
Science behind puri paratha: भारतीय थाली में अगर गर्मा-गर्म पूरी और पराठा दिख जाए तो भूख अपने आप बढ़ जाती है. जब थाली में पूरी या पुराठे देखते हैं तो कोई भी 1-2 एक्स्ट्रा ही खा लेता है. माना की इनमें कैलोरीज अधिक होती हैं और आजकल अधिकतर लोग इनके सेवन से बचते हैं लेकिन फिर भी भारतीय त्योहारों में या फिर मेहमान नवाजी के दौरान पूरी-पराठे का अपना अलग रोल होता है. पूरी-पराठे दोनों को आटे से बनाया जाता है लेकिन आपने एक बात पर गौर किया होगा कि कड़ाही में जाते ही पूरी किसी गुब्बारे की तरह फूल जाती है, जबकि तवे पर सिकता तिकोना पराठा उतना नहीं फूलता.
हालांकि देखने में यह सिर्फ बेलने के तरीके का फर्क लग सकता है, लेकिन इसके पीछे साइंस छिपी हुई है. तो आइए आज पूरी-पराठे से जुड़े इस दिलचस्प विज्ञान को जानते हैं.

Data.booksie.org के मुताबिक, पूरी का गोल आकार और उसका फूलना पूरी तरह से 'स्टीम ट्रैपिंग' यानी भाप को रोकने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है. जब पूरी के लिए सॉफ्ट आटा गूंधते हैं तो गेहूं के प्रोटीन, पानी के साथ मिलकर ग्लूटेन नाम का लोच बनाते हैं जो भाप और गैस को पकड़कर रख सकता है.
फिर जब पूरी को बेला जाता है तो वह एक समान मोटाई की होती है और जैसे ही इसे खोलते हुए तेल में डाला जाता है तो आटे के अंदर मौजूद नमी तुरंत भाप में बदल जाती है.
साइंस वेबसाइट Science ABC के मुताबिक, पूरी चारों तरफ से बंद होती है इसलिए वह भाप बाहर नहीं निकल पाती और अंदर एक दबाव पैदा करती है. जब यह भाप फैलने की कोशिश करती है तो वह पूरी की ऊपरी परत को ऊपर की ओर धकेलती है जिससे वह गुब्बारे की तरह फूल जाती है. तेल का हाई टेम्प्रेचर बाहरी सतह को तुरंत कड़क कर देता है, जिससे भाप अंदर ही बंद रह जाती है.
तेल यहां 2 काम करता है. पहला हर साइड से बराबर और बहुत तेज हीट देता है और दूसरा ये कि वो बाहर एक परत बनाता है जिससे भाप जल्दी बाहर नहीं निकलती. इसलिए सही तरह से बेली गई, न बहुत मोटी न बहुत पतली गोल पूरी के अंदर भाप का प्रेशर बनने से वो फूल जाती है.

Foodiesonly.in के मुताबिक, पराठा आमतौर पर तवे पर मीडियम से हाई फ्लेम पर सेकने के बाद तेल या घी से शैलो-फ्राई किया जाता है यानी उसे पूरी की तरह 180–190 डिग्री सेल्सियस वाले तेल में नहीं डुबोया जाता.
Kitchen bread गाइड्स के मुताबिक, भाप से फूलने के लिए सतह का एक साथ सील होना जरूरी है लेकिन तवे की एक तरफ से आने वाली हीट और कम तेल के कारण पराठे में भाप धीरे-धीरे निकलती रहती है और वह गुब्बारे की तरह फूलने की बजाय उसमें छोटे-छोटे बबल्स बनते हैं.
दूसरा बड़ा कारण है पराठे का आकार. तिकोने या लेयर्ड पराठे में मोड़, फोल्ड और घी या तेल की परतें रहती हैं जो बीच में एकसाथ ग्लूटेन शीट बनने नहीं देतीं.
Eat‑fresh जैसी बेकिंग और रोटी गाइड वेबसाइट के मुताबिक, जब आटे की लेयरिंग ज्यादा हो या बेलने के वक्त मोटाई हर जगह बराबर न हो, तो भाप कुछ हिस्सों में फंसकर वहीं हल्का-सा फूलाव देती है लेकिन उससे पूरी जैसा नहीं फूलता.
पूरी अपनी भाप को बचाकर 'फूल' जाती है जबकि तिकोना पराठा अपनी भाप को बाहर निकालकर परतदार स्वाद देता है