कोरोना वायरस की महामारी ने उद्योग-व्यापार की कमर तोड़कर रख दी है. इस दौर में व्यापार का तरीका बदला, तो कई क्षेत्रों में कार्यरत लोग बेरोजगारी की कगार पर हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र आध्यात्मिक नगरी काशी की पहचान रहा बनारसी साड़ी उद्योग भी इन्हीं में से एक है. कोरोना के चलते करघे थम गए हैं तो इस पर आश्रित बुनकरों के सामने रोजगार का संकट उत्पन्न हो गया है.
मजबूरन बुनकर अपने हुनरमंद रोजगार से पलायित होकर पान, टॉफी-बिस्किट और सब्जी बेच जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रहे हैं. बनारस के बुनकर बाहुल्य इलाके हैंडलूम-हथकरघों के शोर से गुलजार रहा करते थे लेकिन इस कोरोना काल में पिछले चार महीने से बंद पड़े हैं. बुनकर बेरोजगार हो चुके हैं. नया ऑर्डर नहीं मिलने से साड़ी की बुनाई का काम ठप पड़ा हुआ है.
गुजर-बसर के लिए पान की दुकान चला रहे बुनकर
बुनकर बाहुल्य इलाके अमरपुर बटलोहिया में सब्जी बेचकर परिवार चला रहे बुनकर जागीर अहमद ने बताया कि पहले बुनकरी के काम से पांच सौ रुपये प्रतिदिन की कमाई हो जाया करती थी, लेकिन अब मुश्किल से 100 रुपये भी बच पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि अबतक किसी भी तरह की कोई सरकारी मदद उन्हें नहीं मिली है.
सब्जी बेच रहे बुनकर
सरैया में सब्जी बेच रहे बुनकर अमीरउल्लाह महतो सिर्फ नाम के ही अमीर रह गए हैं. वे बताते हैं कि पहले चार पॉवरलूम उनके यहां चलते थे, लेकिन लॉकडाउन के चलते मशीनें पूरी तरह बंद हैं. आलम यह है कि खाने के मोहताज हो गए तो उधार लेकर सब्जी की दुकान लगानी पड़ी. उम्र के इस पड़ाव पर न तो उनका राशन कार्ड बना है और न ही बुनकर कार्ड. वे बताते हैं कि उनके बुनकर बिरादरी से भी सरदारों की पहुंच शासन-प्रशासन तक नहीं हो पा रही है. उन्होंने बताया कि ऐसे ही चलता रहा तो भुखमरी की नौबत आ जाएगी.
महिलाएं भी बंटाती थीं हाथ
कई बुनकरों ने घर में ही कर ली टॉफी-बिस्किट की दुकान
क्या कहते हैं बुनकर नेता?
इस पूरे मामले पर बुनकर नेता और इलाके के पार्षद हाजी वकास अंसारी ने कहा कि हिंदू और मुसलमान बुनकरों को मिलाकर दो से तीन लाख की आबादी बुनकरी में है. बुनकरों को एक भी राशन किट लॉकडाउन में नहीं मिली. उन्होंने कहा कि हम जनप्रतिनिधि 1000 रुपये दिलाने के लिए एडीआई का फॉर्म भी भरवाए, लेकिन किसी को एक रुपये नहीं मिले. हाजी वकास ने कहा कि सरकार की उदासीनता के कारण बनारसी साड़ी का हुनर खत्म होता जा रहा है.