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घर की ताकत से मिलती है सायना को कामयाबी

नेहवाल दंपती का सपना साकार होने में 12 वर्ष लग गए. हिसार स्थित हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में कीट विशेषज्ञ हरवीर सिंह नेहवाल जब हैदराबाद स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के तिलहन शोध निदेशालय में गए तो उनका एक ही सपना था कि उनकी दोनों बेटियां खिलाड़ी के रूप में नाम कमाएं. आखिर वे और उनकी पत्नी उषा, एक गृहिणी, अच्छे बैडमिंटन खिलाड़ी थे.

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नेहवाल दंपती का सपना साकार होने में 12 वर्ष लग गए. हिसार स्थित हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में कीट विशेषज्ञ हरवीर सिंह नेहवाल जब हैदराबाद स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के तिलहन शोध निदेशालय में गए तो उनका एक ही सपना था कि उनकी दोनों बेटियां खिलाड़ी के रूप में नाम कमाएं. आखिर वे और उनकी पत्नी उषा, एक गृहिणी, अच्छे बैडमिंटन खिलाड़ी थे.

छोटी वाली बेटी ने दिलचस्पी दिखाई पर जुडो और कराटे में नहीं जिनमें 1998 में उसका दाखिला कराया गया था. आठ वर्षीया सायना ने बैडमिंटन का रैकेट पकड़ने का फैसला किया. अगले ही साल से नेहवाल उन्हें अपने स्कूटर या बस से 20 किलोमीटर दूर हैदराबाद के बीच में स्थित लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम ले जाने लगे ताकि आंध्र प्रदेश खेल प्राधिकरण (एसएएपी) के कोच पीएसएस नानी प्रसाद से प्रशिक्षण दिलवा सकें. प्रसाद का कहना है, ''उसके असीमित उत्साह से लगता था कि वह सीखने को तैयार है और फौरन सीख गई.''

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जब एसएएपी ने अपनी बैडमिंटन एकेडमी को विजयवाड़ा स्थानांतरित करने का फैसला किया तो दृढ़ निश्चय कर चुके पिता सायना को हैदराबाद में भारतीय खेल प्राधिकरण ले गए और अगले चार साल तक सायना राष्ट्रीय कोच एस.एम. आरिफ की निगरानी में रहीं.

जब पुलेला गोपीचंद ने 2004 में गोपीचंद बैडमिंटन एकेडमी शुरू की तब नेहवाल ने अपनी बेटी को पूर्व इंग्लैंड चैंपियन की निगरानी में डालने में वक्त नहीं गंवाया. विडंबना ही है कि सायना पर गोपीचंद ने तभी ध्यान दिया था जब दोनों आरिफ की निगरानी में प्रशिक्षण हासिल कर रही थीं.{mospagebreak}पिता ने सायना को सामान्य बच्चों की इच्छाओं-हफ्ते में एक बार आइसक्रीम खा सकती हैं और फिल्म देखने शायद ही कभी जाती हैं-से वंचित कर यह सुनिश्चित कर दिया कि वे अपनी कामयाबी के आड़े आने वाली चीजों पर ध्यान न दें. यह उस लड़की की लगन ही है कि जीत के बाद हैदराबाद लौटने पर भव्य स्वागत की अगली सुबह अपनी होंडा सिटी से फिर प्रशिक्षण के लिए एकेडमी पहुंच गई. गोपीचंद का कहना है, ''खेल के लिए उसकी भूख कभी खत्म नहीं होती.'' उन्होंने कभी अपने थकाऊ दिनचर्या की शिकायत नहीं की. इसकी वजह से उन्हें अपनी औपचारिक शिक्षा छोड़नी पड़ी हालांकि उन्हें शहर के सेंट ऐन्स कॉलेज में दाखिला मिल गया.

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गौरवान्वित पिता कहते हैं, ''उसकी हाल की जीत की वजह से मेरी बेटी चंद्रांशु ने मुझसे हाल में पूछा कि मैंने उसे बैडमिंटन खिलाड़ी क्यों नहीं बनाया.'' चंद्रांशु फिलहाल गुड़गांव में रहकर एमबीए कर रही हैं और अपनी मशहूर बहन का स्वागत करने के लिए हैदराबाद आई थीं. हालांकि नेहवाल ही तय करते हैं कि उनकी बेटी का प्रायोजक कौन होगा-फिलहाल डेक्कन क्रॉनिकल ग्रुप के अलावा हर्बालाइफ और योनेक्स हैं-लेकिन वे अब उनके साथ सफर नहीं करते. अपनी बेटी का खेल देखकर रक्तचाप बढ़ने से चिंतित नेहवाल ने फरवरी में ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप के बाद से उनके साथ जाना छोड़ दिया. वे बैडमिंटन से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप भी नहीं करते हैं. यह काम उस व्यक्ति के भरोसे छोड़ दिया गया है जो उसे बेहतर ढंग से जानता है-गोपीचंद.

वरिष्ठ नेहवाल कहते हैं, ''शुरू के दिनों में हमारी भूमिका उसे अभ्यास और प्रतिस्पर्धा स्थल तक ले जाने-लाने तक सीमित थी. लेकिन अब हमने उसके खेल और तंदुरुस्ती की योजना उसके कोच पर छोड़ दी है.'' उन्हें मालूम है कि सायना की संभावनाएं असीमित हैं.

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