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संसद में पेश कैग की रिपोर्ट के अनुसार- धान की सरकारी खरीद, मिलिंग में 50,000 करोड़ की अनियमितता

संसद में पेश कैग रिपोर्ट में खामियों को रेखांकित किया गया है.इसमें बिना सत्यापन के किसानों को समर्थन मूल्य के रूप में करीब 18,000 करोड़ रुपये का भुगतान तथा चावल मिलों को अनुचित लाभ दिये जाने की बात शामिल हैं.

धान खरीद पर कैग की रिपोर्ट धान खरीद पर कैग की रिपोर्ट

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक-कैग ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिये सस्ती दर पर बेचे जाने वाले चावल के लिये धान की सरकारी खरीद और मिलिंग (दराई) के काम में 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की कथित अनियमितता की बात कही है. संसद में पेश कैग रिपोर्ट में खामियों को रेखांकित किया गया है.

बिना सत्यापन के भुगतान
इसमें बिना सत्यापन के किसानों को समर्थन मूल्य के रूप में करीब 18,000 करोड़ रुपये का भुगतान तथा चावल मिलों को अनुचित लाभ दिये जाने की बात शामिल हैं. कैग ने अप्रैल 2009 से मार्च 2014 के बीच की अवधि की आडिट के बारे में कहा, इन कमियों के कारण भारत सरकार के खाद्य सब्सिडी खर्च में इजाफा हुआ जिसे टाला जा सकता था.

रिपोर्ट में नौ बड़े मामलों का जिक्र
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने रिपोर्ट में अनियमितता से जुड़े नौ बड़े मामलों का जिक्र किया है जो कुल मिलाकर 40,564.14 करोड़ रुपये की गड़बड़ी के बताता है. इसके अलावा कई छोटे मामलें हैं जिनमें 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की अनियमितताएं पायी गयी हैं. इससे कुल मिलाकर राशि 50,000 करोड़ रुपये से अधिक बनती है.

दराई के लिए मिलों को मिला लाभ
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने कहा कि कीमत में उप-उत्पादों का मूल्य शामिल नहीं कर धान की दराई के लिये 3,743 करोड़ रुपये मूल्य का लाभ मिलों को दिया गया. हालांकि सरकार ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि जो दर का भुगतान किया गया है, उसमें चावल का छिलका और भूसी जैसे उत्पाद के मूल्य शामिल थे.

शुल्क में 2005 से कोई बदलाव नहीं: सरकार
सरकार ने कहा कि दराई की लागत और उप-उत्पादों का मूल्य के अध्ययन और दिसंबर तक नई दर के बारे में सुझाव देने के लिये ट्रैफिक कमीशन से कहा गया था. इसके आधार पर सरकार इाई शुल्क में संशोधन का निर्णय करेगी जिसमें 2005 से कोई बदलाव नहीं हुआ है. कैग ने केंद्रीय पूल के लिये धान की खरीद और मिलिंग शीर्षक से संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है, मिलिंग शुल्क में संशोधन में देरी तथा धान को अपने कब्जे में रखे जाने के मामले में खराब व्यवस्था से न केवल चावल मिलों को बेजा लाभ हुआ बल्कि व्यापक एवं बड़े पैमाने पर उनके द्वारा धान एवं चावल की डिलीवरी नहीं हुई.

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