प्रकृति के कई रूप समय-समय पर सामने आते रहते हैं. कुछ ऐसा ही हुआ है उत्तराखंड में, जहां लगभग विलुप्त होने के कगार पर पहुंची उड़न गिलहरी की वह प्रजाति सामने आई है जो अब से पहले कभी नहीं देखी गई. उत्तराखंड के उत्तरकाशी के घने जंगलों में पहली बार एक दुर्लभ प्रजाति की गिलहरी देखी गई है, जो लगभग विलुप्त हो चुकी है.
यह गिलहरी इसलिए भी खास है क्योंकि यह उड़ सकती है. इसलिए इसका नाम उड़न गिलहरी है. इसका शरीर ऊन की तरह झब्बेदार होता है. इसे ऊनी उड़न गिलहरी भी कहा जाता है. इस ऊनी उड़न गिलहरी को हाल ही में गंगोत्री नेशनल पार्क में रिसर्च विभाग के जरिए देखा गया, जो विलुप्त होने के कगार पर है. भूरे रंग की ये गिलहरी पूरी तरह से ऊन की तरह झब्बेदार है.
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उड़न गिलहरी की कई प्रजातियां होती हैं और उत्तराखंड में ऐसी 4 प्रजातियां नजर आई हैं, जो बेहद दुर्लभ हैं. कुछ प्रजातियां उत्तराखंड में पहली बार नजर आई हैं तो कुछ प्रजातियां लगभग 4 दशक के बाद दिखाई पड़ी हैं. इन उड़न गिलहरियों के अगले और पिछले पंजों के बीच में एक झिल्ली होती है जो एक पैराशूट की तरह खुल जाती है, जब यह गिलहरियां एक जगह से दूसरी जगह तक कूदने की कोशिश करती हैं.
इसलिए यह हवा में एक ग्लाइडर की तरह उड़ती नजर आती हैं. इस वजह से यह अधिकतम एक बार में 40 फुट तक उड़ सकती हैं. साधारण गिलहरियों के मुकाबले इनका आकार एक फुट तक ज्यादा होता है. पूरे भारत में उड़न गिलहरियों की लगभग 12 प्रजातियां पाई जाती हैं.
उड़न गिलहरी
वन्यजीव संरक्षण नियम के अनुच्छेद-2 के तहत इन्हें संरक्षित वन्य जीव घोषित किया गया है. इन गिलहरियों की खासियत यह है कि यह निशाचर है जो रात के समय शिकार करती हैं. ये गिलहरियां पेड़ों के तने में घर बना कर रहती हैं. उड़न गिलहरी के बच्चों की मृत्यु दर ज्यादा होती है क्योंकि उन्हें सबसे ज्यादा खतरा सांपों से और दूसरे शिकारी वन्यजीवों से रहता है. इसलिए इनके अस्तित्व पर लगातार खतरा है और यह अपने आप में एक दुर्लभ प्रजाति है.
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उत्तराखंड के वन विभाग की अनुसंधान शाखा ने डाटा जारी करते हुए बताया है कि कब और उत्तराखंड के किस इलाकों में यह दुर्लभ गिलहरियों की प्रजातियां देखी गई हैं. यह गिलहरियां उत्तरकाशी, रानीखेत और टिहरी जैसे इलाकों में देखी गई हैं.
विशेष प्रोजेक्ट
उत्तराखंड वन विभाग के अनुसंधान विभाग के प्रमुख संजीव चतुर्वेदी का कहना है, 'उड़न गिलहरी एक अत्यंत दुर्लभ प्रजाति है. इसकी संख्या अत्यंत कम रह गई थी और यह अपने विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई थी. इसलिए इसके संरक्षण हेतु एक विशेष प्रोजेक्ट शुरू किया गया था. इस दौरान यह जानकारी सामने आई है और इन विलुप्त हो रही प्रजातियों का पता लगा है. इनका उपयोग करते हुए इन्हें संरक्षित करने के लिए एक विस्तृत कार्य योजना भी तैयार की जा रही है.'
इन दुर्गम प्रजाति की गिलहरियों की तलाश में रिसर्च विभाग को 10 से 12 दिन लग गए थे और इन पर निगरानी के लिए कई दिनों तक कैमरा ट्रैप लगाया गया. इसी साल उत्तराखंड में वन अनुसंधान केंद्र ने सभी फॉरेस्ट डिविजन में इन लुप्त हो रही प्रजातियों के लिए रिसर्च शुरू की थी.