ऑस्ट्रेलिया में जल्द ही बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर बैन लग सकता है जिसके लिए ऑस्ट्रेलिया की सरकार एक कानून बनाने की तैयारी कर रही है. इसका मकसद बच्चों को सोशल मीडिया के खतरनाक प्रभावों से बचाना है, साथ ही उन्हें वर्चुअल वर्ल्ड की जगह रियल वर्ल्ड में रखा जा सके. यह बैन 14 साल से कम उम्र के बच्चों पर लागू हो सकता है.
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने एक्स पर घोषणा कर कहा कि सरकार बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करने की न्यूनतम आयु सीमा तय करने की दिशा में काम करेगी और बच्चों पर सोशल मीडिया ऐप्स के यूज पर बैन के लिए एक कानून बनाएगी.
यह बैन बच्चों के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल को सीमित करेगा. अक्टूबर के अंत तक बच्चों के लिए सोशल मीडिया के यूज की आयु सीमा तय कर ली जाएगी. रिपोर्ट्स के अनुसार, यह सीमा 14 वर्ष या 16 वर्ष हो सकती है. ऑस्ट्रेलियाई सरकार के अनुसार, इस कानून के 2024 के अंत तक पारित और लागू होने की उम्मीद है.
बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन क्यों?
अल्बनीज ने कहा, 'मैं बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस से दूर फुटबॉल के मैदान और स्विमिंग पूल और टेनिस कोर्ट पर देखना चाहता हूं. उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि बच्चे वर्चुअल नहीं बल्कि रियल वर्ल्ड में रियल लोगों के साथ रहें क्योंकि हम जानते हैं कि सोशल मीडिया समाज को नुकसान पहुंचा रहा है.'
ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के साथ एक साक्षात्कार में अल्बनीज ने कहा कि अलग-अलग रिसर्च में साबित हुआ है कि सोशल मीडिया एक तरह की नशे की लत है जिसकी पहुंच बहुत तेज है और ये हमारे बच्चों को नुकसान पहुंचा रही है.
सोशल मीडिया शराब और सिगरेट की तरह
ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने यह कहते हुए कि बच्चों पर सोशल मीडिया का प्रभाव सिगरेट या शराब से अलग नहीं है, वो इसके यूज को सीमित करने की दिशा में काम कर रही है.
दुनिया भर के डॉक्टर और मनोवैज्ञानिकों का भी कहना है कि स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है. यह बच्चों में अवसाद का भी कारण बनता है. यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया से पहले स्वीडन में भी दो साल से कम उम्र के बच्चों के मोबाइल देखने पर बैन लगाया गया था. मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में मौजूद लाखों सोशल मीडिया ऐप्स के मकड़जाल में बच्चों को फंसने से बचाने के लिए यूरोप और कई एशियाई देशों में ऐसे कदम उठाए गए हैं.
रोनाल्डो ने बेटे को नहीं दिया फोन
कुछ समय पहले दुनिया के महान फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो का एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा था जिसमें वो बताते हैं कि उन्होंने अपने 11 साल के बेटे को फोन क्यों नहीं दिया था जो उसके लिए एक बढ़िया गिफ्ट हो सकता था.
उन्होंने बताया, 'मैंने सोचा कि इस तरह रोनाल्डो जूनियर अपनी उम्र के कई बच्चों की तरह 'तकनीक के प्रति जुनूनी' हो सकता है. मेरा सबसे बड़ा बच्चा जल्द ही 12 साल का होने वाला है और वह मुझसे हर बार पूछता है. डैडी क्या मुझे एक फोन मिल सकता है. क्या मुझे एक फोन मिल सकता है.'
रोनाल्डो क्यों नहीं देते अपने बच्चों को फोन
उन्होंने कहा, 'मैं भी जानता हूं कि यह युवा पीढ़ी अपनी उम्र से एक कदम आगे है इसलिए मैं सहमत हूं कि हमें इसका फायदा उठाना चाहिए लेकिन तकनीक के प्रति जुनूनी नहीं होना चाहिए. उन्हें कुछ समय के लिए फोन दें, लेकिन हर समय इस्तेमाल ना करने दें. मैं अपने बेटे को यह समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि वह जो कुछ भी चाहता है, उसे पाना आसान नहीं है. शिक्षा ही वह सबसे अच्छी चीज है जो मैं उसे दे सकता हूं.'
रोनाल्डो ने एक अन्य वीडियो में कहा था, 'वह अपने बच्चे को फोन इसलिए भी नहीं देते क्योंकि इससे वह अपनी पूरी क्षमता को कभी पहचान नहीं पाएगा. अभी वह दौड़ने जाता है, खेलने जाता है.'
बिल गेट्स ने बच्चों को नहीं दिया फोन
आपको जानकर हैरानी होगी कि माइक्रोसॉफ्ट के फाउंडर और कंप्यूटर प्रोग्रामर बिल गेट्स ने 2007 में अपनी बेटी के फोन देखने का टाइम फिक्स कर दिया था क्योंकि उनकी बेटी को वीडियो गेम्स की लत होने लगी थी जिससे उसका स्वास्थ्य खराब होने लगा था. उन्होंने अपने बच्चों को 14 साल की उम्र तक सेल फोन नहीं लेने दिया.
स्टीव जॉब्स जो 2012 में अपनी मृत्यु तक एप्पल के सीईओ थे, ने 2011 में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्होंने अपने बच्चों को हाल ही में लॉन्च हुए नए आईपैड का उपयोग करने से मना किया था. जॉब्स ने रिपोर्टर निक बिल्टन से कहा, 'हम अपने बच्चों को घर पर कितनी तकनीक का उपयोग करना है, यह सीमित कर देते हैं.'
आज भारत समेत दुनिया भर में बेहद कच्ची उम्र में ही बच्चे फोन का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं. भारत में अक्सर मां-बाप को अपने एक से दो साल के बच्चों को भी बहलाने के लिए फोन थमा देते हैं. यहां तक कि कुछ घरों में बच्चे बिना फोन दिए खाना तक नहीं खाते हैं. इसका बुरा असर ये होता है कि बच्चे शारीरिक रूप से तो सुस्त हो ही जाते हैं बल्कि उनकी सोचने-समझने की क्षमता और रचनात्मकता भी धीरे-धीरे खत्म हो जाती है.
विज्ञान को वरदान की तरह इस्तेमाल करें
यह बताने की जरूरत नहीं है कि विज्ञान और तकनीक हमारे लिए कितनी फायदेमंद है. इस आधुनिक दुनिया में हर देश को मजबूत, ताकतवर और विकसित होने के लिए विज्ञान और तकनीकी की जरूरत है और इसी तरह इंसान को मौजूदा दौर में खुद को विकसिन करने के लिए विज्ञान और तकनीक से अपडेट रहने की जरूरत है लेकिन अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती और यही वजह है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया की दुनिया में डूबकर लोगों ने खुद को एक नकली दुनिया तक सीमित कर लिया है और बच्चों पर इसका असर बहुत ही बुरा हो सकता है.
क्या कहते हैं डॉक्टर
नोएडा के यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी में कंसल्टेंट साइक्रिएट्रिस डॉक्टर मधुर राठी बताते हैं, 'सोशल मीडिया बच्चों के लिए अच्छा नहीं है. खासकर कोविड के बाद से बच्चों के बीच इसका यूज बहुत ज्यादा बढ़ा है क्योंकि उस समय बच्चों के पास दूसरों से जुड़ने का यही एक जरिया था. लेकिन अब लोगों के लिए कोई पाबंदी नहीं है लेकिन फिर भी लोग मिलने के बजाय सोशल मीडिया पर कनेक्ट होने और समय बिताना पसंद करते हैं जिससे बच्चे भी अछूते नहीं हैं.'
उन्होंने कहा, 'क्लासरूम से लेकर स्टडी मटीरियल भी मोबाइल और सोशल मीडिया पर उपलब्ध है जिसकी वजह से भी बच्चे इसके आदी होते जा रहे हैं. इसलिए हर तरह की चीजों में संतुलन होना बेहद जरूरी हैं.'
सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव
डॉक्टर मधुर राठी ने बच्चों पर पड़ने वाले सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव भी गिनाए.
1-सोशल मीडिया की लत आपके दिमाग पर बुरा असर डालती है. इससे बच्चों को नींद की समस्या हो सकती है.
2-सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने से चिंता और अवसाद हो सकता है. सोशल मीडिया पर बच्चे कई बार दूसरे बच्चों के पास ऐसे खिलौनों और गैजेट्स को देखते हैं जो उनके पास नहीं होतीं जिनसे उनके अंदर भी उसे पाने की इच्छा उत्पन्न होती है जिससे सोशल मीडिया एंग्जायटी डिसऑर्डर हो सकता है.
3-सोशल मीडिया पर बच्चों के लिए साइबर बुलिंग, हैकिंग, हेट स्पीच जैसे अपराधों का खतरा ज्यादा है क्योंकि उनके अंदर इतनी समझ नहीं होती.
कैसे बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखें
बतौर माता-पिता आप अपने बच्चे की पसंद-नापसंद और आदतों को अच्छी तरह जानते होंगे. ऐसे में मां-बाप को सबसे पहले अपने बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की कोशिश करनी चाहिए जिसके लिए वो इन तरीकों को आजमा सकते हैं.
1-बच्चों को इनडोर और आउटफोड एक्टिविटीज के लिए प्रोत्साहित करें. उन्हें पार्क में लेकर जाएं और अलग-अलग खेलों से उन्हें रूबरू कराएं. उन्हें दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित करें.
2-जब बच्चे घर में हो तो उन्हें चेस, बोर्ड गेम, वर्ड गेम्स, कार्ड गेम, लुका-छिपी, अंताक्षरी, डंब शराज जैसे मजेदार इनडोर गेम्स के लिए प्रेरित करें जिनमें आप भी उनके साथ शामिल हो सकते हैं.
3-बच्चे को उसकी उम्र के हिसाब से आर्ट एंड क्राफ्ट्स की चीजें दें ताकि वो सोशल मीडिया की जगह इस तरह की एक्टिविटीज में शामिल हो सकें.
4-अपने बच्चे को किताबों की दुनिया से रूबरू कराएं. उन्हें काल्पनिक, साहस, रोमांच कहानियों से लेकर जीवनियों को पढ़ने के लिए दें.
5- अपने बच्चों के अंदर एक्सपेरिमेंट्स के प्रति रुचि पैदा करने की कोशिश करें. आप उन्हें विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी से जुड़ी किट्स लाकर दें और उन्हें नए आविष्कार करने के लिए इंस्पायर करें.
एप एक्सेस से पहले पूछते हैं यूजर्स की उम्र
वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया में अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म या एडल्ट वेबसाइट पर यूजर्स को यह सत्यापित करने के लिए बस एक बॉक्स पर टिक करना होता है कि वो एक तय आयु से अधिक हैं.
सोशल मीडिया ऐप्स पर नए यूजर्स के लिए तय आयु सीमा निर्धारित होने के बावजूद (उदाहरण के लिए - इंस्टाग्राम की आयु सीमा 13 वर्ष और फेसबुक की 14 वर्ष है), कई लोग प्लेटफॉर्म तक पहुंच प्राप्त करने के लिए अपनी गलत उम्र बता देते हैं.
बच्चों पर सोशल मीडिया का प्रभाव
कोविड-19 महामारी के आने के साथ 8 से 12 वर्ष और टीनएजर्स (आयु 13-18 वर्ष) द्वारा सोशल मीडिया का उपयोग महामारी से पहले की तुलना में तेजी से बढ़ा है. अमेरिका की 'कॉमन सेंस मीडिया' के एक अध्ययन के अनुसार, 8 से 12 वर्ष की आयु के बच्चे स्क्रीन पर औसतन साढ़े पांच घंटे रोजाना बिताते हैं. किशोरों के लिए यह समय-सीमा बढ़कर साढ़े आठ घंटे प्रतिदिन हो गई है.
जबकि सोशल मीडिया दुनिया के बीच की खाई को पाटने में मदद करता है, ऐसे प्लेटफॉर्म का लंबे समय तक उपयोग मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाला साबित हुआ है.
क्या आयु बैन और रोक कारगर साबित हुई हैं?
कई देशों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के इस्तेमाल पर आयुसीमा तय की है लेकिन सभी प्रयास सफल नहीं हुए हैं.
उदाहरण के लिए 2011 में दक्षिण कोरिया ने ऑनलाइन गेमिंग की लत को दूर करने के लिए 'शटडाउन कानून' लागू किया और 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर आधी रात के बाद गेमिंग वेबसाइट एक्सेस करने पर प्रतिबंध लगा दिया. हालांकि कई बच्चों ने सरकार की कोशिशों पर पानी फेरते हुए इसका तोड़ निकाल लिया और गेम खेलने के लिए अपने माता-पिता के अकाउंट का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.
2015 में यूरोपीय संघ ने एक कानून पेश किया था जो 16 साल से कम उम्र के बच्चों को अपने माता-पिता की सहमति के बिना सोशल मीडिया की पहुंच से रोकता था हालांकि इस कानून को विवादास्पद माना गया क्योंकि यह बच्चों के अभिव्यक्ति और सूचना तक पहुंच के अधिकारों का उल्लंघन करेगा.
हालांकि 2022 में यूरोपीय संघ द्वारा डिजिटल सेवा अधिनियम (DSA) को अपनाने के बाद यूरोप के कई देशों ने उम्र पर नियम लागू किए थे. उदाहरण के लिए फ्रांस में 15 वर्ष से कम आयु के किशोर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक केवल तभी पहुंच सकते हैं जब उन्हें माता-पिता या अभिभावक द्वारा इसकी अनुमति दी गई हो.