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यादेंः जाना... धुनी, धुर विवेकी आलोचना के चिर सहचर नंदकिशोर नवल का

हिंदी आलोचना के 5 से भी अधिक दशकों के साक्षी रहे मूर्धन्य आलोचक प्रो नंदकिशोर नवल के निधन पर उनके व्यक्तित्व, कृतित्व व साहित्यिक अवदान पर साहित्य आजतक की विशेष प्रस्तुति

डॉ नंदकिशोर नवल [ फोटोः विनोद कुमार] डॉ नंदकिशोर नवल [ फोटोः विनोद कुमार]

हिंदी आलोचना के लगभग 5 दशकों से ज्यादा समय के साक्षी रहे मूर्धन्य आलोचक प्रो नंदकिशोर नवल इसी 12 मई को देर रात नहीं रहे. अपने सुदीर्घ लेखन में उन्होंने आलोचना को एक समावेशी दृष्टि से मंडित किया तथा प्रगतिशील लेखकों के साथ-साथ गैर प्रगतिशील कवियों पर भी उदारता से विचार किया. कई पत्रिकाओं के संपादक के रूप में उन्होंने हिंदी आलोचना को एक उदात्त परिप्रेक्ष्य दिया. उनके अवदान पर प्रकाश डाल रहे हैं हिंदी के सुधी समालोचक डॉ ओम निश्चल.
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हिंदी आलोचना को अपनी सक्रियता से सदैव गुलजार रखने वाले लेखक, आलोचक, गद्यकार नंदकिशोर नवल का जाना हिंदी आलोचना के लिए ही क्षति नहीं, उस अध्यवसायिता का भी अवसान है, जिसने हिंदी की हर करवट हर परिवर्तन को उदारता से लक्ष्य किया है तथा उसके उत्तरदायित्व का निर्वाह लेखक का अनिवार्य कार्यभार मान कर किया है. उनके न रहने पर अपूर्वानंद ने सूक्तबद्ध ढंग से उनके सारे कौल करार को बिन्दुवार जिस तरह रखा है, वह उनके आलोचक व्यक्तित्व को समझने के लिए एक दिशा देता है. लगभग छह दशकों तक हिंदी साहित्य के लगभग हर पहलू को अपनी आलोचना की आंख से देखने वाले नंदकिशोर नवल की प्रतिज्ञाओं और प्रतिश्रुतिओं की धमक उनके न रहने पर कहीं ज्यादा महसूस की जाएगी. उनके व्‍यक्‍तित्‍व का प्रबल पक्ष यह रहा कि उन्होंने शिगूफे नहीं छोड़े, जुट कर काम किया, बहुज्ञता के साथ कृतियों और कृतिकारों को पढ़ा, समझा, गुना और सहृदयता से उनका विवेचन किया. वे उस परंपरा के आलोचक थे जिसमें मुक्तिबोध, डॉ रामविलास शर्मा, प्रो. नामवर सिंह, डॉ मैनेजर पांडेय और प्रो परमानंद श्रीवास्तव जैसे लेखक आते हैं. 'द वायर' के अपने स्मरणालेख में अपूर्वानंद ने उन पर सर्वतोभावेन विचार करते हुए लिखा है कि ''विचारधारा की जकड़न से विचारों की स्वतंत्रता की नवल जी की यात्रा कष्टसाध्य रही. उन्हें खुद को ही कई जगह अस्वीकार करना पड़ा. लेकिन चूंकि उनकी प्रतिबद्धता रचनाकार से भी आगे बढ़कर रचना से थी, और विचारधारा से तो कतई नहीं, सो उन्हें खुद को बदलने में संकोच नहीं हुआ.''

हिंदी का हर लेखक खास तौर पर जो अध्यापन से संबद्ध रहा है, उसकी प्रतिष्ठा सर्वप्रथम एक अध्यापक के रूप में ही होती है. वह क्या कुछ लिखता है, उसकी मान्यता बाद में चल कर होती है. नवल जी अपने समय के उन तेजस्वी अध्या‍पकों में थे जिनकी कीर्ति स्वयं की अर्जित संकल्पबद्ध अध्यवसायिता से बनी थी. ऐसे अध्यापकों की पीढ़ी अब लुप्त हो चली है. साहित्य में जिस तरह की गुटबंदियां सक्रिय रही हैं, विचारधारा के कारण एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी लेखक होते हुए भी ऐसी गुटबंदियों में प्राय: उनकी रुचि नहीं रही. इसीलिए जीवन भर उन्होंने जो कुछ लिखना चाहा, बेरोकटोक लिखा और जहां उन्होंने प्रगतिशील लेखकों, कवियों मुक्तिबोध, निराला, प्रेमचंद व नागार्जुन को केंद्र में रखा तथा मुक्तिबोध पर 'मुक्तिबोध: ज्ञान और संवेदना' एवं 'मुक्तिबोध की कविताएं: बिम्ब् प्रतिबिम्ब', 'मुक्तिबोध: कवि-छवि', निराला पर 'निराला: कृति से साक्षात्कार', 'निराला: कवि-छवि' तथा नागार्जुन पर 'नागार्जुन और उनकी कविता' जैसी कृतियां लिखीं और संपादित कीं, वहीं सूरदास, तुलसीदास, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, अज्ञेय एवं दिनकर पर स्वतंत्र पुस्तकें लिखीं. यही नहीं उन्होंने हिंदी में लगभग अलक्षित राम इकबाल सिंह 'राकेश' पर जहां अपनी पुस्ताक 'शब्द जहां सक्रिय हैं' में लगभग बीस पृष्ठों का सुगठित आलेख लिखा वहीं आगे चल कर 'राकेश समग्र' तैयार किया. इसके अलावा 'रुद्र समग्र' एवं राजीवन शर्मा 'जीवन' समग्र का संपादन भी किया. यों तो वे प्रारंभ में कवि भी थे. पर बाद में आलोचना में प्रवृत्‍त हो जाने के कारण अपने कवि रूप को ओझल ही रह जाने दिया.
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आलोचना: बहुव्याप्ति
यह लगभग उनके आलोचना गुरु रामविलास शर्मा की ही आलोचना-सरणि थी जिसका अनुसरण नवल जी ने भी किया. यद्यपि उन पर मार्क्सवादी आलोचक का टैग अंत तक लगा रहा पर साहित्यिक प्रतिश्रुतियों के चयन में वे विचारधारा से तनिक च्यु्त भी हो सकते थे. दूसरे वे जिस समृद्ध साहित्यिक परंपरा से होकर निकले थे, उसे किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहते थे. उत्तर छायावादी दौर में पले और बढ़े तथा अपनी परंपरा के सभी बड़े लेखकों को गहरे अपनापे से पढ़ते हुए उनमें कालांतर में नई कविता के प्रति जो रुझान पैदा हुआ वह अंत तक बना रहा. यहां तक कि अपने उत्तर जीवन में उन्होंने सर्वाधिक किताबें नई कविता, समकालीन कविता पर ही लिखीं. उदाहरणत: 'कविता के आर-पार', 'समकालीन काव्य यात्रा', 'कविता: पहचान का संकट', 'शताब्दी की कविता', 'आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास' और 'हिंदी कविता: अभी , बिल्कुल अभी' आदि. एक आलोचक के रूप में उन्होने हिंदी आलोचना का विकास पर एक स्वतंत्र पुस्तक लिख कर हिंदी आलोचना की सुदीर्घ परंपरा व इस परंपरा के कृती लेखकों के आलोचनात्मक अवदान का विकासक्रम रेखांकित किया. आलोचना के समुचित मूल्यांकन एवं इतिहास लेखन जैसा काम नवल जी जैसा कोई इनसाइडर ही कर सकता था .

हिंदी का यह दुर्भाग्य रहा है कि हर लेखक कवि चाहता है कि उस पर लिखा जाए, उसकी कृतियों की चर्चा हो किन्तु वह आलोचक को भाव नहीं देता. यानी उसके किये धरे को वह सम्‍मान नहीं देता. आए दिन आलोचकों को लेकर हिंदी में ऐसे वक्तव्य दिए जाते रहते हैं. किन्तु आलोचक के अवदान पर ढंग की स्वतंत्र कृति बहुधा कम ही देखने को मिलती है. सामान्य तौर पर हम देखें कि नामवर सिंह के निधन के बाद अनेक पत्रिकाओं ने उन पर अंक निकाले पर सर्जनात्मक लेखकों की तुलना में उन पर बहुधा कम ही शोध हुए होंगे और बहुत ही कम स्वतंत्र पुस्तकें आई होंगी. जबकि इस मामले में उनके समकालीन अनेक सर्जनात्मक लेखकों कवियों पर तमाम किताबें आ चुकी हैं. हिंदी आलोचना के दिग्गज रामविलास शर्मा पर ही कितनी कम पुस्तकें लिखी गयी होंगी. यही हाल परमानंद श्रीवास्तव, प्रभाकर श्रोत्रिय व मैनेजर पांडेय का है. जिन प्रभाकर श्रोत्रिय ने हिंदी आलोचना को इतनी शुभ्र तेजस्वी भाषा दी, उन पर पुस्तक तो क्या ढंग के दो-चार लेख भी नहीं लिखे गए हैं जबकि उन्होंने कितने ही लेखकों पर मनोयोग से लिखा है. नंदकिशोर नवल के आलोचनात्मक अवदान पर भी मेरे ध्यान में इधर कोई उल्लेखनीय पुस्तक नहीं आई है. जो लोग आए दिन कवियों के लिए नए-नए काव्य शास्त्र एवं कसौटियों के मानक की मांग दुहराते रहते हैं उन्‍हें यह ध्यान देना चाहिए कि आलोचक के काम को बहुमान मिले, क्यों कि वर्तमान में ही आलोचना के क्षेत्र में आज भी मैनेजर पांडेय, नंदकिशोर आचार्य, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, अजय तिवारी, गोपेश्वर सिंह एवं रविभूषण से लेकर नई पीढ़ी के पंकज चतुर्वेदी, कृष्ण मोहन, शंभू गुप्त तक लगभग पचास लेखक संजीदगी से सक्रिय हैं, जिनके काम को गंभीरता से लिया जाता है. किन्तु आज भी सर्जनात्मक लेखक से आलोचक की कीर्ति का पलड़ा कहीं कमतर ही माना जाता है जबकि सर्जनात्मक लेखकों की तुलना में आलोचक का काम कहीं ज्यादा कठिन और चुनौतीपूर्ण होता है.
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लेखक का निजत्व
नंदकिशोर नवल जी ने अपने सुदीर्घ लेखन काल में अपने संस्मरण लिखे हैं जो 'मूरतें माटी और सोने की' के नाम से प्रकाशित हुई हैं. कहा जाता है आलोचक का गद्य रूक्ष होता है किन्तु् इस संस्मरणात्मक पुस्‍तक के जरिए नवल जी ने सिद्ध किया है कि वे इस नाजुक विधा के साथ भी न्याय कर सकते हैं. उन्होंने अनेक कवियों पर जीवंत संस्मरण टांके हैं. नागार्जुन पर 'लौट आ ओ फूल की पंखुरी' तथा इस पुस्तक में पुन: उन पर सुदीर्घ संस्मरण इस बात का परिचायक है कि आलोचक का गद्य भी रम्य हो सकता है. पहली बार उन्‍होंने अपने गांव-घर के चरित्रों पर खुल कर लिखा है. इसी पुस्तक के दूसरे खंड में उन्होंने हिंदी के पांच बड़े लेखकों नागार्जुन, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन, नलिनविलोचन शर्मा एवं नामवर सिंह पर संस्मरणात्मक लेख लिखे हैं तथा बीच-बीच में इनके रचना वैशिष्‍ट्य का विवेचन भी करते गए हैं. इन संस्मरणों से यह बात भी प्रकट होती है कि वे लेखकों को किस आधार पर अपने निकट पाते हैं. उनकी अपनी आलोचना की कसौटियां भी यहां धीरे-धीरे खुलती हैं और पंसद-नापसंद भी. आलोचना में जहां आलोचक को वस्तुनिष्ठ होना पड़ता है या कृति या पाठ केंद्रित वहीं संस्मरण में उसे छूट होती है कि वह किसी कवि या लेखक की किन बातों को विशिष्टता देता है. इस कृति में नवल जी का आत्मीय चेहरा प्रकट होता है. बड़का बाबू को सांवली सूरत मोहिनी मूरत कहते हुए वे जिस तरह उनके गुस्से, पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने और अंत समय में उनकी भावुकता का चित्रण करते हैं वह दिलचस्प है. पिता जी के बारे में भी उनके आब्जर्वेशन्स बहुत महीन हैं. वे कहते हैं, 'बाबू का जन्म् 1901 में हुआ था, हिंदी के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत के जन्म के एक साल बाद. पंत जी हिंदी के युगप्रवर्तक कवि हुए और बाबू की सारी मेधा मुकदमा लड़ने और घर चलाने में खर्च हो गई. उन्होंने मां-बाप के श्राद्ध के साथ दस ग्यारह लड़कियों का ब्याह भी किया और अपने चारों लड़कों को एमए तक पढ़ाया. उनकी एक मात्र सवारी हरकुलस साइकिल थी.....'' इस एक वाक्य से उन्होंने क्या कुछ नहीं कह दिया. पिता के संघर्ष और उनके उत्तरदायित्व के बारे में जिसे उन्होंने बखूबी निभाया. वे अपने पारिवारिक संस्मरण के बीच में ही दिनकर के एक किस्से का बयान करते हैं. दिनकर जी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए बरौनी कालेज में किसी निरीक्षण के लिए गए तो उनके एक स्वजातीय किसान ने कहा-''हो दिनकर जी, स्कूल, कॉलेज खोलकर आपने सभी दुसाध चमार को पढ़ा दिया. हर फार जोतने के लिए दो-चार को रहने भी दीजिएगा या नहीं? दिनकर जी ने उत्तर दिया, नहीं. आप लोगों ने उन्हें बहुत दिन तक दबा कर रखा. अब वह जमाना चला गया. अपना काम अपने हाथो ही करना होगा.'' पिता के बारे में और भी छोटी-छोटी बातें दर्ज करते हुए वे अपनी प्रगतिशीलता की रौ में उनके श्राद्ध समारोह को छुपाते नहीं बल्कि इसका वर्णन बहुत ही वात्सल्य भाव से करते हैं. यह उनकी प्रगतिशीलता का एक उदार छोर है. एक लहर टूटे ना- रवींद्र भ्रमर के इस गीत से शुरू यह संस्मरण, 'गांव की शोभा' तक जाता है जहां जगरनाथ बाबा की क्या खूब अहमियत रही है. ''पीस परिस्थितियों ने डाला''-तो जैसे गुरु जी बाबू रामसोहाग सिंह को समर्पित है. क्या आदर्शवादी व्यक्तित्व था उनका जिनमें आधुनिकता की चेतना इसी बात से समझी जा सकती थी कि उनकी आदर्श कृतियों में साकेत, प्रियप्रवास व कुरुक्षेत्र हुआ करता था. कितने आकुल होकर वे कहते हैं कि ''गांव की मेरी दुनिया तो उसी दिन उजड़ गयी जिस दिन गुरु जी इस दुनिया से विदा हो गए.'

नवल जैसे लेखक का निज क्या होता है यह तो उनके विवेचन की विपुल दुनिया को सामने रख कर देखा जा सकता है. जिसने अपने सामने साहित्य‍ के तमाम आंदोलनों को गुजरते हुए देखा हो, जो प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, समकालीन कविता का एक बड़ा अध्येता रहा हो, जिसने सूरदास, तुलसीदास जैसे हिंदी के बुनियादी कवियों पर बेहतरीन भाववादी आलोचनाएं लिखी हों, उसके जीवन की इस समावेशिता के लिए उपयुक्त उपमान मिलने कठिन हो रहे हैं. ''मूरतें- माटी और सोने की'' जैसी कृति नंदकिशोर नवल के आलोचक व्यक्तित्व को समझने के लिए एक कुंजी है. पटना में रहते हुए उनसे मुलाकात तो नहीं हुई पर फोन पर उनसे कई बार बातचीत हुई है. उनके लिखे को लेकर यदा कदा जिज्ञासाएं रही हैं. उन्होंने एकाधिक बार बुलाया भी पर यह संयोग सुलभ न हो सका. यद्यपि उनके लिखे का नियमित परायण करता रहा. खास तौर पर कविता पर केंद्रित उनकी कई पुस्तकें मेरे अध्ययन में शामिल रही हैं. जैसे 'कविता के आरपार', 'जहां शब्द सक्रिय हैं', 'कविता: पहचान का संकट', 'हिंदी कविता: अभी बिल्कुल अभी', और 'आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास'. जिन दिनों मैं कुंवर नारायण पर दो खंडों 'अन्वय' और 'अन्विति' में उन पर आलोचनात्मक लेखों का संकलन संपादन कर रहा था, मुझे कुंवर नारायण पर नवल जी का बेहतरीन आलोचनात्मक लेख पढ़ने को मिला था, उसे उन्होंने इस कृति में न केवल शामिल करने की अनुमति दी थी बल्कि छपने पर किताब के पहुंच जाने की सूचना भी दी थी.

नवल जी ने आलोचनात्मक लेखन के अलावा 'ध्वजभंग', 'सिर्फ', 'धरातल', 'उत्तरशती', 'आलोचना' और 'कसौटी' आदि कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है. 'आलोचना' में उनकी पहचान यों तो पहले से ही थी पर आलोचना में नामवर सिंह के साथ सह-संपादक का कार्यभार संभालने के बाद उनके आलोचक को विशेष पहचान मिलनी शुरू हुई. कहा जाता है कि नामवर जी की रणनीतिक संपादन शैली को अंजाम देने का काम लगभग वही करते थे तथा 'आलोचना' में क्या कुछ जाना है इसकी ज्यादातर रणनीति नामवर सिंह के निर्देशन में वही बनाते थे. एक दौर में अनेक सख्त आलोचनाएं आलोचना के लिए लिखवाई गयीं तथा अनेक प्रखर कवियों पर प्रहार भी हुए जो कि नामवर सिंह जी के संज्ञान के बिना संभव न था. इससे लेखकों की नाराजगी भी यदा कदा नवल जी को झेलनी पड़ती थी. आलोचना के 67वें अंक में ऐसे एकाधिक कवियों पर प्रहारात्मक लेख छापे गए जिन पर हो सकता है तब नवल जी की वैसी सहमति न रही हो. जैसे कि ज्ञानेन्द्रपति पर एक प्रतिकूल लेख, जिसका शीर्षक 'निष्प्रभ प्रयोजन संपन्न कवि के खतरे' जैसा कुछ था, यह बताता है कि नामवर जी की भृकुटि ज्ञानेन्द्रपति को लेकर टेढ़ी थी. पर ज्ञानेन्द्रपति को लगा कि नवल जी के रहते यह कैसे हुआ. इससे क्षुब्ध होकर ज्ञानेन्द्रपति ने तब एक चौपदा ही लिख डाला था: 'आलोचना की नवल शैली चली है.' यह चौपदा तब ऐसा प्रसंग चलने पर ज्ञानेन्द्रपति सुनाते भी थे. वाराणसी में होने वाली मुलाकातों में इस बाबत सवाल पूछे जाने पर यह चौपदा उन्होंने मुझे भी सुनाया था पर अपने उत्तर जीवन में नवल जी ने 'हिंदी कविता: अभी, बिल्कुल अभी' में ज्ञानेन्द्रपति पर एक बेहतरीन लेख लिख कर उनके विपुल यथार्थवादी काव्य वैभव की सराहना कर ज्ञानेन्द्रपति की शिकायत दूर कर दी. यही नहीं, यह पुस्तक भी उन्होंने अन्य तीन कवियों राजेश जोशी, अरुण कमल व आलोक धन्वा के साथ ज्ञानेन्द्र्पति को समर्पित की है. इस पुस्तक में उन्होंने ज्ञानेन्द्रपति के साथ विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, श्याम कश्य‍प, उदय प्रकाश व अरुण कमल पर भी आलेख शामिल किए हैं. दरअसल नामवर जी की यह रणनीति ही थी कि बातचीत में ज्ञानेन्द्रपति की चर्चा चलने पर आलोक धन्वा और विजेंद्र की चर्चा चलने पर ऋतुराज को वे बेहतर बताते थे. इसमें संदेह नहीं कि उनके सह संपादन और संपादन में 'आलोचना' ने नए प्रतिमान स्था्पित किए. बाद में 'कसौटी' के तमाम अंकों के जरिए नवल जी ने हिंदी की नई रचनाशीलता को अग्रसर किया, जिससे संजय कुंदन, प्रेमरंजन अनिमेष, शरद रंजन शरद, राकेश रंजन, संजय शांडिल्य जैसे कवि उभरे. आखिरी वर्षों में उनके शिष्यों ने लेखन में उनकी काफी मदद की. अनेक विशिष्ट कृतियां उन्होंने डिक्टेडशन देकर लिखवाईं, जिनमें उनकी पत्नी व युवा समीक्षक अरुण नारायण का विशेष सहयोग रहा है.
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आलोचकीय विवेक
प्राय: मार्क्सवादी लेखक जिस अड़ियल या जड़ीभूत दृष्टि के वशीभूत पाए जाते हैं, नवल जी ने यह छवि तोड़ने की कोशिश की. एक समय तक प्रतिबद्ध आलोचना लिखने के बाद उन्होंने भाव और रस के लिए सूरदास, तुलसीदास जैसे कवियों की ओर रुख किया और प्रयोगवाद के पुरोधा अज्ञेय पर स्वतंत्र पुस्तक लिख कर अपनी आलोचना की बहुव्यापकता का लोहा मनवाया. जिस तरह रामविलास शर्मा ने मार्क्सवादी लाइन से हट कर तुलसीदास, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी इत्यादि पर पुस्तकें लिखीं, उसी तरह नवल जी ने दिनकर, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, तुलसी, सूर व रीतिकालीन साहित्‍य पर लिखा. दिनकर को उन्होंने उनकी रूढ़ हो चुकी सत्ता‍नुगामी कवि छवि के विपरीत एक विशिष्ट कवि मान कर उन पर पुस्तक लिखी. वे मानते थे कि दिनकर की पहली प्रतिबद्धता भारतीय जनता के प्रति थी, हिंदुत्ववादियों की तरह न राष्ट्र के प्रति, न किसी दल के प्रति, और न किसी नेता के प्रति. आजादी मिलने के पहले से ही वे सत्ता प्राप्त कांग्रेस में विपक्ष की भूमिका निभाने लगे थे और आजादी मिलने के बाद तो उनका स्वर तल्ख से तल्ख होता गया. पटना प्रवास के दौरान हिंदी के अप्रतिम सौंदर्यशास्त्री कुमार विमल के साथ हुई अनेक बैठकों में नवल जी की अध्यवसायिता का जिक्र होता था. वे भी दिनकर के अत्यंत प्रेमी थी. उनकी संचयिता संपादित की है तथा उन पर पुस्तक भी लिखी है. मैं समझता हूं कि पिछले दो दशकों के दौरान पटना के सर्वाधिक सक्रिय लेखकों में एक तरफ नवल जी थे, दूसरी तरफ कुमार विमल. खगेंद्र ठाकुर के जाने के बाद पटना में ऐसा कोई वरेण्य लेखक-आलोचक नहीं रहा जिसका कद नवल जी या कुमार विमल जैसा हो.

प्राय: शुद्ध आलोचक इतिहास लेखन जैसे शुष्क काम करने का बीड़ा नहीं उठाते. पर नवल जी ऐसे लेखकों में थे जिन्होंने इतिहास लेखन का काम दस्तावेजीकृत किया. 'हिंदी आलोचना का विकास' भी ऐसी ही पुस्तक थी जिसे वे काफी पहले लिख चुके थे तो उत्तर जीवन में 'आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास' नामक पुस्तक लिख कर भारतेंदु हरिश्चंद्र व प्रेमघन से लेकर आधुनिकतम केदारनाथ सिंह व धूमिल तक के काव्य विवेचन का ऐतिहासिक कार्य उन्होंने विस्तारपूर्वक संपन्न किया है. वे भले ही प्रगतिशील आलोचक माने जाते रहे हों पर जब इतिहास लेखन का बीड़ा उठाया तो रामचंद्र शुक्ल के इतिहास लेखन की विशिष्टताओं व सीमाओं का ध्यान रखते हुए, रेनेवेलेक के सूत्रों को अपनाते हुए तथा नामवर जी के मार्गदर्शन के अनुसार पूर्ण चित्तवृत्ति के साथ अपनी काव्ययगत धारणाओं को सूत्रबद्ध किया है. उन्होंने हर कालखंड में महत्त्वपूर्ण कवियों को चुनते हुए गौण कवियों को छोड़ दिया है, जिसके पीछे उनका अपना दृष्टिकोण रहा है. इतिहास में उन्होंने उल्लेखनीय का ही प्रतिपादन किया है. इस इतिहास को धूमिल तक ही सीमित रखने के पीछे उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की नीति अपनाई है कि जो यहां शामिल नहीं है वे अभी इतिहास की सामग्री नही बने हैं. बस इसमें केवल दो अपवाद रहे हैं केदारनाथ सिंह व कुंवर नारायण. पर वे मानकर चलते हैं कि इन कवियों का व्यक्तित्व प्राय: निर्मित हो चुका है. वे कविताओं की पाठकेंद्रित आलोचना के भी पुरोधा रहे हैं तथा इस क्रम में उन्होंने कुकुरमुत्ता (निराला), असाध्य वीणा (अज्ञेय), चांद का मुंह टेढ़ा है, ब्रह्मराक्षस, भूल गलती (मुक्तिबोध़़) व आपकी हँसी (रघुवीर सहाय) आदि कई उल्लेखनीय कविताओं पर एक अलग ही पुस्तक लिखी- 'कविता के आर-पार' जिससे कि हिंदी में कविताओं की सटीक व्याख्या का पथ प्रशस्त हो.

नवल जी की पुस्तकों की भूमिकाएं भी उनके दृष्टिकोण का प्रस्ता‍व कही जा सकती हैं. साहित्य में तमाम बृहत्त्रयी बनाई गयीं. 'हिंदी कविता : अभी बिल्कुल अभी' की भूमिका में उन्होंने भी एक बृहत्त्रयी बनाई है : कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह व अशोक वाजपेयी की. दूसरी बृहत्त्रयी में धूमिल, लीलाधर जगूड़ी व चंद्रकांत देवताले की बनाई है. नवल जी मुख्यत: काव्यालोचक थे तथा आधुनिक हिंदी कविता के मर्मज्ञ. किन्तु आलोचना में जो गतानुगतिकता और भाषाई शिथिलता इधर आई है, उससे वे क्षुब्ध भी दिखते हैं. इसी पुस्तक में उन्होंने ऐसे काव्यालोचन का नमूना पेश किया है जिसमें 'तारतम्यता' जैसे शब्द प्रयुक्त हैं. इस भूमिका में उन्होंने भाषा के सर्जनात्मक स्वरूप पर भी विचार किया है. भाषा-भाषा चिल्ला‍ने वालों को वे व्याकरणिक शुद्धता के नाम पर आड़े हाथो लेते हैं. उन्हें यह चिंता थी कि उर्दू का नया से नया कवि भी गलत उर्दू नहीं लिखता जबकि उनकी समकालीन पीढ़ी के महत्त्वपूर्ण कवि भी अनेक बार भाषा में व्याकरणिक भूलें कर बैठते हैं. वे कहते थे मैं भाषा की शुद्धता का समर्थक अवश्य हूं पर किसी शुद्धतावाद का नहीं.

नवल जी ने अपनी सारी उम्र लेखन और अध्ययन को दी. अनेक पुस्‍तकें लिखीं. विभिन्न विचारधाराओं के लेखकों को अपनी आलोचना की परिधि में समाविष्ट किया. अनेक लेखकों को लेकर अपने मताग्रहों में सुधार भी किया. ज्ञानेन्द्रपति की काव्यकृति 'शब्द लिखने के लिए ही यह काग़ज़ बना है' पर आलोचना में प्रहार के बहुत बाद जब उनकी कविता पुस्तक 'गंगातट' 2001 के आसपास आई तो उन्होंने नामवर जी का प्रत्याख्यान करते हुए उनकी भाषाई सर्जनात्मकता को हिंदी कविता में ताज़गी का पर्याय माना तथा एक बेहतरीन आलेख लिखा जो उनकी किसी पुस्तक में बाद में संकलित हुआ. मुझसे एक बातचीत में ज्ञानेंद्रपति कहते हैं, ''एक आलोचक के रूप में उनका दृष्टि-परास बहुत विस्तृत है.'' उनके बारे में वे आगे कहते हैं कि ''वे एक सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी थे और उनसे साहित्यिक वार्तालाप करना ज्ञानानंद से भर देता था.'' वे बताते हैं, ''मैं जब पटना विश्वविद्यालय के बीएन कालेज में इंगलिश आनर्स का छात्र बन कर अध्ययनरत था तब नवल जी वहां हिंदी के प्राध्यापक थे. बेशक मैं उनका छात्र था, लेकिन उन्होंने हमेशा मुझे मित्र का दर्जा ही दिया. हमने साथ बहुत आवारगियां कीं, साथ-साथ घूमते, टहलते शहराती जीवन की परतों को उघार कर छिपी हुई वास्तविकता को लखने-परखने का यदि कुछ बौद्धिक कौशल मेरे हाथ लगा हो तो वह बेशक शुरुआती दिनों में उनके सान्निध्य से ही संभव हुआ होगा.'' ( एक वार्तालाप से )
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संस्‍मरणों में जीवन
मुझे ऐसा लगता है उनकी आखिरी कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में 'मूरते माटी और सोने की' को रेखांकित किया जाना चाहिए. एक आलोचक की कलम से न केवल खुद व खुद के परिवेश पर बल्कि कुछ लेखकों पर जैसे संस्मरण उन्होंने लिखे हैं, वे उनकी उदारचेता प्रतिभा के अचूक उदाहरण हैं. नवल जी में शुरुआती दौर में बेशक कुछ कट्टरता रही हो जो मार्क्सवादी लेखकों की विशेषता ही मानी जाती है पर बाद के वर्षों में उनका अध्ययनचेता लेखक, विचारधारा की संकीर्णताओं को तोड़ कर बहुत आगे बढ़ चला था. उनमें भारतीय वाड्.मय का आस्वाद लेने की इच्छा जाग उठी थी. कहां तो उन्होंने 'हिंदी कविता: अभी बिल्कुल अभी' की भूमिका में ही लिख दिया था कि अब आलोचना न लिखेंगे और आगे हिंदीतर महाकवियों कालिदास, विद्यापति व रवींद्रनाथ की कविता पर एक पुस्तक लिखेंगे, कुमार संभव पर लिखेंगे, पर बाद में कुमार संभव का अवलोकन करने पर पाया कि उस पर लिखना दुस्साहस है. उन्हें यह भान हुआ कि जिसके पास आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसा लालित्यबोध व उदात्त भाषा नहीं है व संस्कृत साहित्य का ज्ञान नहीं है उसका कालिदास पर कलम चलाना अनधिकारचेष्टा ही है. इसी तरह अन्यान्य कारणों से विद्यापति व कविवर रवींद्र पर लिखना भी संभव नहीं हो सका. उन्होंने संस्मरण लिखे तो उसमें चरित्रों को बहुत उजले प्रकाश में रखा. जो लोग संस्मरणों में चरित्रों पर कालिख पोतने का काम करते हैं, ऐसे लोगों की आलोचना भी उन्होंने की है. उनके मत से संस्मरण में प्रतिशोध भाव या आत्मप्रक्षेपण स्वीकार्य नहीं है. वे बेनीपुरी के प्रेमी थे. अत: उनकी संस्‍मरणात्‍मक कृति के शीर्षक में 'माटी की मूरतें' की अनुकृति है, जिसे उन्होंने स्‍वीकार भी किया है और इसीलिए उन्होंने यह कृति बेनीपुरी जी को ही समर्पित की है. सच कहें तो नवल जी को उनके पूरे परिवेश को उनके पसंदीदा लेखकों को जानने-समझने व उस पूरे दौर व साहित्यिक राजनीति को समझने के लिए यह पुस्तक अपरिहार्य है. नागार्जुन पर तो बहुत अधिक लिखा गया है. अनेक कृतियां और शोध कृतियां लिखी गयी हैं. अभी हाल ही में तारानंद वियोगी की सुदीर्घ जीवनी ही रजा फाउंडेशन से आई है, पर हिंदी के अप्रतिम आचार्य आलोचक प्रो नलिनविलोचन शर्मा पर उनका लिखा संस्मरण अद्वितीय है. पर इन सबमें नामवर जी से उनका अपनापा कुछ अलग ही रहा. काफी पहले से वे उनके सान्निध्य में थे. यों तो वे राजकमल चौधरी के निधन के बाद 'ध्वजभंग' नामक पत्रिका निकाल चुके थे, किन्तु आलोचना से जुड़ने के बाद नामवर जी का नैकट्य और भी प्राप्त हुआ. अनेक समयों पर कैसे नामवर जी ने उनके कामों की सराहना की. आलोचना से अलग होने का मलाल जरूर रहा पर उससे अलग होने के बाद भी कैसे नामवर जी उन्हें स्नेह देते थे यह संस्मरण उसकी एक विरल बानगी है. इस पुस्तक में भी उन्होंने यही लिखा कि यह मेरी आखिरी पुस्तक होगी पर 2017 में इस पुस्तक के आने के बाद भी उनका लेखन जारी रहा. यह सातत्य और नैरंतर्य कम लेखकों को हासिल होता है. एक बार यह प्रसंग उठा कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद के लिए आवेदन करें क्यों कि नामवर जी उस चयन समिति में थे. चयन संभव था. पर संयोग ऐसा बना कि वे पटना ही रह गए और इस बात पर संतोष जताते रहे कि दिल्ली होते तो लिखना-पढ़ना छूट जाता. पटना में रह कर वाकई एक एकांत साधक की तरह उन्होंने जो काम हिंदी साहित्य के क्षेत्र में किया है वह सचमुच स्तुत्य है. उन्होंने अपने विपुल और विभिन्न वैचारिक अवधारणा के लेखकों-कवियों पर लिख कर यह जताया कि मार्क्‍सवादी होकर भी साहित्य के व्यापक परिदृश्य के साथ कैसे समावेशी रूख अपनाया जा सकता है.
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# लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. उनकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. वे हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, फोन 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

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