किताब: हिंदी की क्लासिक कहानियां: महिला कथाकार
संपादक: पुष्पपाल सिंह
प्रकाशक: हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया
कीमत: 250 रुपए
महिलाओं की जिंदगी के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानियां पढ़ना चाहते हों, तो यह किताब पढ़िए. इन्हें लिखा भी महिला कहानीकारों ने ही है. साहित्य निश्चित रूप से आपको परिपक्व बनाता है और इसे पढ़कर महिलाओं की समस्याओं, संघर्षों और अनुभवों पर आपकी समझ बेहतर होगी.
आइए आपको एक प्रीकैप दे देते हैं. अल्पना मिश्रा की कहानी 'लिस्ट से गायब' एक पढ़ी-लिखी महिला की कहानी है जिसकी शादी एक बड़े अफसर से होती है. इसके बावजूद अपने पांव पर खड़े होने का उसका सपना पति के रुतबे के आगे सार्थकता खो देता है. लेकिन जब पति पर मुसीबत आती है, तब वह अपनी खुशियों की कुर्बानी देकर परिवार और पति की जरूरतों को पूरा करती हैं.
इसी भाव को उर्मिला शिरीष ने अपनी कहानी 'बिवाईयां' में दिखाया है. मैत्रेयी पुष्पा की लिखी कहानी 'फैसला' गांव की महिलाओं की वैचारिक आजादी का नया अध्याय खोलती है. कहानी ग्राम प्रधान वसुमति की है जो अपने विवेक का परिचय देते हुए अपने ही पति रनवीर के खिलाफ वोट डालती है. मृणाल पांडे की 'एक थी हंसमुख दे' यह उजागर करती है कि पुरुष प्रधान समाज में किस तरह उसूल और कानून केवल महिलाओं पर लागू होते हैं. मृदुला गर्ग की 'कितनी कैदें' महिलाओं की आजादी से जुड़ी एक लोकप्रिय कहानी है. यह उन कहानियों में से एक है जिसने महिला पर लिखी जाने वाली साहसिक कहानियों के लिए रास्ते बनाए.
इंदु बाली की 'तराजू' महिला की दिशाहीनता पर रोशनी डालती है. यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जो लिव इन रिलेशनशिप में रहकर प्यार को अपने हिसाब से परिभाषित करती है. प्रत्यक्षा की कहानी 'दिल, दो लड़कियां और इतना सा नश्तर' नई पीढ़ी की नौकरीपेशा महिला के एकाकीपन का चित्रण करती है. हालांकि, कहानी की पृष्ठभूमि पेरिस है. लेकिन गुड़गांव के पॉश अपार्टमेंट में रह रही लड़कियों की मनोदशा से मिलती-जुलती है.
कमल कुमार की कहानी 'अंतयात्रा' और कविता की लिखी 'नदी जो अब भी बहती है', भ्रूण हत्या की समस्या को उजागर करती है. ये दोनों कहानियां मां के अंतर्रद्वंद्व पर प्रकाश डालती हैं. एक मां अपने अंदर के अंश को बाहर निकल फेंके जाने पर कितना टूटती है, यह इस कहानी में संवेदनशीलता से दिखाया गया है.
चंद्रकांता की 'बनवास' परदेस में रह रही बूढ़ी महिला की बेबसी और बेगानेपन की कहानी है. वहीं सूर्यबाला की 'सांझवाती' बुढ़ापे की एक और समस्या को उठाती है. दो बेटों के बीच मां बाप के बंटवारे की टीस पाठकों तक पहुंचती है.
सुधा अरोड़ा की कहानी 'काला शुक्रवार' 1993 में मुंबई में हुए बम धमाकों के खौफनाक मंजर को दर्शाती है. प्रत्यक्षदर्शी की जुबान में लिखी गई यह कहानी इस ओर इशारा करती है कि किस तरह हादसों में मनुष्य असंवेदनशील बन जाता है. टीवी के रिएलिटी शो ने बच्चों पर कैसे बुरा असर डाला है, इस पर सुनीता जैन ने 'क्रेजी किया रे' कहानी लिखी है.
क्यों पढ़ें?
महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर अकसर लिखा जाता है. चर्चाएं भी की ही जाती हैं. लेकिन जिंदगी की असल आपाधापी की पृष्ठभूमि में किसी महिला के दिलो-दिमाग में चल रही उथल-पुथल समझनी हो, तो यह किताब बेहतर जरिया है. यह महिलाओं की नजर से ही महिलाओं की दुनिया की सैर कराती है.