससे तो वे बोलते ही नहीं थे. वे अपना पजामा गीला होने पर चिल्लाये थे. उन्होंने गीला नहीं किया था, गुलदाउदी उछल पड़े थे. कामवाली के हाथों में मटर पनीर का डोंगा देखकर. बड़े ने देखा, गुलदाउदी ने नहीं. नहीं वो नहीं, उन्होंने सर झटका ही था, कि पाइप हिला जिससे वो पानी दे रहे थे, गुलदाउदी उछला और पानी की धार पजामे पर आ गयी. इस पर वे कूदे और डबल डपट के चिल्लाये नहीं वो नहीं. और पाइप से पानी बहता छोड़ चिल्लाते हुए अन्दर आ गए.
मारना है, कब की बनी सब्ज़ी खिलाकर? 
मेमसाहब ने कहा, कामवाली अन्यमनस्क बोली. मियां बीवी की इन असल या नूराकुश्तियों से ऊब कर. दीदी आई हैं.
ताज़ी सब्ज़ी बनाओ. सड़ा बासी खिलाओगी? इसे तो भिखमंगे को भी मत देना, मर जाएगा और तुम पर केस हो जाएगा.
आप भी. मेमसाहब उर्फ़ पत्नी उर्फ़ भाभी उर्फ़ बहू उर्फ़ मॉम तमक के सामने आयीं. शाम भैया आ रहा है, उसके लिए तो कल रात कह रहे थे इतनी बची है, डिनर पे सर्व कर देना. अब डिनर से घंटों पहले ही ज़हर हो गयी? एंड, वो अंग्रेज़ी में टिन्नाईं, नौकरों के सामने मेरी बात काटना बंद करें, वो इसीलिए मेरी अनसुनी करते हैं और आपकी भी क्या इज़्ज़त रह जाएगी.
फेंको इसे. बड़े ने आँखें दिखायीं, कामवाली को, जो फि़्रज के पास डोंगा लिए बुत बनी खड़ी थी.
मैंने चख ली है. फस्र्ट क्लास है. कोई दोस्त भी लायी हैं, दो जन हैं. बाकी खाने के साथ रख रही हूं कि कम न पड़े. सबके आगे शान्त बनाने या ननद को सुनाने पत्नी ने पति को तरेरा.
चाहे कम चाहे ज़्यादा, जो ताज़ा बना है दो, अगर और कुछ नहीं बना सकती, बड़े ने कामवाली को झिड़का. हटाओ इसे.
रख दो वापस, बहू तड़तड़ायी, मैं खाऊँगी.
रख दो इनके लिए. और कोई नहीं खायेगा.
मर गयी तो कहना साहब ने मार दिया. 
कब ये चिल्लाना टिन्नाना चुहल है, कब बचकाना दंगल, कब हँसी, कब चिढ़ और एक दूसरे को मात करने का शगल, कामवाली को अटकल लगानी पड़ती.
बेटी ने तो सुना ही, पीठ के कान भी कौन बंद रहे होंगे? बेटी की दोस्त अलबत्ता घर के रंग से वाक़िफ़ हो न हो. और गुलदाउदी का सुनना न सुनना बराबर. उनका मौसम था, उन्हें बात बात पर उछलने में मज़ा आ रहा था, उछलते रहे. इसकी भी फ़िक्र नहीं कि बड़े रिटायर होंगे, ये बगिया छोड़ जाएँगे, अगले का रवैय्या क्या होगा? आज वालों की तरह कहीं लॉन क्यारियों को सीमेंट से पाट दें कि धूल और उसके जीवों से बचें? या फूलों की एवज में गेंहू भुट्टा कुछ बो दें कि महँगाई में बचत करें? पर गुलदाउदी आगे की नहीं सोच रहे थे, उछलने से बाज़ नहीं आना उन्हें, भीतर स्प्रिंग लगा हो ऐसे मटक जाते.
छोटे शहरों में अफ़सरों की बड़ी बड़ी कोठियों से कई गुना बड़े उनके लॉन, फल फूल के बाग, खेत होते हैं. कभी उन में स्विमिंग पूल और ताल तलैया और फौवारे ओसारे भी होते हैं. एक बार तो विक्टोरिया के ज़माने की विक्टोरिया का संगमरमरी -काली पीली तो न हो सकती थी- ऊंचा पुतला भी बाग में स्वागत करता. बात बात पे देशद्रोही करार किये जाने के डर के न होते भूला खड़ा, पर अमान्य नहीं.
बड़े शहरों में घर छोटे होने लगे. लेकिन वहां भी, जहां इमारत अब पेड़ थे और सूखे ढेले फूल, अफ़सरों के घर मरुभूमि में नखलिस्तान थे.
गुलदाउदी ही गुलदाउदी.
बड़े के घर में घुसते ही लम्बे गलियारे के शीशे पार लॉन की किनारियां बनाते हर रंग हर नाप में गुलदाउदी. 
बहन ने देखा भाई पाइप थामे फूलों में पानी दे रहे हैं. सूरज चमक रहा था और पीछे के पेड़ के पार एक सुनहरी धार चमक रही थी, जैसे परमात्मा ने धूप से हाथ मले हों और उनमें से सूरज कुछ टपक टपक पड़ा हो.
बहन की पीठ ने पनीर कांड सुना देखा. माँ की पीठ की माँ जाने. 
कामवाली से भाई ने कहा, बहन की माँ के कमरे में जाती पीठ को देखते हुए, कि अम्मा से कहो सूरज चमक रहा है और गुलदाउदी फूले हैं, लॉन में कुर्सी लगा दो, यहीं आकर बैठें सब.
कह कर भाई गुलदाउदी के भविष्य की सोचने लगे, यानी बाकियों की तरह इस बड़े शहर में, रिटायर होकर $फ्लैट में जाने की बात. कितनों को गमलों में करके ले जाएं? उन ज़रा सी बैल्कनियों में गमले भर दें तो कपड़े और खुद और बाकी अनाप-शनाप के लिए जगह? 
कुर्सियाँ तो लग गयीं पर बड़े अकेले वहां बैठे. अपने मरहूम पिताजी की तरह जो जाड़ों में यहां धूप सेंकते थे, आधा रुख गुलदाउदी की तरफ़, बाकी शीशे के दरवाज़े से नज़र आते घर के कमरों और गलियारे के अन्त पे खुले बड़े दरवाज़े की तरफ़. बाप बेटे दोनों को अभ्यास था कि बायीं आँख की पुतली बायें कोने में सरकाएं और दाहिनी की दायें दायें दायें, ताकि दुनिया के दोनों अद्धे ज़द में आ जाएँ और घटता सब पता चल जाए. शायद अलग धातु के स्नायु होंगे जो आँख ऐसे देख पाती, दोनों ओर के दृश्य साधे. या नहीं साध पाती होगी और दृश्य लुढ़क पुढ़क होते हों?
बहन की आवाज़ आ रही थी.
गुलदाउदी ही गुलदाउदी.
माँ की आयी 'नहीं'
हर रंग के हर नाप के. फुटबॉल, मकड़ा, चपटे, कंचे, फुदकते, अम्मा.
मानती कहां है?
बैंगनी, सफेद, पीले, गुलाबी, हरे भी.
लॉन के ऊपर आसमान को लहलह करते.
मैं ले चलूंगी ना, छड़ी ले लो ना.
नहीं. अरे. चक्कर. छड़ी. नइ. धूप. नइ. फूल. न न नयी...
बड़े उठ आये. माँ के कमरे में, बहन की बगल में. 
दोनों ने आँख न-मिली सी मिलाई और कुछ न-मुस्कराए से मुस्कराए. बातचीत अरसे से बंद है. हूंस गयी पर आदत रह गयी. अब आता नहीं सामने सामने भाई बहन जैसी अर्रबर्र करना.
उठीं? उन्होंने माँ की पीठ को ललकारा. कब से आई है, कुछ खिलवाइये, बनवाइए, नहीं तो सड़ा गला कुछ पहुंच जाएगा किचन से.
 

 

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