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अगस्त में बच्चे मरते ही हैं- बयान देने वाले मंत्री से अगस्त में ही छिन गया विभाग

उत्तर प्रदेश के ताकतवर मंत्रियों में से एक सिद्धार्थनाथ सिंह से चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जैसा महकमा छीन लेने को योगी सरकार का चौंकाने वाला कदम माना जा रहा. सवाल उठ रहे हैं कि क्या यूपी की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर न लाने का ठीकरा उन पर फूटा है.

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी ने मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह से छीना स्वास्थ्य विभाग(फोटो-IANS) उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी ने मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह से छीना स्वास्थ्य विभाग(फोटो-IANS)

योगी आदित्यनाथ सरकार के दो साल के कार्यकाल में हुए पहले फेरदबल में कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह को बड़ा झटका लगा है. उनसे चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, परिवार, मातृ एवं शिशु कल्याण जैसा भारी भरकम विभाग छिन गया है. अब उन्हें खादी एवं ग्रामोद्योग, रेशम, वस्त्र उद्योग, सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम, निर्यात प्रोत्साहन, एनआरआई, निवेश प्रोत्साहन खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग मिला है.

खास बात है कि सिद्धार्थनाथ सिंह को स्वास्थ्य विभाग उसी अगस्त में गंवाना पड़ा है, जिस महीने में दिए एक बयान से वह घिर गए थे. गोरखपुर में बच्चों की मौत पर सरकार का बचाव करते हुए उन्होंने कहा था," अगस्त में बच्चे मरते ही हैं."

दरअसल, अगस्त 2017 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दर्जनों बच्चों की इंसेफेलाइटिस से मौत हो गई थी. एक साथ भारी संख्या में बच्चों की मौत पर योगी सरकार घिर गई थी तो बचाव करने के दौरान तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कुछ आंकड़ों के हवाले से कह दिया था- अगस्त में ज्यादा बच्चे मरते ही हैं. उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई थी. ऐसे में अब दो साल बाद अगस्त में ही उनसे स्वास्थ्य विभाग छीने जाने का मामला चर्चा-ए-खास है.

ताकतवर मंत्री के रूप में जाने जाते रहे सिद्धार्थनाथ

रिश्ते में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाती सिद्धार्थनाथ सिंह यूपी में मंत्री बनने से पहले बीजेपी की राष्ट्रीय टीम में रहे. वह राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर राजधानी दिल्ली में सक्रिय रहते थे. फिर पार्टी नेतृत्व ने उन्हें उत्तर प्रदेश में भेजने का फैसला किया.  2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा सीट से उतारा.

दो बार की विधायक पूजा पाल को हराकर विधायक बने. बीजेपी में मजबूत पकड़ का नतीजा रहा कि पहली बार ही विधायक बनने के बाद जहां उन्हें योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने का मौका मिला, वहीं चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जैसे अहम विभाग की भी जिम्मेदारी सौंपी गई.

वह योगी आदित्यनाथ सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता भी हैं. कैबिनेट में लिए गए फैसलों की मीडिया को आधिकारिक प्रवक्ता की हैसियत से जानकारी देते हैं. बताया जाता है कि दिल्ली में बीजेपी के बड़े राष्ट्रीय नेताओं के साथ काम करने के चलते सिद्धार्थनाथ सिंह की पहचान यूपी में एक ताकतवर मंत्री की रही. हालांकि जिस तरह से उनसे चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जैसा महकमा लेकर दूसरे मंत्री जय प्रताप सिंह को दिया गया, वह उनके लिए झटका माना जा रहा है.

स्वास्थ्य क्षेत्र की बदहाली नहीं कर पाए दूर

हाल में नीति आयोग की जारी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश की चिकित्सा सुविधाओं को बदहाल बताया गया था. नीति आयोग ने स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में उत्तर प्रदेश को काफी कम 21वीं रैकिंग दी गई थी. जिसके बाद सवाल उठने शुरू हुए थे. बसपा मुखिया मायावती ने भी नीति आयोग की रिपोर्ट पर ट्वीट कर यूपी की स्वास्थ्य सुविधाओं को बदहाल बताया था. हालांकि सिद्धार्थनाथ सिंह ने बचाव में कहा था कि नीति आयोग की रिपोर्ट 2017 के पहले के आंकड़ों पर आधारित रही, उससे पहले समाजवादी पार्टी की सरकार थी.

हालांकि, सूत्र बताते हैं कि तेजतर्रार माने जा रहे सिद्धार्थनाथ सिंह को स्वास्थ्य विभाग देने के पीछे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा थी कि वह विभाग की कायापलट करेंगे. मगर दो साल से ज्यादा के कार्यकाल में ऐसा कुछ खास नहीं कर पाए. सीएमओ की पोस्टिंग को लेकर भी सवाल उठे. आखिरकार विभाग गंवाना पड़ गया. हालांकि कहा जा रहा है कि विभागों के बंटवारे से किसी के कद घटने या बढ़ने का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. सिद्धार्थनाथ सिंह को बदले में कई विभाग मिले हैं.

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