एम करुणानिधि ने द्रविड़ मुनेत्र कडगम (डीएमके) की कमान पिछले 50 सालों से संभाल रखी थी और उनके बाद पार्टी की कमान किसके पास रहेगी, यह सवाल हमेशा से उठता रहा है, लेकिन 2 साल पहले उन्होंने इस सवाल पर विराम लगाते हुए अपने बेटे एमके स्टालिन को सियासी वारिस घोषित कर दिया.
हालांकि अक्टूबर 2016 में भी स्टालिन को अपना वारिस घोषित करते हुए स्पष्ट किया था कि इसका यह मतलब नहीं है वे खुद संन्यास ले रहे हैं. ये घोषणा पार्टी कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश है कि पार्टी का उत्तराधिकारी मौजूद है. साथ ही अझागिरी और स्टालिन गुटों के बीच चल रहे सत्ता संघर्ष पर विराम लगाने की कोशिश भी थी. इससे पहले जनवरी, 2013 में करुणानिधि ने स्टालिन को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था.
पिछले साल जनवरी में ही डीएमके ने स्टालिन को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया. हालांकि करुणानिधि ने पार्टी सुप्रीमो की कमान अपने हाथ में ही रखी थी.
स्टालिन पार्टी के कामकाज को लेकर काफी मेहनत करते हैं. एक साक्षात्कार में करुणानिधि ने साफ कहा था कि स्टालिन मेरे उत्तराधिकारी हैं. इसके साथ ही यह साफ हो गया कि स्टालिन की तुलना में एमके अझागिरी पार्टी में पकड़ नहीं बना सके. हालांकि अझागिरी ने इसके लिए काफी संघर्ष किया था, लेकिन नाकाम रहे.
अझागिरी की पार्टी के शीर्ष स्तर से दूरी तब और बढ़ गई जब राज्यसभा सांसद और करुणानिधि की बेटी कनिमोझी ने मई, 2016 में भी स्वीकार किया कि उनके पिता करुणानिधि के बाद सौतेले भाई स्टालिन ही पार्टी संभालेंगे.
करुणानिधि के बेटों अझागिरी और स्टालिन लंबे समय से खुद को पार्टी का उत्तराधिकारी घोषित करने की मांग कर रहे थे. एक वक्त था जब अझागिरी डीएमके की दक्षिणी राज्य इकाई को संभाला करते थे, लेकिन बाद में स्टालिन आए और उन्होंने तेजी से ऊपर चढ़ते हुए पार्टी संगठन पर जबर्दस्त पकड़ बनाई, इसे संभाला और जनसंपर्क के ढेरों कार्यक्रम चलाए.
स्टालिन पार्टी के अन्य नेताओं की तुलना में आम लोगों से मिलने से परहेज नहीं करते और उनसे कहीं भी मिल लेते थे. इस कारण वह लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए.
स्टालिन की इसी अदा ने उन्हें पिता करुणानिधि के बेहद करीब कर दिया जिस कारण पार्टी में नंबर 2 की हैसियत हासिल करते हुए अझागिरी की जगह को खुद को उत्तराधिकारी स्थापित किया.
हालांकि मार्च, 2010 में करुणानिधि के बेटे और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अझागिरी ने कहा था कि वह किसी को करुणानिधि के बाद पार्टी के नेता के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे.