सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है. कोर्ट ने आम चुनाव नजदीक होने का हवाला दिया और कहा, जब लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हों तो वो इस समय चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून पर रोक नहीं लगा सकता है. इससे अराजकता फैलेगी. कोर्ट की यह टिप्पणी तब आई, जब वो कानून पर रोक लगाने की अर्जी पर सुनवाई कर रही थी.
गुरुवार को जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने सुनवाई के बाद फैसला दिया. जस्टिस संजीव खन्ना ने अदालत के आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा, आप यह नहीं कह सकते कि चुनाव आयोग कार्यपालिका के अधीन है. इस स्तर पर हम कानून पर रोक नहीं लगा सकते हैं और इससे सिर्फ अराजकता और अनिश्चितता पैदा होगी. नॉमर्ली और जनर्ली हम अंतरिम आदेश के माध्यम से किसी कानून पर रोक नहीं लगाते हैं.
'चुनाव आयोग निष्पक्ष और स्वतंत्र हो'
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी कहा, चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष होना होगा. हालांकि, नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनाए गए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोर्ट ने नोटिस जारी कर छह हफ्ते में सरकार से जवाब मांगा है. अगस्त के पहले हफ्ते में सुनवाई होगी.
इससे पहले 15 मार्च को कोर्ट ने 2023 कानून के तहत नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. नए कानून में सीजेआई को चयन समिति से बाहर रखा गया है.
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'नए आयुक्तों पर कोई आरोप नहीं'
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए प्रशांत भूषण ने कहा, संविधान सभा को उम्मीद थी कि इसे एक स्वतंत्र पैनल द्वारा भरा जाएगा, न कि कार्यपालिका के प्रभुत्व वाले किसी पैनल द्वारा. अदालत ने यह भी कहा कि नव नियुक्त चुनाव आयुक्तों ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू के खिलाफ ऐसे कोई आरोप नहीं हैं, जिन्हें नए कानून के तहत चयन पैनल में बदलाव के बाद चुना गया.
'याचिका में चयन समिति से सीजेआई को बाहर रखने पर आपत्ति'
मामले में कांग्रेस नेता जया ठाकुर, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और अन्य की तरफ से याचिकाएं दायर की गई थीं. इसमें अधिनियम के संशोधनों की वैधता पर सवाल उठाए गए थे. विशेष रूप से चयन पैनल से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को बाहर करने पर आपत्ति जताई थी. जस्टिस खन्ना ने कहा, अब उन्हें नियुक्त कर दिया गया है, चुनाव नजदीक हैं. यह सुविधा के संतुलन का सवाल है. नियुक्त व्यक्तियों के खिलाफ कोई आरोप नहीं हैं. पीठ ने याचिकाकर्ताओं को आश्वासन दिया कि उनकी दलीलों की जांच की जाएगी, लेकिन इस स्तर पर कानून को रद्द करने से परहेज किया.
'रिक्तियां भरने की प्रक्रिया पर उठाए सवाल'
इससे पहले याचिका कर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा, जरा सरकार का जवाब देखिए. उन्होंने तारीखों की एक सूची दी है. 9 मार्च को वैकेंसी जारी हुई है. 9 मार्च को ही दूसरी वैकेंसी भी निकलती है. फिर वे अपने हिसाब से मीटिंग को रीशेड्यूल करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, लेकिन वे यह भी कह रहे हैं कि जब 14 तारीख को बैठक निर्धारित थी, तब तक कोई आवेदन दायर नहीं किया गया था.
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'दो नाम पहले ही तय कर लिए थे'
याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील प्रशांत भूषण ने दलीलें रखीं. उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया में खामियां और मनमानी किए जाने का आरोप लगाया. प्रशांत ने कहा, 14 फरवरी की रिटायर हुए एक निर्वाचन आयुक्त की रिक्ति 9 मार्च को दिखाई. उसी दिन दूसरी रिक्ति भी दिखाई. सरकार ने 14 मार्च को दोनो रिक्तियां भरने का फैसला लिया. उसके लिए दो नाम पहले से तय कर लिए. उनको पता था कि मामला कोर्ट में जाएगा. लिहाजा छह नाम छांटे गए और फिर आनन-फानन में वही दो नाम सार्वजनिक कर दिए गए, जिन पर उनका मन था.
जानिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में क्या-क्या हुआ...
वकील प्रशांत भूषण- 14 तारीख को वे दो लोगों की सिफारिश करते हैं. उन्हें साफ पता था कि 15 तारीख को कोर्ट इस मामले की सुनवाई करने वाला है. वे सुबह मिलते हैं, 200 अजीब नामों में से 6 लोगों का चयन करते हैं. उसी दिन वे पीएम की अगुवाई वाली कमेटी से मिलते हैं. लोकसभा में नेता विपक्ष का कहना है कि उन्हें बैठक से 10 मिनट पहले सूची मिली.
सुप्रीम कोर्ट - अगर हम 324 (अनुच्छेद) के सार पर जाएं तो राष्ट्रपति को ही अधिकार है. ऐसा नहीं है कि पहले चुनाव नहीं होते थे. बहुत अच्छे चुनाव हुए हैं. लेकिन हां, आपकी बात यह है कि यहां एक प्रक्रियात्मक दबाव दिख रहा है.
प्रशांत- यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए बहुत गंभीर खतरा है. हमारे संविधान निर्माताओं को उम्मीद थी कि एक ऐसा कानून बनाया जाएगा जो कार्यपालिका से नियुक्ति की शक्ति छीन लेगा. प्रशांत ने जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया का उल्लेख किया.
सुप्रीम कोर्ट - दोनों बातें बहुत अलग हैं. जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया ईसी की नियुक्ति की प्रक्रिया के समान नहीं है. लेकिन हां, हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि ये लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है. कल्पना कीजिए कि हमारा पिछला फैसला वह नहीं था और फिर संसद ये कानून लेकर आई. तब चुनौती का आधार क्या होगा?
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प्रशांत- आधार एक ही होगा कि चुनाव आयुक्तों का चयन पूरी तरह सरकार के हाथ में नहीं हो सकता. इससे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव खतरे में पड़ रहा है. न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि नियुक्तियों को सरकार के हाथों में छोड़ना चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता को खत्म करने का एक निश्चित तरीका है.
सुप्रीम कोर्ट- हमारा फैसला इस आधार पर आगे बढ़ा कि लंबे समय से कानून बनाने में विफल रहा है और एक खालीपन था. लेकिन एक बार कानून बन जाने के बाद हमें विधायिका का सम्मान करना होगा.
सुप्रीम कोर्ट- हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1950 से फैसले तक कई नियुक्तियां की गई हैं.
सुप्रीम कोर्ट - दूसरी बात यह है कि चुनाव नजदीक हैं. सुविधा का संतुलन बहुत महत्वपूर्ण फैक्टर है. वैसे जिन लोगों को नियुक्त किया गया है उनके खिलाफ इस तरह का कोई आरोप नहीं है.
प्रशांत- ऐसा इसलिए है क्योंकि चयन समिति के सदस्यों को उम्मीदवारों पर अपना दिमाग लगाने का समय नहीं दिया गया.
सुप्रीम कोर्ट - आपकी बात सही है. हम ये सवाल दूसरे पक्ष से पूछेंगे. फैसले में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि समिति में न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. संसद ने कानून बनाया है. संविधान में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इस चयन समिति में किसे होना है, इसलिए संसद इस आशय का एक कानून लेकर आई है.
सुप्रीम कोर्ट - एलओपी को सदस्य बनाया गया है. हम इसकी जांच कर सकते हैं लेकिन हम कानून पर रोक नहीं लगा सकते या इसे निलंबित नहीं कर सकते. यदि हम ऐसा करते हैं तो हम सिर्फ अराजकता ही नहीं तो बहुत सी अनिश्चितता से गुजर रहे होंगे.
सुप्रीम कोर्ट - कुछ ऐसा जो 1950 से लेकर 2023 तक था.. फिर विधायिका ने हस्तक्षेप किया. अब हम कैसे कह सकते हैं कि हम कानून पर रोक लगा देंगे.
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सॉलिसिटर जनरल - एक प्रक्रिया मौजूद है. चयन समिति इसका निपटारा करती है.
सुप्रीम कोर्ट - यह फैसला किसी भी तरह से संसद से कानून बनाने की शक्ति नहीं छीनता है. हमने उनसे किसी खास तरीके से कानून बनाने के लिए नहीं कहा. आप चाहें तो इसे न्यायिक रोक कह सकते हैं लेकिन संसद को कानून बनाने से कोई नहीं रोक सकता.
जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि ऐसा नहीं है कि इससे पहले चुनाव नहीं हुए. इन फैक्ट अच्छे चुनाव हुए हैं. आपने देखा कि हमने पहले भी रोक नहीं लगाई. इस अदालत की सुनवाई की शुरुआत से लेकर फैसले तक राष्ट्रपति नियुक्तियां कर रहे हैं. प्रक्रिया काम कर रही है. जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया और चुनाव आयुक्तों की प्रक्रिया में अंतर है. अब उनकी नियुक्ति हो चुकी है, चुनाव नजदीक हैं. यहां सवाल संतुलन का है. नियुक्त किये गये चुनाव आयुक्त के विरूद्ध कोई आरोप नहीं है. इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि सवाल प्रक्रिया पर है.
'राजनीतिक विवाद खड़ा करने की कोशिश'
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की गई है, उसमें सीईसी और ईसी का चयन करने वाले पैनल से सीजेआई को बाहर करने और नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को चुनौती दी गई है. इससे पहले बुधवार को केंद्र सरकार ने एक हलफनामा दायर किया था और नियुक्ति पैनल को सही ठहराया था. सरकार का कहना था कि यह दलील गलत है कि चुनाव आयोग तभी स्वतंत्र रूप से काम करेगा, जब चयन समिति में न्यायिक सदस्य को भी शामिल किया जाए. संवैधानिक पद पर बैठे लोग निष्पक्षता से ही काम करते हैं. निर्वाचन आयुक्तों की योग्यता पर कोई प्रश्न नहीं उठाया गया है. याचिकाकर्ता का मकसद राजनीतिक विवाद खड़ा करना है.
बता दें कि 14 फरवरी को चुनाव आयुक्त अनूप चंद्र पांडे के रिटायरमेंट और अरुण गोयल के अचानक इस्तीफे के बाद चुनाव आयोग में दो पद खाली हो गए थे. उनके स्थान पर सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को नियुक्त किया गया है.