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जयंती विशेषः देवेंद्र सत्यार्थी की आत्मकथा के अंश ‘आक के फूल, धतूरे के फूल’

समय की पिटारी में वे स्मृतियां आज भी बंद पड़ी हैं. पिटारी का ढकना उठाया नहीं कि पुरानी स्मृतियां जाग उठीं...सत्यार्थी जी की आत्मकथा के इसी अंश से

लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी [ फाइल फोटो] लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी [ फाइल फोटो]

‘लोकगीतों के यायावर’ नाम से प्रसिद्ध हिंदी के दिग्गज कथाकार और लोक साहित्य के उद्भट विद्वान देवेंद्र सत्यार्थी का जन्म 28 मई, 1908 को पंजाब के जिला संगरूर के भदौड़ गांव में हुआ. लोकगीतों की खोज के लिए पढ़ाई अधबीच छोड़कर घर से भागे. वर्षों तक पूरे भारत की अथक लोकयात्राएं की. महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर सरीखे युगनायकों ने उनके काम को सराहा और उनके काम को इस देश की ‘आत्मा की खोज’ कहा. सत्यार्थी जी किस्सागोई के बादशाह थे. वर्षों तक ‘आजकल’ पत्रिका संपादक रहे. उन्होंने बाल साहित्य, अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में भी बहुत काम किया. 12 फरवरी, 2003 को दिल्ली में निधन से पहले तक सत्यार्थी ने हिंदी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी में इतना विपुल साहित्य रचा कि उन्हें और उनकी याद को अनदेखा नहीं किया जा सकता. उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियों में लोक-साहित्य- ‘धरती गाती है’, ‘धीरे बहो गंगा’, ‘बेला फूले आधी रात’, ‘चित्रों में लोरियां’, ‘बाजत आवे ढोल’, ‘गिद्धा’, ‘दीवा बले सारी रात’, ‘पंजाबी लोक-साहित विच सैनिक’, ‘मैं हूं खानाबदोश’, ‘गाए जा हिंदुस्तान’, ‘मीट माई पीपल’ शामिल है.

सत्यार्थी की अन्य कृतियों में कहानी संग्रह- ‘चट्टान से पूछ लो’, ‘चाय का रंग’, ‘नए धान से पहले’, ‘सड़क नहीं बंदूक’, ‘घूँघट में गोरी जले’, ‘मिस फोकलोर’, ‘देवेंद्र सत्यार्थी की चुनी हुई कहानियां’, ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’, ‘कुंगपोश’, ‘सोनागाछी’, ‘देवता डिग पेया’, ‘तिन बुहियांवाला घर’, ‘पेरिस दा आदमी’, ‘नीली छतरीवाला’, ‘नए देवता’, ‘बांसुरी बजती रही’; कविता संकलन; ‘बंदनवार’, ‘धरती दीयां वाजाँ’, ‘मुडका ते कणक’, ‘बुड्ढी नहीं धरती’, ‘लक टुनूँ-टुनूँ’; संस्मरण तथा रेखाचित्र- ‘एक युग: एक प्रतीक’, ‘रेखाएँ बोल उठीं’, ‘क्या गोरी क्या सांवरी’, ‘कला के हस्ताक्षर’, ‘यादों के काफिले’; उपन्यास- ‘रथ के पहिए’, ‘कठपुतली’, ‘ब्रह्मपुत्र’, ‘दूधगाछ’, ‘कथा कहो उर्वशी’, ‘तेरी कसम सतलुज’, ‘घोड़ा बादशाह’, ‘विदा दीपदान’, ‘सूई बाजार’; आत्मकथा- ‘चाँद-सूरज के बीरन’, ‘नीलयक्षिणी’, ‘हैलो गुडमैन दि लालटेन’, ‘नाच मेरी बुलबुल’; यात्रा-वृत्तांत- ‘सफरनामा पाकिस्तान’ और साक्षात्कार- ‘देवेंद्र सत्यार्थी: नब्बे बरस का सफर’, ‘मेरे साक्षात्कार’ शामिल हैं.     

साहित्य सेवा के लिए भारत के सर्वोच्च पद्म अलंकरणों में से एक ‘पद्मश्री’ और हिंदी अकादमी, दिल्ली समेत अनेक संस्थाओं से सम्मानित देवेंद्र सत्यार्थी की जयंती पर साहित्य आजतक पर उनकी आत्मकथा का एक अंशः

आक के फूल, धतूरे के फूल
                                               -देवेंद्र सत्यार्थी

समय की पिटारी में वे स्मृतियां आज भी बंद पड़ी हैं. पिटारी का ढकना उठाया नहीं कि पुरानी स्मृतियां जाग उठीं. शायद इनका कोई क्रम नहीं, शायद इनका कोई अर्थ नहीं, ये स्मृतियां पिटारी से सिर निकालकर बाहर की हवा खाना चाहती हैं. बाहर की झलक देखना चाहती हैं.
घर में एक दुलहन आई है. रिश्ते में बालक की चाची है. मां कहती है, “यह तेरी मौसी है.” चाची-मौसी, मौसी—चाची! बालक की समझ में यह बात नहीं आती. दुलहन तो दुलहन है. शायद बालक इतना भी नहीं समझता. वह दुलहन के पास से हिलता ही नहीं. मां घूरती है. अब क्यों घूरती है मां? बालक कुछ नहीं समझ सकता.
मां खिलखिलाकर हंस पड़ती है, वह चाहती है कि बालक उसका अंचल पकड़कर भी उसी तरह चले, जिस तरह वह अपनी मौसी का अंचल पकड़कर चलता है. बालक यह नहीं समझ सकता. दुलहन भीतर जाती है जहां अंधकार है. बालक भी साथ-साथ रहता है. दुलहन कपड़े बदल रही है. “तुम भी साथ चले आए?” दुलहन हंसकर पूछती है. अंधकार के बावजूद वह बालक के गाल पर अपना हाथ रख देती है, उसे भींच लेती है.
कपड़े बदलकर, नया लहंगा पहनकर वह बाहर निकलती है. साथ-साथ बालक चलता है, सुनहरी गोट वाले मलगजी लहंगे से उसका हाथ नहीं हटता. दुलहन अपनी सखियों के साथ नहर पर जाएगी. वह सोचती है कि बालक उसके साथ इतना कैसे घुल-मिल गया. मां अपनी जगह है, दुलहन अपनी जगह. दुलहन बालक को छेड़ती है, “तेरे लिए भी ला दूंगी एक नन्ही-मुन्नी-सी दुलहन!”
बालक हंसता नहीं. वह यह सब नहीं समझ सकता. उसकी तो एक ही जिद है कि दुलहन के साथ ही बाहर जाएगा, जहां वह आक के फूलों को हाथ से मसल सकेगा, जहां वह धतूरे के फूलों को तोड़ सकेगा. दुलहन की सखियां उसे मना करेंगी. दुलहन कहेगी- बच्चा ही तो है, ले लेने दो एक फूल!
घर की बैठक. दरवाजे अंदर से बंद. खिड़की भी अंदर से बंद. वहां एक बीमार पड़ा है. वह कब से बीमार है, बालक यह सब नहीं जानता. वह क्यों बीमार है? कब अच्छा होगा? बालक से कोई यह मत पूछे. बालक बैठक में चला आता है. अंधकार में उसका हाथ सरककर बीमार के पास आ जाता है.
बीमार सब समझता है. वह उठता है. ऊपर रखी कोई चीज तलाश करता है. मिठाई. इसी मिठाई का एक टुकड़ा वह बालक के हाथ में थमा देता है. मिठाई का टुकड़ा लेकर बालक बाहर निकल गया. मिठाई कहां से आती है? बालक यह सब नहीं जानता. वह चाहता है कि उसे मिठाई मिलती रहे.
“आक के फूल, धतूरे के फूल: ये फूल तो अच्छे नहीं!” हर कोई यही कहता है. “इतनी मिठाई भी मत खाया करो!” मां डांट पिलाती है. बाबा जी हैं कि उसे पिन्नी का टुकड़ा जरूर देते हैं- मेथी वाली पिन्नी का कसैला सा टुकड़ा. बालक पिन्नी का टुकड़ा जरूर लेता है.
बाबा जी के पास हमेशा पिन्नियां रहती हैं. पिन्नी का टुकड़ा मुंह में डालते ही बालक थू करके इसे फेंक देता है. अब बाबा जी छोटा टुकड़ा देने लगे हैं. “पिन्नी अच्छी नहीं लगती तो लेता क्यों है?” मां समझाती है. बालक नाचता है, गाता है—
अक्क दे फुल्ल
धतूरे दे फुल्ल,
की की मुल्ल
दस्स, भैणाँ!
दस्स, वीरा!
ताया जी दी बरफी
बाबा जी दी पिन्नी.
(आक के फूल, धतूरे के फूल, इनका क्या-क्या मोल है? बताओ बहन! बताओ बीरन! ताया जी की बरफी, बाबा जी की पिन्नी.)
***

दुलहन कभी-कभी बालक को अपने साथ नहर पर नहाने के लिए भी ले जाती है. वह अपनी सखियों के साथ नहर में उतरती है. बालक कपड़े उतारे जाने के बाद भी सीढ़ियों पर ही खड़ा रहता है, पानी में उतरते उसे डर लगता है. दुलहन उसे अपनी बांहों में लेना चाहती है, वह भाग जाता है. दुलहन की सखियां उसे जबरदस्ती उठाकर एक-आध डुबकी देना चाहती हैं, बालक रोता है, चिल्लाता है.
दुलहन सोचती है कि बालक नहर पर आया ही क्यों था? बालक यह सब नहीं जानता. उसे नहाती हुई दुलहन को देखने का शौक है. नहर की पटरी से नीचे आक के पौधे हैं. बालक दौड़कर आक और धतूरे के फूल तोड़ लाता है. “मत तोड़ो ये फूल!” सखियां उसे मना करती हैं. दुलहन हंसकर कहती है, “अरे, यह बच्चा ही तो है! इसे तोड़ लेने दो आक के फूल, धतूरे के फूल!”
पिता जी ने चमार को बुलाकर कहा, “हमारे बेटे का नाप ले लो.” चमार बालक के पैरों का नाप लेता है और चला जाता है. बालक भी सबकी नजर बचाकर चमार के पीछे हो लेता है. चमारों की गली. संता चमार का घर. चमार अपने काम पर आ बैठा. सामने पत्थर की सिल पड़ी है, जिस पर वह अपनी आर को तीखी करता है, अपनी रंबी को तेज करता है. रंबी से चमड़ा काटता है. आर से चमड़े में सिलाई करता है. बालक यह सब देखता है और सोचता है कि उसे तो अपना जूता खुद ही तैयार करना चाहिए.
चमार उसे देखता है. “तुम इधर कैसे चले आए, बेटा?” चमार पुचकारता है. चमारिन हंसकर कहती है, “बच्चा ही तो है!” चमार रंबी से चमड़ा काटते हुए कहता है, “अरी पगली! लाला जी ने देख लिया तो इसे मारेंगे.”
संता सिंह किसी दूसरे बच्चे के लिए तैयार किए हुए लगभग उसी नाप के जूते उठाकर और बालक को साथ लेकर चल पड़ता है. आकर लाला जी से कहता है, “अपने बेटे को संभालकर रखा कीजिए, लाला जी! और ये लीजिए इसके जूते.” लाला जी कहते हैं, “इतनी जल्द तैयार भी कर लाया, संता सिंह? अच्छा तो ठीक है.”
फिर जब लाला जी को पता चलता है कि बालक संता सिंह के घर जा पहुंचा था, तो वह उसे घूरते हैं. संता सिंह कहता है, “इतना मत घूरो, लाला जी! अभी बच्चा ही तो है!”
लाला जी को याद आता है कि इसी तरह एक दिन उनका बेटा बख्शी खाँ चिट्ठीीरसां के घर जा पहुंचा था, जो छुट्टीख वाले दिन जिल्दसाजी का काम करता है. उससे बालक उर्दू के कायदे की जिल्द बंधवा लाया था. लाला जी बालक को घूरते हैं और डांटकर कहते हैं, “अंदर जाकर खेलो.”
स्कूल में बालक की पढ़ाई ‘कच्ची पहली’ में हो रही है. घर में उसकी पढ़ाई होती है ‘त्रिंजन’ में, जहां गली की लड़कियां, दुलहनें और माताएं मिलकर चरखा कातती हैं. बालक को किसी का चरखा पसंद है तो अपनी मौसी का, जो उसे आक और धतूरे के फूल तोड़ने से कभी मना नहीं करती, जो उसे बलपूर्वक नहर में डुबकी नहीं दिलाती.
श्राद्धों के दिनों में गली की लड़कियां ‘पूरो’ (अन्नपूर्णा, जिसे हिंदी में सांझी कहते हैं) बनाती हैं, लड़कों को वे अपनी पूरो नहीं दिखातीं. बालक है कि किसी-न-किसी तरह, और वह भी लड़कियों को दक्षिणा दिए बिना ही, मिट्टीर से बनाई गई देवी के दर्शन कर लेता है.
भोर के समय जब गली की लड़कियां गाती हुई नहर की ओर जाती हैं तो बालक की आंख खुल जाती है और वह उनके साथ जाने के लिए लालायित हो उठता है. जिस दिन लड़कियां अपनी-अपनी थाली में घी के दीये जलाकर नहर की ओर चल पड़ती हैं, बालक लड़कियों के साथ रहता है, पूरो का जल में प्रवाह कर दिया जाता है और ये दीये भी फूस के पूले पर रखकर पानी में बहा दिए जाते हैं. बालक की कल्पना में नए-नए चित्र उभरते हैं- आक के फूल, धतूरे के फूल, पानी में बहते हुए दीये...!
***

गांव के बाहर है ‘पत्थराँ वाली’, जहां शिवालय है और एक श्मशान भी. वहां बालक नहीं जाते, क्योंकि उन्हें डराया जाता है कि वहां भूत रहते हैं! बालक अपनी मौसी से बार-बार ‘पत्थराँ वाली’ चलने के लिए जिद करता है. एक दिन वह कुछ बालकों के साथ वहां जा पहुंचता है, डरकर पीछे भाग आता है. उसके साथ दूसरे बालक भी दौड़ आते हैं.
घर आकर बालक अपनी मौसी को बताता है कि किस तरह उसने उधर से एक भूत को आते देखा, जिसके मुंह से आग निकल रही थी. मौसी हंसती है और कहती है, “इसीलिए तो मैं तुझे उधर नहीं ले जाना चाहती थी. फिर कभी मत जाना उधर, नहीं तो भूत खा जाएगा.”
‘सत गुरियानी’ सरोवर से सटा हुआ एक दूसरा श्मशान है. वहां भी भूत बताए जाते हैं. बालक वहां भी नहीं जाते. मौसी के मना करने के बावजूद बालक एक दिन ‘सत गुरियानी’ तक हो आया. रात को उसने स्वप्न में देखा- बालकों का एक जमघट लगा है, सब बालक उसकी तरफ बांहें फैला रहे हैं, उसे अपने पास बुला रहे हैं!...मौसी ने सुना तो बोली, “फिर मत जाना ‘सत गुरियानी’!” लेकिन बालक का मन ‘पत्थराँ वाली’ और ‘सत गुरियानी’ जाने से बाज नहीं आता, जैसे वहां आक और धतूरे के फूल सबसे सुंदर हों.
मौसी फूला रानी कहानी सुनाती है. बालक को इस कहानी की फूला रानी पसंद नहीं, क्योंकि मौसी कई बार कह चुकी है कि फूला रानी तो कभी आक और धतूरे के फूलों को हाथ नहीं लगाती थी.
गांव के छोटे चौक में सभा लगी है, पक्का गाना गाया जा रहा है. पक्का गाना! बालक को लगता है, जैसे गाने वाले का सांस टूट रहा है. वह उससे कहना चाहता है, “देखो जी, आक और धतूरे के फूल सूंघा करो, फिर गाना गाया करो!”
बामा मीरसी कई बार शिव का रूप धारण करके बाजार में आता है. उसे साधारण वेश में देखकर भी बालक समझता है, शिव भगवान आ रहे हैं. वह ताया जी से मिली हुई बरफी या बाबा जी से मिली हुई पिन्नी का टुकड़ा बामा के हाथ पर ला रखता है और हंसकर कहता है, “इसे खा लो, महाराज!”
फिर एक दिन...ताया जी को आंगन में नहलाया जा रहा है. घर वाले रो रहे हैं. बालक यह सब नहीं समझ सकता. ताया जी को नहलाए जाने का दृश्य उसे याद रहता है...अब ताया जी कहीं नजर नहीं आते. मौसी कहती है कि ताया जी मर गए. बालक यह सब नहीं समझ सकता. वह तो यही जानता है कि अब बैठक में ताया जी की चारपाई नजर नहीं आती और अब उसका हाथ मिठाई के लिए आगे नहीं बढ़ सकता. बैठक में अब वह अंधकार नहीं है, दरवाजे खुले रहते हैं. बालक को इसका बहुत दुख है.
मौसी अब वह सुनहरी गोट वाला मलगजी लहंगा नहीं पहनती. इसका भी बालक को दुख है. सपने में वह देखता है- दुलहन ने वही लहंगा पहन लिया, उसने बालक को गोद में उठा लिया, वह उसे आक और धतूरे के फूल दे रही है. संता चमार के यहां बैठा बालक अपने हाथ से अपनी जूती सी रहा है! बख्शी खाँ के यहां बैठा बालक अपनी पुस्तक की जिल्द बांध रहा है! राँझा वैरागी के पास खड़ा बालक कबूतर उड़ा रहा है! नीली घोड़ी पर सवार होकर बालक उसे दौड़ाए लिए जा रहा है, कभी ‘पत्थराँ वाली’ जा पहुंचता है, कभी ‘सत गुरियानी’!...
जमीन कहीं-कहीं से ऊंची-नीची होने लगती है, कहीं-कहीं पहाड़ियां सिर उठाने लगती हैं! बालक इन पहाड़ियों की तरफ अपनी घोड़ी दौड़ाता है... बालक को यह नापसंद है कि जमीन एकदम सपाट हो.
***

कभी-कभी गांव में खानाबदोश आ निकलते हैं. गांव के बाहर ये ‘गड्डीदयां वाले’ अपनी गाड़ियां रोककर खेमे गाड़ देते हैं. उनके खेमों के पास चक्कर काटना बालक को बहुत पसंद है. खेमों से अजनबी आंखें बालक को अपने पास बुलाती हैं. नए-नए चेहरे देखकर बालक खुशी से नाच उठता है. मौसी बार-बार मना करती है, “ये तो खानाबदोश हैं, बच्चों को पकड़कर ले जाते हैं, इन पर कौन विश्वास करेगा?”
रात को सपने में बालक देखता है—वह भी खानाबदोशों के साथ शामिल हो गया है, घर पीछे रह गया, मां पीछे रह गई, मौसी पीछे रह गई!...
बालक उर्दू का कायदा पढ़ रहा है, उसका मन नहीं लगता. कभी उसके कानों में चिड़िया और काग की कथा का वह बोल गूंज उठता है, “चीं-चीं मेरा पूँझा सड़िया! क्यों पराया खिच्चड़ खादा?” (चीं-चीं, मेरी पूंछ जल गई. हाय, मैंने पराई खिचड़ी क्यों खाई!) कभी वह कायदा बंद करके गुनगुनाने लगता है, “वा वगी उड़ जाणगे, लक्क टुनूँ-टुनूँ!” (हवा चलेगी तो उड़ जाएंगे, कमर टुनूँ, टुनूँ!) कभी उसे लगता है जैसे आज भी पहले की तरह उसकी मां सवेरे जागने पर उसका मुंह धोते हुए गा रही है, “इच्ची-बिच्ची कोको खाए, घियो दी चूरी काका खाए.” (इच्ची-विच्ची यानी आंख का कीचड़ कोको—पंजाब की किंवदंतियों में भय का प्रतीक, खाए. घी की चूरी बालक खाए!)
कभी कायदा पढ़ते-पढ़ते उसे झपकी आ जाती है, वह देखता है—उसकी मौसी भागवंती एक छोटी-सी लड़की का रूप धारण करके उसके साथ खेलने चली आई है. उधर से भाभी धनदेवी भी नन्ही-मुन्नी-सी लड़की बनकर उछलती-कूदती आ रही है. दोनों ने उसे पकड़ लिया और उससे खेलने लगीं और गाने लगीं—
चीचो चीच कचोलियां
घुमियाराँ दो घर कित्थे जे?
ईचकनाँ पर मीचकनाँ
नीली घोड़ी चढ़ यारो
भंडा भंडारिया किन्ना कुभार?
इक्क मुट्ठीी चुक्क लै, दूजी नूँ तियार.
लुक छिप जाना
मकई दा दाना,
राजे दी बेटी आई जे.
(चीचो चीच कचोलियां. कुम्हारों का घर कहां है? ईचकने के ऊपर है मीचकना. यारो, नीली घोड़ी पर चढ़ो. हे भंडारे के भंडारी, कितना बोझ है? एक मुट्ठी के उठते ही दूसरी मुट्ठी तैयार है. ओ मकई के दाने, जल्दी से लुक-छिप जाओ, राजा की बेटी आई है.)
मौसी भागवंती जैसे देखते-देखते राजा की बेटी बन गई हो. धनदेवी पूछती हैं, “क्या मैं नहीं हूं राजा की बेटी?” बालक उनकी बांहों से निकलकर कहीं दूर भाग जाना चाहता है- दूर, बहुत दूर, नीली घोड़ी पर चढ़कर, जहां कोई यह न पूछे कि कुम्हारों का घर कितनी दूर है...‘इक्क मुट्ठीक चुक्क लै, दूजी नूँ तियार.’ जहां एक मुट्ठीी सिर से उठाते ही झट दूसरी मुट्ठीा का भार नहीं आ पड़ेगा...
मौसी भागवंती और भाभी धनदेवी पर बालक रंग डाल रहा है. होली के दिन हैं. उन्होंने भी तो उसे रंग से भिगो दिया....लोहड़ी के दिन हैं. दूसरे बच्चों के साथ मिलकर बालक द्वार-द्वार पर गाकर लकड़ी मांग रहा है, हाथ उठा-उठाकर सिर हिला-हिलाकर, जैसे सबसे अधिक मस्ती का अनुभव उसी को हो रहा हो, जैसे वही सब बच्चों का सरदार हो, सब उसके हुक्म में बँधे हुए गा रहे हों—
पा नी माई पा,
काले कुत्ते नूँ वी पा,
काला कुत्ता दे दुआई,
तेरियां जीवण मंझियां, गाईं.
(दान दो, माई दान दो, काले कुत्ते के लिए भी दान दो. काला कुत्ता दुआएं दे रहा है, तुम्हारी भैंसें और गायें जीती रहें.)
भीतर से मौसी भागवंती निकलकर सबके देखते-देखते बालक को गोद में उठा लेती है और कहती है, “वाह! अपने ही घर से दान लेने चले आए‌?” दूसरी ओर से भाभी धनदेवी आकर उसके सिर पर हाथ मारकर कहती है -
दो दड़िक्का, पिया पड़िक्का,
मां रानी घर होएया निक्का!
(दो दड़िक्का, पड़िक्का की आवाजें आईँ, मां रानी के घऱ बेटा हुआ है.)
फिर मां का चेहरा उभरता है. वह कहती है, “मै समझ गई, तुम्हें तो मौसी और भाभी ही अच्छी लगती हैं!”...और जब बालक की झपकी टूटती है, वह देखता है कि वह स्कूल के अहाते में पीपल के नीचे बैठा है जहां मास्टर जी उसे घूरते हुए कह रहे हैं, “तो यहां सोने के लिए चले आते हो? सोने के लिए घर होता है, पढ़ने के लिए स्कूल!”
बालक की कल्पना के द्वार बंद नहीं हो सकते. जैसे धनदेवी और भागवंती उसकी तरफ मकई का दाना फेंककर कह रही हों, ‘लुक छिप जाना, मकई दा दाना!’ जैसे मौसी गा रही हो—
हेरनी हो हेरनी
हेरनी छड्डियां लम्मियां,
मींह वरह्या ते कणकाँ जम्मियां,
कणकाँ विच्च बटेरे
दो साधू दे, दो मेरे.
(हेरनी ओ हेरनी! हेरनी ने लंबी कोंपलें छोड़ीं. मेंह बरसा तो गेहूं उगा. गेहूं के खेतों में हैं बटेर, दो साधु के, दो मेरे.)
जैसे बालक गेहूं के खेतों में बटेरे पकड़ रहा हो. खरगोश हाथ आ गया. बालक इस खरगोश को गांव में ले आया. गली के सिरे पर ही भागवंती और धनदेवी मिल गईं, यह खरगोश वे छीनने लगीं. बालक इस खरगोश को छोड़ना नहीं चाहता...उसकी झपकी टूटी तो क्या देखा कि मास्टर जी भी कुरसी पर बैठे ऊंघ रहे हैं. पीपल के पत्ते डोल रहे हैं. बड़ी उमस है. लड़के सब पसीना-पसीना, वह स्वयं भी पसीना-पसीना, मास्टरजी भी पसीने-पसीने. पीपल के पत्ते डोल रहे हैं. बालक सोचता है कि उससे तो पीपल के पत्ते ही अच्छे हैं.
***

बालक को स्कूल अच्छा नहीं लगता, वह यहां से भाग जाना चाहता है. उसे लगता है कि गेहूं के खेतों में बटेर भी उससे कहीं ज्यादा खुश होंगे. माई बसंतकौर की खंडहर ड्यो ढ़ी के सूराखों में रहने वाले जंगली कबूतर उससे कहीं ज्यादा खुश होंगे, और कहीं ज्यादा खुश होगा धीवरों का नौकर नूना, जिसने विवाह नहीं कराया, जिसका पोपला-सा मुंह किसी बुढ़िया का-सा है, जो प्रत्येक पक्षी की बोली की नकल उतार सकता है.
बालक चाहता है कि मास्टर जी वाली कुर्सी पर नूना बैठे, या भागवंती और धनदेवी में से ही किसी को यह स्थान मिल जाए, फिर देखो उसकी पढ़ाई कितने मजे से चलती है!...
पीपल के पत्ते डोल रहे हैं. मास्टर जी कड़ककर बालक से कहते हैं, “तो तुम फिर सो रहे हो?” एकाएक बालक की झपकी टूटती है: भय से उसका अंग-अंग कांप उठता है. यह कैसा भय है? एक दैत्य के समान मास्टर जी हाथ में बेंत लिए बैठे हैं. ‘चिड़ी बिचारी की करें? ठंडा पानी पी मरे.’
बालक सोचता है कि वह भी एक दिन मर जाएगा, चिड़िया के सामान तड़प-तड़पकर. उसे तो ठंडा पानी भी पीने को नहीं मिलेगा. किसी गीत का बोल उसकी कल्पना को छू जाता है—
तिन्न तीर, खेडन वीर,
हत्थ कमान मोढे तीर!
(तीन तीर, बीरन खेल रहे हैं. हाथों में कमान है, कंधों पर तीर.)
बालक सोचता है कि उसके हाथ में तीर-कमान कहां हैं? होता तो पहला तीर मास्टर जी पर ही छोड़ता. बालक सोचता है कि एक दिन मास्टर जी बालक बन जाएँगे और वह मास्टर जी बन जाएगा. उस समय वह मास्टर जी से गिन-गिनकर बदला लेगा.
उर्दू का कायदा. उसे हर शब्द कीड़ा-मकोड़ा प्रतीत हो रहा है. वह चाहता है कि कायदे को फाड़ डाले और उठाकर कागज के पुरजे मास्टर जी के मुंह पर दे मारे.
भय ही भय! हंसी-खेल के कीड़े-मकोड़े रींग रहे हैं. ‘चिड़ी बिचारी की करे? ठंडा पानी पी मरे.’ जीवन को निगल जाएगा यह भय एक दिन.
भय ही भय! लेकिन भय भी क्या बिगाड़ सकता है? फूल तो खिलेंगे, खिलते रहेंगे, आक के फूल, धतूरे के फूल! मिठाई तो मिलेगी, मिलती रहेगी. ताया जी की बरफी, बाबा जी की पिन्नी...यह बालक मैं स्वयं था और आस-पास की दुनिया अपनी आंखों से देख रहा था, इसमें न जाने कैसे-कैसे रंग भर रहा था.
आक के फूल खिल रहे थे- नन्हे-मुन्ने से फूल! धतूरे के फूल खिल रहे थे- बड़े-बड़े फूल!

#सौजन्यः अलका सोईं, देवेंद्र सत्यार्थी की पुत्री. संपर्कः 5-सी/ 46, नई रोहतक रोड, नई दिल्ली-110005.

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