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व्यंग्य: प्रधानमंत्री के ध्यानार्थ, एक मजदूर के मन की बात

कुछ सपने अधूरे रह जाते हैं. शायद जीते जी पूरे होने लायक नहीं होते. या फिर इतनी देर से पूरे होते हैं कि पूरा जीवन भी छोटा पड़ जाता है. कई तो ऐसे भी होते हैं कि मरने के बाद भी पूरे नहीं होते.

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वाराणसी
वाराणसी

आदरणीय साहेब जी,

हर हर महादेव. यहां सब लोग इसी तरह दुआ-सलाम करते हैं. आप यहां के सांसद पहले हैं, प्रधानमंत्री तो बाद में बने होंगे.

कुछ सपने अधूरे रह जाते हैं. शायद जीते जी पूरे होने लायक नहीं होते. या फिर इतनी देर से पूरे होते हैं कि पूरा जीवन भी छोटा पड़ जाता है. कई तो ऐसे भी होते हैं कि मरने के बाद भी पूरे नहीं होते.

मैं खुशनसीब हूं. मेरा सपना मरने के बाद पूरा हो रहा है, खुशी मुझे इसी बात की है. लेकिन दुख इस बात का है कि मेरी मौत के कारण आपने बनारस का कार्यक्रम रद्द कर दिया.

आपकी राह देख रहा था. जब दो बार आपका तो सोचा पत्र लिख कर ही आपसे अपने मन की बात कह दूं. काश, ऐसा नियति को भी मंजूर होता.

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जब आप पहली बार आए तो बताए कि मां गंगा ने आपको बुलाया है. चुनाव लड़े, जीते भी. .

आप बनारस आए. संकट मोचन गए. काशी विश्वनाथ का भी आपने दर्शन किया. ये सब तो ठीक है.

क्या आपने काल भैरव का दर्शन किया? नहीं किया. फिर आप कैसे उम्मीद करते हैं कि आप 'ट्रॉमा सेंटर' का उद्घाटन कर पाएंगे साहेब.

क्या अभी तक किसी ने आपको नहीं बताया! हमे तो बड़ा ताज्जुब हो रहा है. खैर, फिलहाल तो पूरे शहर में एक ही चर्चा है. शहर के कोतवाल आपसे नाराज हो गए हैं, साहेब.

शिव के इस शहर के असली कोतवाल भैरव बाबा ही हैं. शायद ये बात अब तक आपको नहीं मालूम. इस शहर का एक रिवाज है, साहेब. यहां जो भी अधिकारी आता है - चाहे वो आईजी हो, कमिश्नर हो, डीएम हो या एसएसपी... जब तक वो भैरव के दरबार में मत्था नहीं टेकता उसका यहां टिकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है.

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