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कोरोना: करगिल में लड़ने वाले सैनिक ने खोया बेटा, अंतिम बार चेहरा देखने के लिए घंटों का इंतजार

कारगिल में लड़ने वाले रिटायर्ड सूबेदार हरिराम कहते हैं कि ''हमने देश के लिए लड़ाई लड़ी है, कारगिल में पाकिस्तान से लड़ाई लड़ी और अब यह लोग हैं मुझे मेरे बेटे की लाश भी नहीं दे रहे हैं.''

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अस्पतालों की बदहाली से परेशान मरीज
  • शव लेने के लिए भी लगानी पड़ रही है लाइन
  • अस्पतालों पर सरकार के दावों से अलग है तस्वीर

उत्तर प्रदेश में कोविड-19 अब अनगिनत जिंदगियां लीलने में लगा हुआ है. कानपुर के हैलट अस्पताल में अपनों का शव लेने वालों को भी लाइन लगानी पड़ रही है. मृत्यु अब संख्या बन गई है. कहीं आंख में आंसू है, कहीं चीख-पुकार है तो कहीं गुस्सा है. अस्पताल में आने वाले पहले ही अपनों को खोने का गम झेल रहे हैं, ऊपर से सिस्टम की बेरुखी सब्र का इम्तिहान लेने में लगी है.

कानपुर के रहने वाले चंद्रपाल की बहन सावित्री पाल हैलट अस्पताल में भर्ती थीं, चंद्रपाल सीआरपीएफ में रहते हुए देश की सेवा कर चुके हैं. चंद्रपाल के भाई और उनके परिवार के दूसरे सदस्य भी फौज में रहकर भारत माता की सेवा कर चुके हैं. लेकिन उनके ही परिवार की सदस्य सावित्री पाल अस्पताल में कोविड-19 से मर गईं. लेकिन परिवार वालों को इस बात की समय से सूचना तक नहीं दी गई.

चंद्रपाल सीआरपीएफ के असिस्टेंट कमांडेंट की ड्यूटी करके रिटायर हुए थे. चंद्रपाल के भाई रामचंद्र कहते हैं, "हम अपनी बहन को अस्पताल में लेकर के आए थे क्योंकि उसे ऑक्सीजन की दिक्कत हो रही थी. 22 तारीख को हम उन्हें यहां लेकर के आए थे. लेकिन अंदर की कोई जानकारी हमें नहीं दी जाती थी. मैंने सालों श्रीनगर में नौकरी की है. हमें उनसे बात तक नहीं करवाई जाती थी कि वो किस हाल में हैं"

सावित्री के बेटे जो खुद फौजी हैं कहते हैं ''कल मेरा ऑक्सीजन लेवल कम था और बायोपैप पर रखा गया था और आज सुबह अंदर के स्टाफ से जिसे हम पैसे देकर के काम करवाते हैं उससे पता चला कि मां की मृत्यु हो गई है."

रामचंद्र का कहना है कि अस्पताल वाले कहते रहे कि उन्होंने हमें फोन किया था लेकिन हमें एक बार भी फोन करके मरने की जानकारी नहीं दी गई. और अब हमें उनका शव लेने के लिए भी इंतजार करवाया जा रहा है.

करगिल में दुश्मनों को धूल चटाने वाले और बारामूला में आतंकियों का सफाया करने वाले रिटायर्ड सूबेदार मेजर हरिराम दुबे को अपने मृत बेटे का आखरी बार चेहरा देखने के लिए भी घंटों तक इंतजार करना पड़ा. 1981 में फौज में दाखिल हुए हरिराम दुबे 2011 में सूबेदार मेजर के पद से रिटायर हुए. ‌‌‌‌6 माउंटेन का हिस्सा रहे हरिराम लद्दाख, करगिल, बारामूला और लीमाकांग में देश की हिफाजत के लिए लड़ते रहे. हरिराम कहते हैं कि उन्हें अपनी ड्यूटी के लिए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ से प्रशंसा पत्र भी मिल चुका है.

हरिराम अपने 31 साल के बेटे अमिताभ दुबे का शव लेने आए हैं. संक्रमण के चलते अमिताभ दुबे को अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था और अमिताभ दुबे संक्रमण की जंग हार गए. अब हरिराम अपनी पत्नी अपनी बहू अपनी बेटी के साथ अमिताभ का शव लेकर इलाहाबाद जाना चाहते थे. हरिराम का कहना है कि अस्पताल की ओर से कहा जाता है कभी यह कागज लाओ, कभी वह कागज लाओ, हम पहले ही परेशान हैं आखिर करें तो क्या करें.

हरिराम कहते हैं कि ''हमने देश के लिए लड़ाई लड़ी है, करगिल में पाकिस्तान से लड़ाई लड़ी और अब यह लोग हैं मुझे मेरे बेटे की लाश भी नहीं दे रहे हैं.''

रिटायर्ड सूबेदार मेजर हरिराम दुबे ने आज तक से भी गुहार लगाई कि किसी तरह अस्पताल प्रशासन से मदद मांग कर उन्हें अपने बेटे का आखरी बार चेहरा दिखा दे. आज तक ने अस्पताल के कर्मचारियों से निजी तौर पर गुहार लगाई कि अगर वे हरिराम दुबे को अपने बेटे का चेहरा दिखा दें. कर्मचारियों ने भी कहा कि हम तुरंत मदद करेंगे. संक्रमित मरीजों का शव परिवार को नहीं दिया जा सकता ये हरिराम दुबे और उनके परिवार को भी समझाना पड़ा. आखिरकार हरिराम दुबे बेटे का चेहरा दूर से देखने के लिए तैयार हो गए.

आजतक की टीम ने अपने इस्तेमाल के लिए रखी हुई प्रोटेक्टिव किट इस फौजी के परिवार को दी ताकि वह सुरक्षित रहते हुए अपने बेटे का चेहरा आखिरी बार देख सकें. हरिराम दुबे का दर्द यह है कि बेटे की मौत 1 दिन पहले हुई तो आखिरी बार चेहरा दिखाने के लिए भी घंटों का इंतजार क्यों? ऐसी स्थिति में कहां-कहां ठोकर खाए? इस हाल में कहां-कहां कागज बनवाएं?  हरिराम दुबे ने जो खोया है वह नुकसान कोई भी पूरा नहीं कर सकता.

यह वह परिवार जो कानपुर के इस अस्पताल में अपनों को बेहतर इलाज की उम्मीद में लेकर के आया था लेकिन कैलेंडर बदलते ही मौत की खबर सुनकर रोते बिलखते वापस जा रहा है. सरकार और प्रशासन के दावों और जमीनी हकीकत एक दूसरे से बिल्कुल अलग है.

 

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