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यूपीए के खाद्य सुरक्षा कानून से कितना अलग है मोदी के मुफ्त राशन का ऐलान?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि कोई गरीब भाई-बहन भूखा न सोए, इसके लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को नवंबर तक बढ़ाया जा रहा है. इस पर खाद्य सुरक्षा के हक में आवाज उठाने वाले देश के अर्थशास्त्री और समाज सेवा से जुड़े लोगों का कहना है कि इस योजना के तहत देश की बड़ी आबादी को जोड़ने की जरूरत है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो-PTI) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो-PTI)

  • गरीब कल्याण अन्न योजना का नवंबर तक हुआ विस्तार
  • खाद्य सुरक्षा कानून के तहत दो तिहाई आबादी का प्रावधान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कोई गरीब भाई-बहन भूखा न सोए, इसके लिए 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना' को नवंबर तक बढ़ाने का ऐलान किया. इसके तहत देश में 80 करोड़ लोगों को 5 किलो गेहूं या चावल के साथ 1 किलो चना मुफ्त दिया जाएगा. कोरोना संकट और लॉकडाउन के चलते मोदी सरकार ने 26 मार्च को गरीब परिवारों को राहत देने के लिए इस योजना का ऐलान किया था, जिसके तहत 3 महीने (अप्रैल, मई, जून) का राशन मुफ्त दिया गया. पीएम मोदी ने अब इसे बढ़कर नवंबर महीने तक के लिए कर दिया है.

हालांकि, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) के तहत दो रुपये किलो गेहूं और तीन रुपये किलो चावल प्रति व्यक्ति को पहले की तरह ही 5 किलो देश के 80 करोड़ लोगों को मिलता रहेगा. मोदी के इस फैसले का खाद्य सुरक्षा के हक में आवाज उठाने वाले अर्थशास्त्रियों ने स्वागत किया है, लेकिन साथ ही उनका मानना है कि देश की अच्छी खासी आबादी इस योजना से बाहर है, जिन्हें जोड़ा जाना चाहिए.

बता दें कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार में भोजन के अधिकार के तहत खाद्य सुरक्षा कानून लाया गया था, जो सोनिया गांधी का ड्रीम प्रोजेक्ट कहा गया था. इस तहत देश की दो तिहाई आबादी को 2 रुपये प्रति किले गेहूं या 3 रुपये प्रति किले चावल के हिसाब से हर महीने 5 किलो देने का प्रावधान रखा गया है. मोदी सरकार ने कोरोना काल के चलते खाद्य सुरक्षा कानून के लाभर्थियों को ही प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के जरिए नवंबर तक मुफ्त 5 किलो गेहूं या चावल मुफ्त अतरिक्त दिया जा रहा है. इसके साथ ही सरकार ने एक किलो दाल या फिर चना देने की भी व्यवस्था की है.

इस तरह से मोदी सरकार की मुफ्त अनाज योजना कोरोना संक्रमण काल तक के लिए ही जो फ्री दी जा रही है. वहीं, यूपीए सरकार में शुरू हुई खाद्य सुरक्षा कानून के तहत पहले की तरह जारी रहेगी, जिसके तहत 2 रुपये किले गेंहू या फिर 3 रुपये किले चावल प्रति व्यक्ति पांच किलो मिलता रहेगा.

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भोजन का अधिकार से लेकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की लड़ाई लड़ने वाली अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा कहती हैं कि नेशनल सैंपल सर्वे के हिसाब से औसतन एक व्यक्ति प्रति माह 10 किलो अनाज खाता है. 2013 में खाद्य सुरक्षा कानून बना तो देश के दो तिहाई आबादी को 5 किलो अनाज प्रति माह सरकार के द्वारा देने की व्यवस्था की गई थी. 2011 की जनगणना के लिहाज से 2013 में दो तिहाई आबादी 80 करोड़ थी, जिसे खाद्य सुरक्षा के तहत जोड़ा गया था. मौजूदा समय में देश की दो तिहाई आबादी 90 करोड़ के करीब होती है. इस तरह से देश के 10 करोड़ लोग अभी भी इस योजना से वंचित है. इन्हें जोड़ने की मांग लंबे समय से हो रही है, लेकिन इतनी परेशानी के बाद भी सरकार उन्हें जोड़ने की बात नहीं कह रही है.

रीतिका खेड़ा ने कहा कि देश में एक अच्छी खासी आबादी ऐसी है जो खाद्य सुरक्षा के तहत मिलने वाले आनाज और कुछ छोटे-मोटे काम करके अपना गुजर बसर करती है. लॉकडाउन के चलते काम-धंधा तो पूरी तरह से ठप हो गया और कमाई बंद हो गए हैं. केंद्र सरकार ने गरीब कल्याण अन्न योजना के जरिए खाद्य सुरक्षा कानून के तहत मिलने वाले अनाज को दो गुना कर दिया है. प्रधानमंत्री ने तीन महीने से बढ़कर इसे नवंबर तक के लिए कर दिया है. लॉकडाउन में 8 करोड़ प्रवासी मजदूर जो वापस अपने घरों को लोटे हैं, उन्हें महज दो महीने ही अनाज दिए गए हैं जबकि स्थाई तौर पर उन्हें इससे जोड़ देना चाहिए था. पीएम मोदी ने राष्ट्र के संबोधन में इसका जिक्र तक नहीं किया है कि प्रवासी मजदूरों को इस योजना के तहत अनाज मिलेगा भी या नहीं.

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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लेकर लंबे समय तक संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे कहते हैं कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत सरकार उन्हें ही अनाज दे रही है, जिन्हें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत अनाज मिल रहा है. देश में अनाज पर्याप्त मात्रा में है. देश में अभी 70 मिलियन टन अनाज का भंडार है जबकि साढे़ चार मिलियन टन अनाज ही खाद्य सुरक्षा कानून के तहत वितरित किया जा रहा है. सरकार अगर इसे दोगुना भी कर देती है तो भी 9 मिलियन टन ही अनाज खर्च होगा.

निखिल डे ने कहा कि देश में काफी अनाज है. इस साल भी देश में 45 मिलियन टन अनाज का भंडारण बढ़ा है. इस तरह से अनाज पड़ा-पड़ा सड़ रहा है. इसके बावजूद खाद्य सुरक्षा के तहत लाभार्थी को बढ़ाया नहीं जा रहा है जबकि लंबे समय से सरकार से मांग हो रही है कि इस योजना को यूनिवर्सल स्तर पर किया जाए. कोरोना काल में गांव की बड़ी आबादी परेशान है, जिसे जोड़ा जाना चाहिए. लॉकडाउन में जरूर सरकार अनाज फ्री दे रही है, लेकिन पहले भी 2 रुपये किलो ही अनाज मिलता था. उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि अनाज के साथ कम से कम तीन तरह की दाल और दो तरह के तेल भी देने की जरूरत है, क्योंकि इस समय लोगों के पास कोई काम नहीं है.

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