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फोन की ‘रिश्वत’ देकर बच्चों को करा रहे चुप! एक्सपर्ट ने भारतीय पेरेंट्स को दी नसीहत

आजकल माता-पिता बच्चों को चुप कराने के लिए मोबाइल का सहारा ले रहे हैं. लेकिन डॉक्टर चेतावनी दे रहे हैं कि ये आदत बच्चों के मानसिक विकास, नींद और व्यवहार पर गहरा असर डाल सकती है. स्क्रीन ब्राइबिंग बच्चों के लिए खतरनाक हो सकती है.

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बच्चा बहुत ज्यादा मोबाइल या टैबलेट देखता है तो उसमें कुछ समस्याएं हो सकती हैं. (Photo: ITG)
बच्चा बहुत ज्यादा मोबाइल या टैबलेट देखता है तो उसमें कुछ समस्याएं हो सकती हैं. (Photo: ITG)

रोते बच्चों को मोबाइल देकर चुप कराना आजकल ट्रेंड बन गया है. रेस्टोरेंट हो, ट्रेन हो, घर हो या फिर डॉक्टर का क्लिनिक हर जगह एक ही नजारा दिखता है. बच्चा चुपचाप मोबाइल या टैबलेट की स्क्रीन में खोया रहता है. इस चक्कर में माता-पिता को उसके रोने-धोने और जिद से छुटकारा मिल जाता है. कुछ समय में बच्चों को चुप कराने, खाना खिलाने या थोड़ी देर शांति पाने के लिए मोबाइल थमा देना सबसे आसान तरीका लगने लगता है.

स्क्रीन देखते ही बच्चा शांत हो जाता है और माता-पिता भी बेफिक्र हो जाते हैं. लेकिन डॉक्टर और एक्सपर्ट्स के नजरिए में बच्चों की ये खामोशी, माता-पिता के लिए शांति नहीं बल्कि चेतावनी है. उनका कहना है कि इस तरह बच्चों को फोन या टैबलेट पकड़ा देने का असर लंबे समय में बच्चों के दिमाग, व्यवहार और भावनाओं पर पड़ सकता है. तो सवाल ये है कि बच्चों को चुप कराने के लिए स्क्रीन दिखाना, यानी स्क्रीन ब्राइबिंग, क्या वाकई बच्चों के लिए सही है?

क्या है ‘स्क्रीन ब्राइबिंग’ की आदत?
आजकल ज्यादातर माता-पिता बच्चे को खाना खिलाने, सुलाने या बाहर ले जाते समय मोबाइल या टैबलेट थमा देते हैं. ऐसा करने से बच्चा स्क्रीन देखते ही शांत हो जाता है और उन्हें कुछ पल का सुकून मिल जाता है. इसी आदत को एक्सपर्ट्स ‘स्क्रीन ब्राइबिंग’ कहते हैं. यानी बच्चे को संभालने या चुप कराने के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल करना. शुरुआत में ये एक आसान उपाय लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत बच्चे की हेल्थ और डेवलपमेंट पर असर डालने लगती है.

डॉक्टर बच्चों में क्या बदलाव देख रहे हैं?
बच्चों के डॉक्टर्स के मुताबिक, अगर कोई बच्चा बहुत ज्यादा मोबाइल या टैबलेट देखता है तो उसमें कुछ परेशानियां हो सकती हैं. कई बच्चों को ठीक से नींद नहीं आती, वो देर से बोलते हैं और उनका ध्यान भी जल्दी भटक जाता है. ऐसे कई बच्चे हैं, जिनमें ये समस्याएं देखने को मिली है. 

इतना ही नहीं कुछ बच्चे जल्दी चिड़चिड़े हो जाते हैं, उन्हें सबके साथ नहीं बल्कि अकेले खेलना पसंद आने लगता है और लोगों से बात करना भी अच्छा नहीं लगता है. ये समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती हैं, इसलिए अक्सर माता-पिता को समय पर खतरा समझ नहीं आता.

बच्चे के दिमाग पर पड़ता है स्क्रीन का असर
बचपन में बच्चे का दिमाग बहुत तेजी से डेवलप होता है. इस समय उन्हें बातचीत, खेलने, सवाल-जवाब और भावनात्मक जुड़ाव की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. जब बच्चा स्क्रीन में उलझा रहता है, तो वो अपने आस-पास की दुनिया से कटने लगता है. वो कम बोलता है, कम सुनता है और लोगों के भाव समझने में पीछे रह जाता है. स्क्रीन उसे व्यस्त तो रखती है, लेकिन सीखने का मौका छीन लेती है.

स्क्रीन पर क्यों निर्भर हो रहे हैं माता-पिता
ज्यादातर सभी माता-पिता जानते हैं कि चाहे वजह कोई भी हो ज्यादा मोबाइल सही नहीं है, फिर भी वो बच्चों को चुप कराने से लेकर अपने आप फ्री रहने के लिए उन्हें मोबाइल थमा देते है. माता-पिता के ऐसा करने की वजह पर गौर फरमाएं तो वो थकान, काम का दबाव और समय की कमी होती हैं. दरअसल, आजकल ज्यादातर घरों में दोनों माता-पिता नौकरी करने वाले होते हैं. उनकी मदद के लिए कोई नहीं होता है, ऐसे में मोबाइल उनका सबसे आसान सहारा बन जाता है. धीरे-धीरे यही सहारा आदत बन जाता है और बच्चा बिना स्क्रीन के रहना ही नहीं चाहता.

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ये आदत बन जाती है खतरनाक
अगर आपका बच्चा हर परेशानी में मोबाइल मांगने लगे और आप उसे उसके कहते ही देने लगें, तो वो अपनी भावनाओं/इमोशंस से निपटना नहीं सीख पाता है. ना ही उसे इंतजार करना आता है, ना ही खुद को संभालना. डॉक्टर्स की मानें तो आगे चलकर ऐसे बच्चों में पढ़ाई में मन ना लगना, गुस्सा जल्दी आना और चीजों से जल्दी ऊब जाना जैसी समस्याएं देखी जाती हैं. यानी जो स्क्रीन आज राहत देती है, वही कल मुश्किल बन सकती है.

बच्चों को चुप कराने के लिए स्क्रीन नहीं इस चीजों को करें माता-पिता
बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत स्क्रीन की नहीं बल्कि समय और ध्यान की होती है. आप उन्होंने फोन या टैबलेट पकड़ाने के बजाय उनसे बात करें, उन्हें कहानियां सुनाएं, उनके साथ खेलें. ये छोटी-छोटी चीजें उनके दिमाग और दिल दोनों को मजबूत बनाती हैं. अगर बच्चा ऊब रहा है, तो आप उसे अपने साथ घर के छोटे कामों में शामिल कर सकते हैं. इस तरह से आप उनका स्क्रीन टाइम एकदम बंद करने के बजाय धीरे-धीरे कम कर सकते हैं.

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