
आलू एक ऐसी सब्जी है जिसके बिना भारतीय खाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. पराठे से लेकर सब्जी तक, स्नैक्स से लेकर समोसे तक हर चीज में आलू का इस्तेमाल होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस आलू को भारतीय खाने की शान मानते हैं, वह महज कुछ सदियों पहले भारत में था भी नहीं. दरअसल, आलू भारत में विदेश से आया था लेकिन वो इतना पसंद किया गया कि अब पूरे भारत में इसे काफी चाव से खाया जाता है. तो आइए आलू पेरू के जंगलों से निकलकर भारतीय किचन का 'किंग' कैसे बना, इस बारे में जान लीजिए.
बीबीसी ट्रेवल की रिपोर्ट के मुताबिक, आलू का असली जन्म दक्षिण अमेरिका के पेरू में हुआ था. वहां से चलकर यह यूरोप पहुंचा और फिर पुर्तगाली व्यापारियों के जरिए भारत पहुंचा था. भले ही आज ये सबका पसंदीदा हो लेकिन 16वीं सदी तक भारतीयों ने इस सब्जी का स्वाद तक नहीं चखा था.
IIP सीरीज 'आलू का इतिहास और भारत में इसके समक्ष वर्तमान चुनौतियां' की रिपोर्ट के मुताबिक, आलू सबसे पहले यूरोप में स्पेन, पुर्तगाल, इटली, फ्रांस, बेल्जियम और जर्मनी में उगाया गया था. इसे 17वीं सदी की शुरुआत (1600–1650 लगभग) में पुर्तगाली नाविक भारत लाए थे और ब्रिटिश काल के दौरान इसकी खेती पूरे उत्तरी भारत में फैल गई थी.

बीबीसी ट्रेवल की रिपोर्ट के मुताबिक, आलू, टमाटर, फूलगोभी, गाजर और मटर 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (1751-1800) के आर्टिकल से पता चलता है कि डच लोग मुख्य रूप से अन्य यूरोपीय लोगों को खिलाने के लिए आलू भारत लाए थे. हालांकि, अब भारत के लगभग हर रसोईघर में आलू को उबाला, सेका, भुना, भरा और तला जाता है.
भले ही यह करीब 400 साल पहले आया हो, लेकिन इसने उत्तर भारतीय किचन में अपनी मजबूत जगह पिछले 150-200 सालों में बनाई है, जब यह अकाल के समय एक जीवन रक्षक फसल बनकर उभरा.
स्मिथसोनियन मैगजीन के मुताबिक, शुरुआत में जब आलू भारत पहुंचा था तो वह सिर्फ तटीय इलाकों तक सीमित था लेकिन धीरे-धीरे इसके स्वाद और कम मेहनत में अधिक पैदावार होने के कारण इसकी लोकप्रियता पूरे देश में हो गई.
भारत में आलू लाने का श्रेय पुर्तगालियों को जाता है. जानकारी के मुताबिक, 17वीं शताब्दी की शुरुआत में पुर्तगाली व्यापारी इसे भारत के पश्चिमी तट (गोवा) पर लेकर आए थे. वे आलू को अपनी भाषा में 'बटाटा' कहते थे और यही वजह है कि आज भी महाराष्ट्र और गुजरात के कई हिस्सों में इसे बटाटा नाम से जाना जाता है.
इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर (CIP) की रिसर्च बताती है कि आलू कार्बोहाइड्रेट और ऊर्जा का ऐसा सोर्स था जो चावल और गेहूं के मुकाबले सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने वाला था. वारेन हेस्टिंग्स जैसे ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे बंगाल और उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में बढ़ावा दिया, जिससे यह केवल अमीरों की मेज से निकलकर आम आदमी की थाली तक आलू की पहुंच हो गई.
आलू के उस समय इतने फेमस होने का सबसे बड़ा कारण था कि वह किसी भी परिस्थिति में उग जाता था. अंग्रेजों के शासनकाल में जब देश के कई हिस्सों में अकाल पड़ता था तब आलू जीवन रक्षक फसल के रूप में उभरा था.
आलू को भारत में 'वर्सेटाइल' माना गया क्योंकि यह किसी भी मसाले के साथ घुल-मिल जाता था. भारतीयों ने आलू को अपने पारंपरिक मसालों के साथ मिलाकर जीरा आलू और आलू पराठा जैसी डिश बना दीं. यानी कि आलू इन चीजों में इतना फिट हो गया कि वह विदेशी लगना ही बंद हो गया. आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश है.