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यूपी ‘एंटी-लव जिहाद’ ऑर्डिनेंस: पहले क्या रहे अदालतों के आदेश, क्या हो सकती हैं आगे कानूनी चुनौतियां? 

अध्यादेश कहता है कि ‘बल, जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव. धोखे या शादी के लिए लुभाने’ के जरिए किया गया धर्म परिवर्तन संज्ञेय और गैर जमानती अपराध है. इसमें महिलाओं या SC / ST समुदायों के लोगों के धर्म परिवर्तन पर 3 से 5 साल की सजा का प्रावधान है. जबकि सामूहिक धर्म परिवर्तन पर यह सजा 3 से 10 साल की होगी. 

उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ.(फाइल फोटो) उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ.(फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सामूहिक धर्म परिवर्तन पर 3 से 10 साल की सजा
  • अबतक क्या रहे हैं अदालतों के आदेश
  • 8 राज्यों में लागू हैं ‘धर्म परिवर्तन विरोधी कानून’

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से मंगलवार को गैर कानूनी धर्म परिवर्तन के खिलाफ अध्यादेश को मंजूरी देने के बाद नई बहस ने जन्म लिया है. गैर कानूनी धर्म परिवर्तन को कुछ बीजेपी नेताओं की ओर से ‘लव जिहाद’ का नाम दिया गया है. यह घटनाक्रम पिछले महीने यूपी के गाजियाबाद में कई दलित परिवारों के बौद्ध धर्म में ‘सामूहिक धर्म परिवर्तन’ के बाद सामने आया है. 

अध्यादेश में कहा गया है कि, ‘बल, जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव, धोखे या शादी के लिए लुभाने’ के जरिए किया गया धर्म परिवर्तन संज्ञेय और गैर जमानती अपराध है. इसमें महिलाओं या SC / ST समुदायों के लोगों के धर्म परिवर्तन पर 3 से 5 साल की सजा का प्रावधान है, जबकि सामूहिक धर्म परिवर्तन पर यह सजा 3 से 10 साल की होगी. 

कोई भी व्यक्ति जो धर्म परिवर्तन करना चाहता है उसे एक निर्धारित फॉर्मेट में जिला मजिस्ट्रेट को दो महीने एडवांस में सूचित करना होगा. लेकिन यह अध्यादेश, अगर यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की ओर से हस्ताक्षर करने के बाद कानून में बदल जाता है तो इसे अदालतों के सामने कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. 

अभी तक अदालतों ने क्या आदेश दिए है? 
11 नवंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सलामत अंसारी केस में व्यवस्था दी कि किसी व्यक्ति के बालिग होने पर उसे वैधानिक तौर पर जीवनसाथी चुनने का अधिकार हासिल होता है. ये फैसला, हालांकि, धर्म परिवर्तन की वैधता और मान्यता, को लेकर कुछ नहीं कहता, लेकिन  इसने ये माना कि दो बालिगों को "शादी की प्रकृति में एक रिश्ते में" रहने का अधिकार है, अगर वे दोनों अपनी मर्जी से ऐसा करना चुनते है.

2018 में शफीं जहां केस (जिसे हदिया केस के नाम से जाना जाता है) में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि किसी भी धर्म में धर्म परिवर्तन करने का अधिकार और शादी करने के लिए साथी को चुनने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार में अंतर्निहित है.  

अदालत ने कहा था कि “’सामाजिक मूल्यों और नैतिकता का अपना स्थान है लेकिन वे संवैधानिक गारंटी वाली स्वतंत्रता से ऊपर नहीं हैं. यह स्वतंत्रता, संवैधानिक और मानवीय अधिकार, दोनों है. उस स्वतंत्रता से वंचित किए जाने को, जो आस्था की दलील के विकल्प में समाई हुई है, अनुमति नहीं दी जा सकती.” सुप्रीम कोर्ट की एक और बेंच ने 2018 शक्तिवाहिनी केस में अपने फैसले में कहा था कि दो बालिग अगर मर्जी से शादी करते हैं तो उसमें दखल नहीं दिया जा सकता. ये केस ऑनर किलिंग और जीवनसाथी चुनने के अधिकार से जुड़ा था. 

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कोर्ट ने कहा था, “’इस तरह के अधिकार को संवैधानिक कानून की मंजूरी हासिल है, और जब इसकी पहचान हो जाती है, तो उपरोक्त अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए, और इसे क्लास ऑनर या किसी अवधारणा के आधार पर बनाई गई ग्रुप की सोच के आगे झुकने नहीं दिया जा सकता, ऐसी अवधारणा जिसे दूर दूर तक किसी तरह की वैधता हासिल नहीं है.”’   
 

इन राज्यों में लागू है ‘धर्म परिवर्तन विरोधी कानून’  

‘धर्म परिवर्तन विरोधी कानून’ आठ राज्यों में लागू हैं- ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड और उत्तराखंड. ये सारे कानून ‘बल, प्रलोभन और धोखेधड़ी से धर्म परिवर्तन’ को दंडित करना चाहते हैं. हालांकि किसी ने भी ‘प्रलोभन देकर की गई शादी’ का दंडनीय अपराध के तौर पर जिक्र नहीं किया है.

इनमें से दो कानून - गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट,  2003, (जिसके नियमों को 2008 में अधिसूचित किया गया) और झारखंड फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट 2017, में "पूर्व सूचना" और जिला अधिकारियों को नोटिस देने का प्रावधान है. झारखंड अधिनियम की संवैधानिक वैधता को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, और मामला लंबित है. मध्य प्रदेश में कानूनों में समान प्रावधानों को जोड़ने के कदम को राज्य के राज्यपालों की ओर से पिछले कुछ वर्षों में अवरुद्ध किया जा चुका है. 

ओडिशा और मध्य प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट्स,  क्रमशः 1967 और 1968 में पास हुए. रेव स्टैनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य केस में 1977 में सुप्रीम कोर्ट की 5-जज संविधान पीठ ने अपने फैसले में राज्यों के एक्ट्स को वैध ठहराया. फैसले में कहा गया कि दूसरों को अपने धर्म में परिवर्तित करना मौलिक अधिकार नहीं है. 

हालांकि, 1977 के फैसले और शीर्ष अदालत के कुछ और फैसलों में कहा गया है कि अगर कोई अपनी मर्जी से दूसरा धर्म अपनाता है, आस्था के लिए, तो वो अनुच्छेद 25 के तहत धर्म के पालन और प्रसार के मौलिक अधिकार का हिस्सा है. 

मानव स्वतंत्रता में गंभीर अतिक्रमण 
वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता के मुताबिक यूपी अध्यादेश "मानव स्वतंत्रता में एक गंभीर अतिक्रमण है." उन्होंने कहा, “यह लोगों के जीवन की पसंदों को तय कर रहा है. जब हम विशिष्ट स्वतंत्रता के बारे में बात करते हैं, तो किसी भी लोकतंत्र की पहली स्वतंत्रता कृत्य (एक्ट) की स्वतंत्रता है. जीवनसाथी की मेरी पसंद को आउटलाइन करने का यह सवाल पूरी तरह से असंवैधानिक है. इसका इस्तेमाल हर अंतर-धार्मिक (Inter-religious) विवाह पर सवाल उठाने के लिए किया जाएगा. आप सरकार की दया पर रहेंगे क्योंकि कोई भी आप पर प्राथमिकी दर्ज कर सकता है और आपके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है.”

वरिष्ठ वकील का यह भी कहना है कि राज्यपाल की ओर से हस्ताक्षर होते ही अध्यादेश को चुनौती देने वाले केस फाइल हो सकते हैं. वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद केटीएस तुलसी का भी कहना है कि प्रावधान "पूरी तरह से मनमाने और असंवैधानिक” हैं. 

तुलसी कहते हैं,  “लव जिहाद क्या है जो पूरे अध्यादेश का सेंट्रल थीम है? कानून को परिभाषित करना होगा. यहां हम नहीं जानते कि कौन सा ऐसा कार्य है जो अवैध हो गया है - चाहे वह विवाह हो या धर्म परिवर्तन, जो प्रतिबंधित हो रहा है, और आप यह क्यों कह रहे हैं कि मैं कल शादी नहीं कर सकता? यह अनुच्छेद 19 और 21 के लिए अभिन्न है.धर्म परिवर्तन, चाहे वह शादी में हो या शादी से पहले,  शादी करने वाले व्यक्तियों को छोड़कर और किसी का बिजनेस (उससे कोई लेना देना) नहीं है.’’ 

 

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