सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को एक अवमानना याचिका के मामले में राहत देने से इनकार कर दिया है. प्रशांत भूषण ने अर्जी दायर कर जस्टिस अरुण मिश्रा को इस अवमानना मामले की सुनवाई से रोकने की मांग की थी, जिसे शीर्ष कोर्ट ने खारिज कर दिया.
अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने केंद्र सरकार की तरफ से दायर अवमानना याचिका में प्रशांत भूषण पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने एक ट्वीट में कहा कि वेणुगोपाल ने सीबीआई के अंतरिम निदेशक के चयन के लिए हुई चयन समिति की बैठक के मिनट को 'मनगढ़ंत' रूप दिया. यह बैठक तत्कालीन कार्यवाहक सीबीआई निदेशक एम. नागेश्वर राव की नियुक्ति को लेकर हुई थी, जिसमें समिति ने राव की नियुक्ति को मंजूरी दी थी.
SC dismisses an application filed by Prashant Bhushan seeking recusal of Justice Arun Mishra from hearing contempt case filed by AG KK Venugopal and Centre against Bhushan for his tweets allegedly criticising Court on appointment of M Nageswara Rao as interim CBI Director. pic.twitter.com/gfGWqVID6B
— ANI (@ANI) March 7, 2019
जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा था कि वे मुद्दे को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो न्यायालय के समक्ष विचाराधीन मुद्दे से जुड़ा है और जो जनता की राय तथा वादियों के अधिकार पर असर डाल सकता है. इसी मामले में सात मार्च यानी आज सुनवाई हुई जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अवमाना याचिका को खारिज करने की प्रशांत भूषण की मांग नहीं मानी.
बता दें कि यह स्पष्ट करते हुए कि एक वकील को सजा अंतिम उपाय होनी चाहिए जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा- अवमानना एक ब्रह्मास्त्र है, इसका आमतौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. उस दौरान वेणुगोपाल ने साफ किया था कि वह भूषण के लिए किसी सजा की मांग नहीं कर रहे हैं, लेकिन चाहते हैं कि एक रेखा खींची जाए और अदालत में विचारधीन मामलों पर मीडिया रिपोर्टिग और वकीलों द्वारा टिप्पणी करने की सीमा को लेकर एक कानून लाया जाए. हालांकि, केंद्र की तरफ से पेश सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने सार्वजनिक तौर पर फैसलों की आलोचना करने वाले और जजों पर आक्षेप लगाने वाले वकीलों को अनुशासित करने की मांग की थी. मेहता ने कहा कि इस तरह के लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने की अदालत की उदारता को उसकी कमजोरी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.