हिंदी में क्राइम थ्रिलर उपन्यासों की एक समृद्ध परंपरा रही है. पर ज्यादातर अपराध कथाएं लुगदी साहित्य का ही हिस्सा रही हैं, उन्हें हिंदी साहित्य की मुख्य धारा में कभी शामिल नहीं किया गया. जबकि कंटेंट के लेवल पर ये किसी भी तरह से किसी भी अन्य विधा से कमतर नहीं रही हैं.लेकिन पिछले 3 दशकों में स्थितियां बदलीं हैं. अपराध कथाओं में अब केवल मनोरंजन नहीं हैं . समकालीन लेखकों ने अपनी कहानियों में यथार्थवाद, मनोविज्ञान और सामाजिक मुद्दों को जोड़कर एक नया रूप देने की कोशिश की है. इसी क्रम में पत्रकार से लेखक बने पीयूष पांडे की कृति उसने बुलाया था को भी लिया जा सकता है. मनोज वाजपेयी की बॉयोग्राफी लिखकर चर्चा में आए पीयूष पांडे ने पहली बार सस्पेंस-थ्रिलर में हाथ आजमाया है. उसने बुलाया था के पन्ने जैसे जैसे आगे बढ़ते हैं पाठक कातिल की तलाश में तो जुटता ही है उसके साथ पुलिस, मीडिया , न्यायालयों की व्यवस्था भी उसके सामने उजागर होती हैं. कई बार व्यवस्था पर लेखक के तंज इतने मारक हैं कि वो आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे.
पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित उसने बुलाया था की शुरुआत हर क्राइम कथानक की तरह एक मर्डर से ही होती है.फिर लगता है कि हमें एक खूबसूरत प्रेम कहानी पढ़ने को मिलने वाली है. पर देखते ही देखते उपन्यास में एक बहुत ही रोचक प्लॉट सामने आता है. एक साइकॉलजी स्कॉलर यूएस रिटर्न लड़की एक ऐसे मनोवैज्ञानिक शोध में लगी हुई जैसा कि आपने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इस तरह का रिसर्च भी दुनिया में होता है. मर्डर की गुत्थी सुलझाते हुए पता चलता है कि करीब एक दर्जन मर्डर हो चुके हैं. जाहिर है कि रीडर जितना आगे बढ़ता है वह कहानी से उतना ही चिपकता जाता है. मौतों की गुत्थी एक समय इतनी उलझ जाती है कि पाठक अपना जरूरी काम छोड़कर पहले उपन्यास को पूरा खत्म करने में लग जाता है.
उपन्यास की कहानी नोएडा-ग्रेटर नोएडा के गलियों में शुरू होती है और यहीं पर खत्म होती है. बीच बीच में लखनऊ , आगरा की भी सैर होती है. पुलिस इंसपेक्टर आदित्य राघव मर्डर केस के सिलसिले में आगरा की खाक छानने भी पहुंचता है. लेखक की दाद देनी पड़ेगी कि आगरा शहर के एक एक सीन को उसने इस तरह क्रिएट किया है जैसे लेखक आगरा में ही पैदा हुआ है या इस शहर में रुककर कुछ दिन जमकर रिसर्च किया हो. आगरा की कहानी इस तरह बुनी गई है जैस लेखक की यहां की एक-एक गलियों से जान पहचान है. यहां की लोकल भाषा का भी प्रयोग किया है. एक शख्स का पीछा करते हुए पुलिस इंसपेक्टर नजीर अकबराबादी की मजार तक पहुंच जाता है. जहां एक मुशायरा चल रहा होता है और वहां लेखक ने यहां पर इंसपेक्टर आदित्य के मुंह से शेरो-शायरी भी करवा दिया है. किसी भी लेखक का यही कौशल होता है कि कैसे बीच-बीच में गंभीर माहौल को सहज बनाया जा सके.
कहानी एक युवा लड़की प्रज्ञा की है जो अमेरिका से लौटकर पीएचडी कर रही है.वह अपनी प्रयोगशाला में अजनबियों को बुलाती है, उनके व्यवहार को रिकॉर्ड करती है. खासकर नशे की हालत में पुरुषों के साथ महिलाओं की बातचीत कैसे बदलती है. इस प्रयोग का उद्देश्य मानवीय व्यवहार की गहराई, दमित इच्छाओं, कुंठाओं और नैतिकता के खोखलेपन को उजागर करना है .पर पाठक के लिए यह कौतुहल का विषय बन जाता है. एक जवान लड़की से एक अनजान शख्स मिलने आता है. लड़की उसे शराब पीने का ऑफर करती है. बारी-बारी समाज के हर तबके, हर उम्र के लोग आते हैं. सभी आगंतुक इस प्रयोग से अनजान हैं. नेता, बिजनेसमैन, प्रोफेसर, पत्रकार, मौलवी , सड़कछाप सभी आते हैं. हैरानी तब होती है जब भेद खुलता है कि इस प्रयोगशाला में आने वालों का बारी-बारी मर्डर हो चुका है.
जाहिर है कि यह सब्जेक्ट किसी भी रीडर को सस्पेंस और थ्रिल के चरमोत्कर्ष पर ले जाता है. अगर आप इस उपन्यास के पहले 5 से 7 पन्ने पढ़ लेंगे फिर इसे पूरा करना शायद आपकी मजबूरी हो जाएगी. हो सकता है कि आप को अपने महत्वपूर्ण कार्य इसके लिए डिले करने पड़ जाएं. इंस्पेक्टर आदित्य की जांच के बहाने लेखक ने मीडिया में काम करने का प्रेशर, न्यूज एंकर बनने की होड़, लंपट संपादकों की करतूत को भी उजागर करने की कोशिश की है. अपनी कहानी के माध्यम से लेखक ने कोर्टरूम ड्रामा, डिजिटल दुनिया के प्रभाव और व्यक्तिगत संबंध , मनोविज्ञान और सेक्स पर खूब ज्ञान परोसा है.
खासियत है कि लेखक का तंज और ज्ञान कभी बोझिल नहीं बनते बल्कि कहानी को समृद्ध करते हैं. इस कहानी को पढ़ते हुए ही मुझे ये जानकारी मिली कि मुंशी प्रेमचंद के नाम के आगे मुंशी शब्द कैसे लग गया. मैं अब तक यही समझता था कि प्रेमचंद की जाति कायस्थ होने के चलते उनके नाम के आगे मुंशी लग गया होगा.पर लेखक ने इससे जुड़ा एक किस्सा बताया है. वो किस्सा क्या था आपको कहानी पढ़ने पर ही पता लगाना चाहिए.
एक पत्रकार होने के नाते पांडेय केवल सस्पेंस बनाए रखने पर ही ध्यान नहीं देते, कहानी में स्त्री मनोविज्ञान, स्त्री-संघर्ष, सामाजिक व्यवस्था की खामियों और मानवीय अंधकार की गहराइयों को एक साथ रेखांकित करते हैं. 227 पेज की यह किताब पढ़ते समय पाठक को लगता है कि वह कोई वेब सीरीज को देख रहा है. शायद कहानी की बुनावट ही इस अंदाज में की गई है कि जल्द ही ओटीटी प्लेटफार्म पर इसे देखने का भी मौका मिले. अगर किसी अच्छे डायरेक्टर ने इस कहानी पर वेबसीरीज बनाई तो हो सकता है कि वह इस किताब से ज्यादा मजेदार हो. क्योंकि जिस तरह का स्टोरी प्लॉट लेखक ने चुना है उसे पर्दे पर देखने में और ज्यादा मजा आने वाला है. उम्मीद है कि बहुत जल्दी यह खबर मिले कि अमुक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इन नॉवेल पर आधारित वेब सीरीज आ रही है.
पुस्तक की कमी यह है कि प्रूफ रीडिंग बेहतर तरीके से नहीं हो सकी है. एक बेहतर पाठक लिए ये चीजें खटकने वाली हैं. कई बार संटेंस भी लय में नहीं आते. उम्मीद है अपने दूसरे संस्करण में प्रकाशक और लेखक अपनी इन कमियों को दूर कर लेंगे.