सुप्रीम कोर्ट ने UCC को लेकर एक मामले की सुनवाई की. समान नागरिक संहिता को लागू किया जा सकता है या नहीं, इसकी जांच के लिए राज्यों द्वारा समिति के गठन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने से इनकार कर दिया. इस याचिका में कहा गया था कि क्या समान नागरिक संहिता को लागू किया जा सकता है. साथ ही पूछा गया था कि क्या राज्यों के पास ऐसा करने की शक्ति है.
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि राज्य द्वारा समिति के गठन को अपने आप में चुनौती नहीं दी जा सकती, क्योंकि राज्यों के पास ऐसा करने की शक्ति है.
याचिकाकर्ता अनूप बरनवाल की ओर से पेश वकील ने बेंच को बताया कि समिति का गठन कानून के खिलाफ है. हालांकि बेंच ने कहा कि अनुच्छेद-162 के तहत विधायिका बनाने के लिए राज्यों के पास कार्यकारी शक्ति है.
बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संविधान के प्रावधानों के अधीन राज्य की कार्यकारी शक्ति उन मामलों तक विस्तारित होगी, जिनके संबंध में राज्य के विधानमंडल को कानून बनाने की शक्ति है.
पिछले महीने संसद को संबोधित करते हुए कानून और न्यायमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि व्यक्तिगत कानून जैसे निर्वसीयतता और उत्तराधिकार, वसीयत, संयुक्त परिवार और विभाजन, विवाह और तलाक संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-III-समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 से संबंधित हैं. इसलिए राज्यों को भी उन पर कानून बनाने का अधिकार है.
वहीं, उत्तराखंड UCC लागू करने की संभावनाओं को तलाशने के लिए एक पैनल स्थापित करने वाला पहला राज्य था. इसके बाद गुजरात सरकार ने भी इसकी घोषणा की है. दरअसल, समान नागरिक संहिता अनिवार्य रूप से पूरे देश के लिए एक कानून प्रदान करती है, जो सभी धार्मिक समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि में लागू होती है.
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