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सरकारी कुर्सी पर सफेद तौलिया क्यों? जानिए इसके पीछे की असली वजह

सरकारी दफ्तरों की कुर्सियों पर रखा सफेद तौलिया भले ही एक सामान्य चीज लगे, लेकिन इसके पीछे औपनिवेशिक दौर की आदतें, गर्मी से निपटने की जरूरत, साफ-सफाई और पदानुक्रम की लंबी कहानी छिपी है. जानिए कैसे एक साधारण कपड़ा भारत में सरकारी सत्ता का एक पहचान बन गया.

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सफेद रंग साफ-सफाई और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है (AI-generated image)
सफेद रंग साफ-सफाई और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है (AI-generated image)

अगर किसी सरकारी दफ्तर में जाएं और वहां कुर्सी पर सफेद तौलिया न दिखे, तो कुछ अधूरा सा लगता है. फाइलों के ढेर, स्टील की अलमारी, पंखे की आवाज और बीच में रखी अधिकारी की कुर्सी जिस पर सलीके से रखा सफेद तौलिया.यह नजारा भारत में लंबे समय से आम है. लेकिन सवाल है, यह परंपरा आई कहां से?

इसका कोई आधिकारिक इतिहास दर्ज नहीं है, लेकिन आम तौर पर इसकी वजह पुराने दौर की जरूरतों, साफ-सफाई की आदतों और औपनिवेशिक प्रशासनिक संस्कृति से जोड़ी जाती है. हाल ही में सोशल मीडिया पर भी यह चर्चा में आया, जब यूजर केतन ने इसे 'पावर का प्रतीक' बताया.

जरूरत से पैदा हुई आदत

एयर कंडीशनर और आधुनिक ऑफिस के दौर से पहले भारत की गर्मी बेहद कठिन होती थी. अधिकारी लंबी यात्राएं करके दफ्तर पहुंचते थे.धूल, पसीना और थकान के साथ. ऐसे में कुर्सी पर रखा तौलिया कई काम करता था.यह पसीना सोखता था, कुर्सी को गंदा होने से बचाता था और जरूरत पड़ने पर चेहरे-गर्दन पोंछने के काम भी आता था. साथ ही, बालों में तेल लगाने की आम आदत के कारण भी यह उपयोगी था.

 जब जरूरत बनी ‘स्टेटस’

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धीरे-धीरे यह तौलिया सिर्फ सुविधा नहीं रहा. औपनिवेशिक दौर में हर चीज से रैंक दिखाया जाता था.कमरे का आकार, टेबल, कुर्सी और यहां तक कि दरवाजे से दूरी भी.इसी माहौल में सफेद तौलिया एक संकेत बन गया कि यह कुर्सी किसी वरिष्ठ अधिकारी की है. मेहमानों और जूनियर कर्मचारियों को साधारण कुर्सियां मिलती थीं, जबकि बड़े अधिकारी की कुर्सी अलग दिखती थी.

अंग्रेज गए, तौलिया रह गया

पूर्व नौकरशाह गुरदीप सिंह सप्पल ने मजाकिया अंदाज में कहा था कि अंग्रेज चले गए, घोड़े चले गए, लेकिन तौलिए रह गए.यह बात हल्की लग सकती है, लेकिन सरकारी दफ्तरों में आज भी यह परंपरा दिख जाती है.

सफेद रंग क्यों?

सफेद रंग साफ-सफाई और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है. इसमें गंदगी जल्दी दिखती है, इसलिए इसे बार-बार बदलना पड़ता है. साथ ही यह कुर्सी को अलग और औपचारिक रूप देता है.

 आज भी क्यों जारी है?

आज भले ही डिजिटल ऑफिस और आधुनिक फर्नीचर आ गए हों, लेकिन कई आदतें सिस्टम के साथ चलती रहती हैं. नए अधिकारी पुराने कमरे, कुर्सियां और परंपराएं अपनाते हैं—और तौलिया भी उसी का हिस्सा बन जाता है.सरकारी कुर्सी पर रखा सफेद तौलिया भले ही साधारण दिखे, लेकिन यह सिर्फ कपड़ा नहीं है. यह उस सिस्टम की झलक है, जहां कई बार अधिकार काम से पहले कुर्सी और उसके ‘लुक’ से ही जाहिर हो जाता है.

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