scorecardresearch
 

ट्रंप का कोल्ड ड्रिंक बयान वायरल, जानें विदेशी vs देसी कोल्ड ड्रिंक में क्या है फर्क

यूरोप और अमेरिका में कोल्ड ड्रिंक्स को लेकर सख्त नियम लागू हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, विदेशों में शुगर कंट्रोल और क्वालिटी चेक ज्यादा सख्त हैं, जबकि भारत में नियमों के पालन में कमी देखी जाती है.

Advertisement
X
यह खबर वायरल हो रहे राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के आधार पर लिखी गई है.  ( Photo: PTI/ Pexels)
यह खबर वायरल हो रहे राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के आधार पर लिखी गई है.  ( Photo: PTI/ Pexels)

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं. हाल ही में उन्होंने दावा किया कि कोल्ड ड्रिंक या डाइट सोडा शरीर में कैंसर के सेल्स को मार सकता है और उन्हें कम करने में मदद कर सकता है. यह बात एक पॉडकास्ट के दौरान सामने आई, जहां उनके इस तर्क ने दुनिया भर में बहस छेड़ दी. हालांकि, इस दावे को लेकर डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. इसी बयान के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई कोल्ड ड्रिंक का कैंसर पर कोई असर होता है, या यह सिर्फ एक गलत धारणा है. हालांकि, Aajtak.in इन दावों की पुष्टि नहीं करता है. यह खबर वायरल हो रहे राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के आधार पर लिखी गई है. 

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है.  जिसमें डॉ. ओज कहते हैं कि ट्रंप का मानना है कि अगर डाइट सोडा घास पर डालने से उसे नुकसान पहुंचा सकता है, तो यह शरीर के अंदर जाकर कैंसर के सेल्स को भी खत्म कर सकता है।

चलिए जानते हैं विदेश की कोल्ड ड्रिंक और भारत की कोल्ड ड्रिंक में कितना फर्क है?

आज के समय में कोल्ड ड्रिंक यानी सॉफ्ट ड्रिंक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं. गर्मी हो या कोई पार्टी, लोग इन पेय पदार्थों का खूब इस्तेमाल करते हैं. लेकिन हाल ही में एक बड़ी बहस छिड़ी है कि क्या बड़ी कोल्ड ड्रिंक कंपनियां अलग-अलग देशों में अलग नियम अपनाती हैं? यानी विदेशों में जहां सख्त नियमों का पालन किया जाता है, वहीं भारत में उतनी सख्ती नहीं दिखाई देती. इस मुद्दे को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इसका लोगों की सेहत पर क्या असर पड़ता है.

Advertisement

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने साल 2015 में यह सलाह दी थी कि एक व्यक्ति को रोजाना अपने कुल भोजन में शुगर की मात्रा 10% से कम रखनी चाहिए. यानी लगभग 50 ग्राम से कम. लेकिन समस्या यह है कि भारत में मिलने वाली कई कोल्ड ड्रिंक्स में शुगर की मात्रा काफी ज्यादा होती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में कोल्ड ड्रिंक में शुगर की मात्रा कई बार तय सीमा से ज्यादा पाई जाती है.

वहीं, ब्रिटेन जैसे देशों में इस पर सख्त नियंत्रण है. वहां कंपनियों को शुगर कम रखने के लिए नियमों का पालन करना पड़ता है. इसी वजह से वहां मिलने वाली ड्रिंक्स में शुगर की मात्रा भारत की तुलना में कम होती है. इसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है. ज्यादा शुगर से मोटापा, डायबिटीज और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

विदेशों में सख्ती, भारत में ढील?
अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में फूड और ड्रिंक कंपनियों पर काफी सख्त नियम लागू होते हैं. वहां की एजेंसियां हर चीज की जांच करती हैं- चाहे वह शुगर हो, केमिकल हो या पैकेजिंग. अगर कोई कंपनी नियम तोड़ती है, तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाता है या उसका प्रोडक्ट बैन भी हो सकता है. लेकिन भारत में स्थिति थोड़ी अलग है. यहां भी नियम हैं, लेकिन कई बार उनका पालन उतनी सख्ती से नहीं होता. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि कंपनियां भारत में लागत कम रखने के लिए सस्ते विकल्पों का इस्तेमाल करती हैं. इससे प्रोडक्ट की क्वालिटी पर असर पड़ सकता है.

Advertisement

विदेशों में, खासकर अमेरिका और यूरोप में, कोल्ड ड्रिंक की पैकेजिंग और गुणवत्ता की पूरी जिम्मेदारी ब्रांड कंपनियों की होती है. वहां हर प्रोडक्ट को सख्त नियमों के तहत जांचा जाता है. अगर किसी तरह की गलती मिलती है, तो तुरंत प्रोडक्ट को बाजार से हटाया जाता है और कंपनी पर भारी जुर्माना लगाया जाता है.

लेकिन भारत में स्थिति थोड़ी अलग है. यहां बड़ी कंपनियां जैसे कोका-कोला और पेप्सी अक्सर पैकेजिंग और बॉटलिंग का काम फ्रेंचाइजी या स्थानीय वेंडर्स को दे देती हैं. ऐसे में अगर कोई गड़बड़ी होती है, तो जिम्मेदारी ज्यादातर वेंडर पर डाल दी जाती है, जबकि ब्रांड पर सीधा असर कम पड़ता है.

पैकेजिंग मटेरियल (पैकिंग की गुणवत्ता)
अमेरिका और यूरोप में कोल्ड ड्रिंक्स की पैकेजिंग के लिए सिर्फ हाई-क्वालिटी फूड-ग्रेड प्लास्टिक या मटेरियल का ही इस्तेमाल करना जरूरी होता है. वहां हर पैकेजिंग पर सख्त टेस्टिंग होती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह सुरक्षित है. वहीं, भारत में भी पैकेजिंग के लिए नियम बनाए गए हैं, लेकिन कई बार इनका पालन पूरी तरह नहीं होता.

कुछ मामलों में कंपनियां या सप्लायर लागत कम करने के लिए सस्ते मटेरियल का इस्तेमाल कर लेते हैं. इससे पैकेजिंग की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है और यह स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है. कुल मिलाकर, विदेशों में नियम ज्यादा सख्त और जिम्मेदारी तय होती है, जबकि भारत में अभी भी इन चीजों में सुधार की जरूरत महसूस की जाती है.

Advertisement

कंपनियों की रणनीति
अब सवाल उठता है कि कंपनियां ऐसा क्यों करती हैं? दरअसल, हर देश का बाजार अलग होता है. कंपनियां उसी हिसाब से अपने प्रोडक्ट में बदलाव करती हैं. जहां सख्त नियम होते हैं, वहां उन्हें मजबूरी में क्वालिटी और शुगर कंट्रोल रखना पड़ता है. लेकिन जहां नियम थोड़े ढीले होते हैं, वहां कंपनियां लागत कम करने की कोशिश करती हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि वे पूरी तरह गलत काम कर रही हैं, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि नियमों की सख्ती का असर सीधे प्रोडक्ट पर पड़ता है.

भारत में बढ़ती खपत और खतरा
भारत एक बड़ा बाजार है. यहां की बड़ी आबादी और बढ़ती खपत के कारण कंपनियों के लिए यह बहुत अहम देश है. लेकिन इसी वजह से यह जरूरी हो जाता है कि यहां मिलने वाले प्रोडक्ट्स की क्वालिटी भी बेहतर हो. अगर बड़ी संख्या में लोग रोजाना ज्यादा शुगर वाली ड्रिंक्स का सेवन करते हैं, तो यह एक बड़ा हेल्थ रिस्क बन सकता है.

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को खुद भी जागरूक होना चाहिए. सिर्फ कंपनियों या सरकार पर निर्भर रहने के बजाय हमें खुद यह समझना चाहिए कि हम क्या खा-पी रहे हैं. अगर हम लेबल पढ़ेंगे और शुगर की मात्रा को समझेंगे, तो हम बेहतर फैसले ले सकते हैं.

Advertisement

सोशल मीडिया पर बढ़ती बहस
इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा हो रही है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर विदेशों में बेहतर क्वालिटी दी जा सकती है, तो भारत में क्यों नहीं? कई यूजर्स का कहना है कि भारत में भी वही स्टैंडर्ड लागू होने चाहिए, जो विदेशों में हैं. कुल मिलाकर, यह मुद्दा सिर्फ कोल्ड ड्रिंक का नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य और जागरूकता से जुड़ा हुआ है. अगर कंपनियां अलग-अलग देशों में अलग स्टैंडर्ड अपनाती हैं, तो यह एक गंभीर सवाल खड़ा करता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement