The Physics Of Crispy Dosa: सुबह या शाम को अधिकतर लोग जो हल्का स्नैक्स खाना चाहते हैं, डोसा अक्सर उन लोगों की पहली पसंद होता है. अब या तो वो मार्केट में डोसा खाते हैं या फिर घर पर ही डोसा बनवाते हैं. यदि आपको घर में आप या आपकी मां-दादी डोसा बनाती होंगी तो आपने देखा होगा कि वो तवे पर पानी की कुछ बूंदें छिड़कती हैं और वे इससे पता लगा लेती हैं कि तवा डोसा बनाने के लिए तैयार है या नहीं. IIT मद्रास के प्रोफेसर महेश पंचग्नूला के मुताबिक, यह कोई साधारण परंपरा नहीं बल्कि फिजिक्स है.
18वीं शताब्दी में जर्मनी में खोजा गया 'लिडेनफ्रॉस्ट इफेक्ट' सदियों से भारतीय रसोइयों में इस्तेमाल हो रहा है जो यह बताता है कि आपका डोसा परफेक्ट और क्रिस्पी बनेगा या नहीं.
प्रोफेसर महेश पंचग्नूला का कहना है जब किसी सतह (जैसे लोहे का तवा) को एक निश्चित तापमान से बहुत अधिक गर्म किया जाता है तो उस पर गिरने वाला लिक्विड तुरंत नहीं गर्म होगा. पहले पानी की बूंद के नीचे भाप की एक बहुत पतली सेफ्टी लेयर बनती है. यह भाप की परत पानी को गर्म सतह के सीधे संपर्क में आने से रोकती है. यही कारण है कि पानी की बूंदें भाप बनकर उड़ने के बजाय तवे पर डांस करने लगती हैं. आसान शब्दों में समझें तो किसी भी लिक्विड और तवे के बीच भाप की परत बन जाती है.
डोसा बनाने का सही तरीका पूरी तरह तवे के सही तापमान पर निर्भर करता है. प्रोफेसर महेश का कहना है अगर तवा बहुत ठंडा है तो घोल तवे पर चिपक जाएगा और डोसा टूट जाएगा. वहीं अगर तवा जरूरत से ज्यादा गर्म है तो घोल सतह को पकड़ ही नहीं पाएगा और डोसे में जले हुए निशान या छेद हो जाएंगे. जब पानी की बूंदें छिड़कते हैं तो पानी की बूंदों का 'वाटर डांस टेस्ट' हमें वह सटीक 'स्वीट स्पॉट' बताता है जहां तवा इतना गर्म होता है कि घोल चिपके नहीं, लेकिन इतना भी गर्म नहीं कि वह जल जाए.
अगली बार जब आप डोसा बनाएं तो दादी की उस पुरानी ट्रिक को जरूर याद करें. यह सिर्फ खाना बनाने का तरीका नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि हमारे घरों में जो पारंपरिक तरीका उपयोग होता आ रहा है वो सिर्फ तरीका नहीं बल्कि एक पूरी तरह जांचा-परखा हुआ साइंस है.