1992 में यूरोप के बीचों-बीच बसा एक खूबसूरत शहर अचानक मौत का मैदान बन गया था. इस शहर का नाम था साराजेवो. यहां लोग सिर्फ इसलिए मारे जा रहे थे, क्योंकि वे गलत समय पर सड़क पर निकल आए थे. पहाड़ियों पर बैठे स्नाइपर दूरबीन से इंसानों को निशाना बना रहे थे. घटना 'साराजेवो सफारी' के नाम से जानी जाती है. यह वही साराजेवो है जहां से पहले विश्वयुद्ध की चिंगरी भी भड़की थी. अब एक बार फिर से उस दौर से जुड़े बदनाम 'साराजेवो सफारी' या 'स्नाइपर सफारी' की एक बार फिर से चर्चा हो रही है.
इन दिनों ऑस्ट्रिया की सरकार ने खुलासा किया है कि वह उन घिनौनी रिपोर्टों की जांच कर रही है, जिनमें कहा गया है कि दुनियाभर के कई धनी लोगों ने बोस्नियाई युद्ध की आड़ में निर्दोष लोगों का शिकार करने के लिए बड़ी रकम का भुगतान किया था. यह चर्चा क्रोएशियाई खोजी पत्रकार डोमागोज मार्गेटिक की पुस्तक 'पे एंड शूट' के प्रकाशित होने के कुछ ही हफ्तों बाद शुरू हुई थी. इसमें दावा किया गया है कि स्नाइपरों में एक ऑस्ट्रियाई अमीर शख्स भी शामिल था.
न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय देश के न्याय मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि पिछले महीने के अंत में बोस्नियाई युद्ध के दौरान साराजेवो में तथाकथित 'स्नाइपर टूर' में संभावित भागीदारी के संबंध में एक ऑस्ट्रियाई नागरिक और एक अन्य अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ जांच शुरू की गई थी.
यह पहला मामला नहीं है. पिछले साल इटली के एक ऐसे ही रईस स्नाइपर को लेकर मिलान में जांच शुरू हुई थी. जिस पर आरोप है कि उसने साराजेवो जाकर इंसानों का शिकार किया था. मिलान में लोक अभियोजक के कार्यालय ने उन दावों की जांच शुरू कर दी, जिसमें 1990 के दशक की शुरुआत में युद्ध के दौरान इतालवी नागरिक 'स्नाइपर सफारी' या 'साराजेवो सफारी' के लिए बोस्निया-हर्जेगोविना गए थे. आरोप है कि इटालियंस और अन्य लोगों ने घेराबंदी वाले शहर साराजेवो में नागरिकों पर गोली चलाने के लिए बड़ी रकम का भुगतान किया था. ऐसे में जानते हैं क्या है साराजेवो सफारी की कहानी?
कैसे होता था इंसानों का शिकार
साराजेवो सफारी कोई असली सफारी नहीं थी. यह इंसानों के शिकार का एक खौफनाक खेल था. आरोप है कि बोस्नियाई युद्ध के दौरान कुछ अमीर विदेशी लोग साराजेवो आते थे और पैसे देकर निहत्थे नागरिकों पर गोली चलाने का मौका खरीदते थे. यानी जैसे जंगल में जानवरों का शिकार कराया जाता है, वैसे ही यहां इंसानों को निशाना बनाया जाता था.
यह सब उस समय हुआ जब साराजेवो की घेराबंदी चल रही थी. अप्रैल 1992 से फरवरी 1996 तक साराजेवो दुनिया की सबसे लंबी घेराबंदियों में से एक का शिकार रहा. शहर को चारों तरफ से घेर लिया गया था. यह घेराबंदी बोस्नियाई सर्ब सेना ने की थी, जिसे तत्कालीन सर्बियाई नेतृत्व और यूगोस्लाव सेना का समर्थन हासिल था.
क्यों साराजेवो की घेराबंदी की गई थी
घेराबंदी का मकसद था बोस्निया को अलग होने से रोकना और सर्ब नियंत्रण कायम रखना. उस वक्त बोस्निया और हार्जेगोविना, टूट रहे यूगोस्लाविया से अलग होकर स्वतंत्र देश बनना चाहता था. लेकिन बोस्नियाई सर्ब नेता इसके खिलाफ थे. इसी विवाद ने खूनी गृहयुद्ध का रूप ले लिया.
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साराजेवो की पहाड़ियों पर तैनात स्नाइपर पूरे शहर पर नजर रखते थे. लोग सड़क पार करने से डरते थे. बच्चों के स्कूल जाने से लेकर पानी भरने तक में मौत का खतरा था. इसी दौरान 'स्नाइपर ऐली' नाम की सड़क पूरी दुनिया में बदनाम हो गई थी.
सर्ब लड़ाके पैसा लेकर इंसानों को शूट करने देते थे
सालों बाद कुछ डॉक्यूमेंट्री और गवाहियों में दावा किया गया कि विदेशी अमीर लोगों को पहाड़ियों पर ले जाकर गोली चलाने का मौका दिया जाता था. उन्हें कथित तौर पर स्थानीय सर्ब लड़ाकों या पैरामिलिट्री समूहों को पैसे देने पड़ते थे. बदले में उन्हें स्नाइपर राइफल दी जाती थी और शहर में चलते आम नागरिकों को निशाना बनाने दिया जाता था.
हालांकि, इन दावों पर आज भी बहस होती है और हर कहानी पूरी तरह अदालत में साबित नहीं हुई है. लेकिन युद्ध के बचे लोगों और कई गवाहों ने ऐसे भयावह किस्सों का जिक्र किया है. यही वजह है कि 'साराजेवो सफारी' शब्द आज भी इंसानियत के सबसे काले अध्यायों में गिना जाता है.
4 साल में मारे गए थे 10 हजार से ज्यादा लोग
करीब चार साल चली इस घेराबंदी में 11 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे, जिनमें हजारों आम नागरिक और बच्चे शामिल थे. शहर में बिजली, पानी और खाने तक की भारी कमी हो गई थी. साराजेवो की कहानी सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं है. यह उस दौर की याद दिलाती है, जब इंसान ने इंसान को मनोरंजन के लिए निशाना बनाया और यही वजह है कि 'साराजेवो सफारी' का नाम सुनते ही आज भी लोग सिहर उठते हैं.