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जन्मदिन विशेषः अनामिका की प्रेम के लिए फाँसी और दो चुनिंदा कविताएं

हमारे दौर की चर्चित कवयित्री अनामिका का जन्म 17 अगस्त, 1963 को बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ. आज उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक उनके संकलन 'पानी को सब याद था' से तीन चुनी हुईं कविताएं प्रस्तुत कर रहा.

अनामिका के काव्य संग्रह पानी को सब याद था का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन] अनामिका के काव्य संग्रह पानी को सब याद था का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

हमारे दौर की चर्चित कवयित्री अनामिका का जन्म 17 अगस्त, 1963 को बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी साहित्य में एमए, पीएचडी और डीलिट् की डिग्री हासिल की और दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीन सत्यवती कॉलेज के अँग्रेजी विभाग में अध्यापन करने लगी.  

अनामिका के सात कविता-संकलन, पाँच उपन्यास, चार शोध-प्रबन्ध, छह निबन्ध-संकलन और पाँच अनुवाद खूब चर्चित हुए. इनके पाठकों का संसार काफी बड़ा है. रूसी, अंग्रेज़ी, स्पेनिश, जापानी, कोरियाई, बांग्ला, पंजाबी, मलयालम, असमिया, तेलुगु आदि में इनकी कृतियों के अनुवाद कई पाठ्यक्रमों का हिस्सा भी हैं. तीन मूर्ति में फेलो के रूप में उनके शोध का विषय था ''वीविंग अ नेशन: द प्रोटो-फेमिनिस्ट राइटिंग्ज इन उर्दू एंड हिन्दी'

इनकी कृतियों में आलोचना की 'पोस्ट एलिएट पोएट्री: अ वॉएज फ्रॉम कांफ्लिक्ट टु आइसोलेशन, डन क्रिटिसिज़्म डाउन दि एजेज, ट्रीटमेंट ऑव लव एंड डेथ इन पोस्ट वार अमेरिकन विमेन पोएट्स; विमर्श—स्त्रीत्व का मानचित्र, मन माँजने की ज़रूरत, पानी जो पत्थर पीता है, स्वाधीनता का स्त्री-पक्ष; कविता- ग़लत पते की चिट्ठी, बीजाक्षर, समय के शहर में, अनुष्टुप, कविता में औरत, खुरदुरी हथेलियाँ, दूब-धान; कहानी- प्रतिनायक; संस्मरण- एक ठो शहर था, एक थे शेक्सपियर, एक थे चार्ल्स डिकेंस; उपन्यास- अवान्तर कथा, दस द्वारे का पींजरा; अनुवाद- नागमंडल गिरीश कर्नाड, रिल्के की कविताएं, एफ्रो-इंग्लिश पोएम्स, समकालीन अंग्रेज़ी कविता- अटलान्त के आर-पार, और विश्व साहित्य की स्त्रीवादी कविताएँ 'कहती हैं औरतें' शामिल है.

अनामिका को अब तक राजभाषा परिषद् पुरस्कार, भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, साहित्यकार सम्मान, गिरिजाकुमार माथुर सम्मान, परम्परा सम्मान और साहित्य सेतु सम्मान से नवाजा जा चुका है. आज उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक उनके संकलन 'पानी को सब याद था' से तीन चुनी हुईं कविताएं प्रस्तुत कर रहा.

अनामिका की ये कविताएँ सगेपन की घनी बातचीत-सी कविताएँ हैं. स्त्रियों का अपना समय इनमें मद्धम लेकिन स्थिर स्वर में अपने दु:ख-दर्द, उम्मीदें बोलता है. इनमें किसी भी तरह का काव्य-चमत्कार पैदा करने का न आग्रह है, न लगता है कि अपने होने का उद्देश्य ये कविताएँ उसे मानती हैं; उनका सीधा-सरल अभिप्राय उन पीड़ाओं को सम्बोधित करना है जो स्त्रियों और उन्हीं जैसी भीतरी-बाहरी यंत्रणाओं से गुज़रे लोगों के जीवन में इस पार से उस पार तक फैली हैं.
 
बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों, दादियों-नानियों, माँओं की बातों, मुहावरों, कहावतों में छिपे काल-सिद्ध सत्य का अन्वेषण अनामिका हमेशा ही करती हैं, सो ये कविताएँ भी लोक और जन-श्रुतियों की अनुभव-वृद्ध नाडिय़ों में जीवन-सत्य की, आत्म-सत्य की अनेक धाराओं से अपने मंतव्य को सींचती, पुष्ट करती चलती हैं.

1.
प्रेम के लिए फाँसी


मीरा रानी, तुम तो फिर भी ख़ुशकिस्मत थी,
खाप पंचायत के फ़ैसले
तुम्हारे सगों ने तो नहीं किए!
‘‘राणाजी ने भेजा विष का प्याला’’-
कह पाना फिर भी आसान था,
‘भैया ने भेजा’- ये कहते हुए जीभ कटती।
बचपन की स्मृतियाँ कशमकश मचातीं,
और खड़े रहते ठगे हुए राह रोककर
सामा-चकवा और बजरी-गोधन के सब गीत
‘राजा भइया चललें अहेरिया,
रानी बहिनी देली असीस हो न’!
हँसकर तुम यही सोचती-
‘भैया को इस बार मेरा ही
आखेट करने की सूझी!
स्मृतियों का कोष
चुक ही गया उस बेचारे का!
कौन डाकू ले गया उसकी बचपन की यादें?
बाबा ने भी हद ही की!
जो डाकू लूट नहीं सकते,
वह सब सम्पदा : त्याग, धीरज, सहिष्णुता।
मेरे ही हिस्से कर दीं,
क्यों उसके नाम नहीं लिखीं?’
 
2.
उसने कहा था

[स्कूल की हिन्दी शिक्षक, उमा दी को सादर समर्पित]

बूढ़ी कुँवारी उमा दी,
आठवीं कक्षा में उन्होंने हमको हिन्दी पढ़ाई थी,
‘उसने कहा था’ कहानी पढ़ाते हुए
वे थोड़ी गुमसुम-सी थीं!
वैसे तो आपातकाल शाश्वत भाव है देश का,
पर वह इमर्जेन्सी थी सन पहचहत्तर की!
पढ़ाते-पढ़ाते वे भटकीं ज़रा-सा
और धीरे-से कहा-
‘‘कुछ तो हो, कोई पत्ता तो कहीं डोले,
कोई तो बात होनी चाहिए जि़न्दगी में अब,
बोलने में समझने-जैसी कोई बात,
चलने में पहुँचने-जैसी,
करने में कुछ होने-जैसी तरंग!
सुनती हूँ, यह प्रेम में ही सम्भव है,
प्रेम में ही सम्भव है करना हर सरहद पार!
प्रेम से बड़ी हैं प्रेम की कहानियाँ!
प्रेम के या ख़ुदा के बारे में
ख़ूबसूरत बात ये ही है-
आदमी ने गढ़ा उनको या उन्होंने आदमी को,
ताल ठोंककर आप कह ही नहीं सकते!
जिसने भी जिसको गढ़ा हो, इससे क्या!
कल्पना ही सुन्दर है कि कुछ तो गढ़ा जाए,
कुछ तो हो...अच्छा, चलो, छोड़ो,
आज हम पढ़ेंगे एक प्रेमकथा!...
‘‘सृष्टि में चारों तरफ़ बिखरी हैं
प्रेम की कहानियाँ,
देखने की क़ुव्वत पैदा हो जाए अगर तो दीख सकता है
हर आदमी प्यारा,
हर चेहरा न्यारा
किसी-न-किसी कोण से!’’
इतने बरस बीते,
क्या जाने क्या बात थी उनमें,
उनका पढ़ाया हम कभी नहीं भूले,
प्रतिश्रुतियाँ ही पढ़ीं हमने कण-कण में,
लहना सिंह होकर ही
जिए-मरे!

3. 
भादों


उस दिन मैं कितनी छोटी पड़ गई थी-
एक बीज के खोल में समा जाने के लायक।
वो तो भला हो कि बोली टिटिहरी
और मैं चटकने लगी, बढऩे लगी पत्ती-पत्ती।
उस दिन बहुत रूखी मैं पड़ गई थी
प्यास से टटाई हुई जीभ जितनी!
वो तो भला हो कि ऐ दादुर,
तुम ताज़ा कीचड़ की गंध लिये घर में घुसे
शास्त्रीय गीतों के बोल से निकलकर
बैठ गए पिढिय़ा से सटकर!
एक अकेली चाय पीती हुई
अपने बिस्तर पर
मैं तुमको देखने लगी,
फूट पड़े सोते हज़ारों
मेरे भीतर,
मेरे बाहर!
एक अकेले प्राण में भी
कितना संचार छुपा होता है सचमुच!
रागों का पूरा संसार छुपा होता है
गोद से उतार दी गई
बैरागिन वीणा में भी!...
वो निर्भया का इकतारा, ताक पर पड़ा,
वो उसकी गुडिय़ा, मेरी गुडिय़ा?
***
पुस्तकः पानी को सब याद था
लेखकः अनामिका
विधा: कविता
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
कीमतः रुपए 150/- पेपरबैक
पृष्ठ संख्याः 167

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