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'यूं करो सरकार, कंधे पर न निकले किसी बेटे का दम'

मासूम अंश की इस मौत ने पूरे सिस्टम पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर एक सरकारी अस्पताल में क्यों उसे वक्त पर इलाज नहीं मिला? क्यों उसे पहले न तो एंबुलेस मिली ना बाद में अस्पताल में स्ट्रेचर?

कानपुर में अस्पताल के चक्कर लगाते सुनील कानपुर में अस्पताल के चक्कर लगाते सुनील

कानपुर में 12 साल के मासूम को कंधे पर लटकाए और अस्पताल के वार्ड दर वार्ड घूमते दृश्य को दुनिया ने देखा, तो सबका कलेजा मुंह को आ गया. बेटे की जान के लिए भागते पिता की बेबसी देख शायद ही कोई अपने आंसू रोक पाया. मामला बढ़ने पर प्रशासन ने जांच के आदेश दे दिए है, वहीं सिस्टम के आगे पस्त पिता सुनील हाथ जोड़कर कहते हैं, 'मेरे बेटे के साथ जो होना था वो तो हो गया अब कम से कम किसी दूसरे के साथ ये न हो.'

मासूम अंश की इस मौत ने पूरे सिस्टम पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर एक सरकारी अस्पताल में क्यों उसे वक्त पर इलाज नहीं मिला? क्यों उसे पहले न तो एंबुलेस मिली ना बाद में अस्पताल में स्ट्रेचर? आखिर क्यों कानपुर का सबसे बड़ा अस्पताल इमरजेंसी में बच्चे की मदद नहीं कर पाया?

दो सदस्यीय टीम ने शुरू की जांच
ये सवाल ऐसे हैं, जिसका जबाब सरकार को देना है. लेकिन जब मामले ने तूल पकड़ा तो कानपुर के डीएम ने भी जांच बिठा दी. कानपुर के डीएम ने मंगलवार को दो सदस्यीय जांच कमेटी बनाई, जिसमें लखनऊ के एडिशनल मजिस्ट्रेट और कानपुर के एडिशनल चीफ मेडिकल अफसर शामिल हैं. दोनों अधि‍कारियों ने सुनील के घर जाकर मामले की जांच शुरू कर दी है.

पिता ने अधि‍कारियों को सुनाई बेबसी की कहानी
करीब घंटे भर तक दोनों लोग परिवार से जानकारी लेते रहे कि आखिर कहां, कैसे और किस डॉक्टर ने अस्पताल में उनकी मदद नहीं की. बच्चे के पिता सुनील ने बताया कि बेटे के आखिरी आधे घंटे में वो अस्पताल के भीतर एक वार्ड से दूसरे वार्ड में भागता रहा. सुनील ने कहा कि अगर वक्त पर बेटे अंश को चिकित्सा सुविधा मिल गई होती तो वो बच जाता.

अंश की मां अनिता के आंसू सूख गए हैं, लेकिन ये दंपति हिम्मत नहीं हारते हुए न सिर्फ सिस्टम पर सवाल उठा रहा है बल्कि ये अपील भी कर रहा है कि अब किसी मां की कोख सूनी न हो. किसी पिता को फिर कभी अपने मासूम को अस्पताल में कांधे पर न लादना पड़े.

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