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अखिलेश यादव और CBI के छापे, क्या शिकंजे में है सपा-बसपा का गठबंधन?

CBI Raids In UP: मीडिया के अलग-अलग धड़े में छापे के वक्त पर बहस जारी है लेकिन कार्रवाई पर किसी का सवाल नहीं क्योंकि मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर आगे बढ़ा है.

अखिलेश यादव की फाइल फोटो (रॉयटर्स) अखिलेश यादव की फाइल फोटो (रॉयटर्स)

यूपी में शनिवार को सीबीआई ने कई जगह छापेमारी की. यह कार्रवाई अवैध रेत खनन मामले से जुड़ी है. हमीरपुर, नोएडा, लखनऊ और कानपुर समेत अन्य इलाकों में की गई छापेमारी में क्या बरामद हुआ, अभी यह साफ नहीं है लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि आईएएस अधिकारी बी. चंद्रकला से जुड़ी इस कार्रवाई के तार प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जुड़ते दिख रहे हैं क्योंकि अवैध खनन का मामला उस वक्त का है, जब तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव के पास खनन मंत्री की भी जिम्मेदारी थी.

उधर गठबंधन, इधर छापे

इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और कि नई दिल्ली में एक ओर शनिवार को सुबह सपा-बसपा गठबंधन की बैठक चली और उधर दोपहर होते-होते यूपी के कई ठिकानों पर धड़ाधड़ सीबीआई के छापे पड़ गए. एक तरफ फैसला हुआ कि यूपी में आगामी लोकसभा चुनावों में सपा और बसपा 37-37 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी और दूसरी ओर शाम तक सीबीआई ने अवैध खनन के मामले में अखिलेश यादव के विधायक रमेश मिश्रा और उनके भाई दिनेश कुमार को आरोपी बनाया.

अब सीबीआई सूत्रों के हवाले से खबरें आ रही हैं कि खनन मामले में अखिलेश यादव की भूमिका की भी जांच की जाएगी और जांच एजेंसी उनसे पूछताछ भी कर सकती है. यहां जान लेना जरूरी है कि अखिलेश यादव साल 2012 से 2013 तक यूपी के सीएम होने के साथ साथ खनन मंत्री भी थे. ऐसे में मामले की आंच अखिलेश यादव तक पहुंच सकती है.

मामला पुराना, लेकिन छापे नए

मीडिया के अलग-अलग धड़े में छापे के वक्त पर बहस जारी है लेकिन कार्रवाई पर किसी का सवाल नहीं, क्योंकि मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर आगे बढ़ा है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2016 में सपा सरकार के कार्यकाल में अवैध खनन और मनमाने तौर पर खदानों के पट्टे देने का मामला सीबीआई को सौंप दिया था और इस पर जांच आगे बढ़ाने को कहा था. इस मामले में थोड़ा और पीछे जाएं तो 31 मई 2012 को यूपी में एक टेंडर हुआ था जो ई-टेंडर के तहत नहीं था. लिहाजा इस मामले को कोर्ट ने काफी संगीन माना और सीबीआई को जांच के निर्देश दिए.

डीएम के खिलाफ छापे का तुक

सवाल उठ रहे हैं कि अवैध खनन मामले में किसी प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों? आपको बता दें कि यूपी में खनन माफिया और अफसरों का सिंडीकेट काफी चर्चित रहा है. अक्सर आरोप लगाए जाते रहे हैं कि खनन माफिया अपने रसूख का लाभ उठाकर मनमाफिक डीएम बनवाते रहे हैं और खदान पट्टे लेते रहे हैं. खनन माफिया की पहुंच सरकार तक होने के आरोप लगते रहे हैं ताकि वे साठगांठ कर अपनी मर्जी से खदान के इलाकों में डीएम तय करा सकें.

डीएम बी चंद्रकला पर हमीरपुर में जिलाधिकारी रहते अवैध खनन और अपने चहेतों को पट्टे देने का अरोप है. इसी संबंध में दो साल पहले हाईकोर्ट ने सीबीआई को जांच का आदेश दिया था. और भी कई कारण हैं जिसके चलते चंद्रकला छापे की जद में आईं. आईएएस अधिकारी रहते अपनी संपत्ति न घोषित करने को लेकर भी वे सुर्खियों में रहीं. साथ ही 2011 के बाद महज दो साल के अंदर उनकी संपत्ति 10 गुना तक बढ़ गई. चंद्रकला सरकार में पांच बार डीएम रहीं जिनमें एक हमीरपुर भी है. 2017 में सीबीआई ने उनसे पूछताछ की थी. उसी वक्त तत्कालीन प्रमुख सचिव (खनन) डॉ. गुरुदीप सिंह से खनन मामले में पूछताछ हुई थी.

निशाने पर सपा-बसपा के नेता ?

बी. चंद्रकला के अलावा जिन खास लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई है उनमें एक हैं बसपा के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष संजय दीक्षित और दूसरे सपा के एमएलसी रमेश मिश्रा और उनके भाई दिनेश मिश्रा. संजय दीक्षित की मां माया दीक्षित के नाम मौरंग खनन के पट्टे थे. ये वही पट्टे हैं, जहां अवैध मौरंग खनन की कई शिकायतें मिली थीं. फिलहाल सीबीआई इसी मामले में आगे बढ़ रही है और साक्ष्य जुटाने के लिए कार्रवाई कर रही है.

माया, मुलायम के बाद अखिलेश

बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंस चुके हैं. सीबीआई इन दोनों नेताओं के खिलाफ जांच भी कर चुकी है लेकिन साक्ष्य न जुटा पाने के कारण मामले बंद कर दिए गए थे.

मुलायम सिंह पर आय से अधिक संपत्ति का मामला नवंबर, 2005 में तब सामने आया जब रायबरेली के रहने वाले वकील और कांग्रेस कार्यकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर मुलायम, उनके बेटों अखिलेश यादव और प्रतीक यादव और बहू डिंपल यादव की संपत्ति की जांच सीबीआई से कराने की मांग की थी. हालांकि जांच एजेंसी इस मामले में मुलायम सिंह के खिलाफ सबूत नहीं जुटा सकी थी जिस वजह से केस बंद करने का फैसला किया गया. एक ऐसे ही मामले में सीबीआई ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर कानूनी राय लेने के बाद मायावती के खिलाफ अपनी जांच बंद करने का फैसला किया.

मायावती को एक मामले में भले फौरी राहत मिली हो लेकिन उन्हें पूर्ण राहत अभी नहीं मिली क्योंकि उनके खिलाफ सीबीआई ने एक जांच शुरू कर दी है. मामला उनके शासन काल के दौरान 2010-11 में बेची गई 21 चीनी मिलों से जुड़ा है. इन चीनी मिलों को बेचे जाने से प्रदेश सरकार को 1,179 करोड़ रुपए का घाटा बताया जा रहा है. एक ऐसा ही मामला 14 अरब के स्मारक घोटाले का सामने आया था जिसमें बसपा सुप्रीमो का नाम उछला था. हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई या एसआईटी से कराए जाने की अर्जी खारिज कर दी थी. ये सभी मामले अभी अलग-थलग पड़े हैं. लिहाजा मायावती और मुलायम सिंह सीबीआई की जांच से अभी कुछ हद तक दूर हैं लेकिन खनन मामले में अखिलेश से पूछताछ होती है तो उनका नाम सीबीआई की लिस्ट में नए सिरे से दर्ज हो सकता है.

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