ये तो आपने देखा होगा कि बाजार में अब कई तरह के दूध आने लगे हैं. पहले आमतौर पर टोंड, डबल टोंड, फुल क्रीम जैसी कैटेगरी आती थी, लेकिन अब कई तरह के दूध आने लगे हैं. अब इन दूध में ए-2 मिल्क आदि भी शामिल हो गए हैं. ऐसे ही बाजार में कुछ दूध के पैकेट ऐसे भी आते हैं, जिनके लिए कहा जाता है कि वो दूध कई दिन तक खराब नहीं होता है. उन दूध के पैकेट 7 दिनों तक भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हो सकता है कि आपने भी कभी उन्हें खरीदा हो. लेकिन, कभी आपने गौर किया है कि इन दूध के पैकेट अलग होते हैं और उनकी थैली की क्वालिटी नॉर्मल दूध से अलग होती है.
खास बात ये है कि ये थैलियां ना सिर्फ अलग मैटेरियल से बनी होती है, जबकि ये अंदर से काले रंग की भी होती है. तो आज हम आपको बता रहे हैं कि जो दूध लंबे समय तक चलते हैं, उनके पैकेट अलग क्यों होते हैं और उनकी थैली अंदर से काली क्यों होती है?
क्यों काली होती हैं दूध की थैलियां?
इन दूध के जल्दी खराब ना होने के पीछे का अहम कारण ये दूध के खास पैकेट भी हैं. दरअसल, ये थैलियां एक ही लेयर की नहीं होतीं, बल्कि मल्टी लेयर पैकेजिंग पर काम करती हैं. इनमें अक्सर एक परत में कार्बन ब्लैक मिलाया जाता है. दरअसल, दूध के जल्दी खराब होने का कारण तेज रोशनी और गर्मी भी होती है.
दूध में मौजूद प्रोटीन और विटामिन (खासकर B2, B12) रोशनी में टूटने लगते हैं. इससे दूध जल्दी खराब हो सकता है. इसके अलावा पैकेट में अंदर काली लेयर होने से यूवी रेज ब्लॉक हो जाती हैं और दूध की शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है.
ऐसे में जो लंबे समय तक चलने वाले दूध बाजार में मिल रहे हैं, उनमें ये ही पैकेजिंग होती है. फिर बैक्टीरिया ग्रोथ धीमी हो जाती है और दूध सही बना रहता है. कार्बन ब्लैक अप्रूव्ड भी है और माइक्रोप्लास्टिक या मिलावट से इसका संबंध नहीं होता.
अलग होती है पैकिंग
नॉर्मल दूध और इस दूध की पैकिंग थैली अलग होती है. नॉर्मल दूध की थैली आम तौर पर 3 लेयर वाली होती है, जबकि इस दूध में कुछ लेयर ज्यादा होती हैं. इसमें सबसे अहम बैरियर लेयर होती है, जो स्पेशल फिल्म का काम करती है. ये डार्क कलर की होती है, जिससे लाइट अंदर आने से रुकती है और बैक्टीरिया की ग्रोथ नहीं होती है.