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Opinion: प्राकृतिक आपदाओं से निबटने की रणनीति

भारत जैसे बड़े देश में प्राकृतिक आपदाएं सामान्य सी बात हैं, हर साल कभी आंधी-तूफान तो कभी भूकंप और कभी बाढ़ के रूप में ये आती हैं और जन-धन पर कहर बरपा कर चली जाती हैं. जब तक देश संभलता है. दूसरी आपदा आकर खड़ी हो जाती है. चाहे इसके कारण कुछ भी हों लेकिन सच्चाई तो यह है कि देश को हर तरह से नुकसान झेलना पड़ता है. अभी हम कश्मीर के महाबाढ़ की बात ही कर रहे थे कि अब दक्षिण भारत में हुदहुद ने हाहाकार मचा दिया.

आंध्र प्रदेश और ओडिशा में हुदहुद ने मचाई तबाही आंध्र प्रदेश और ओडिशा में हुदहुद ने मचाई तबाही

भारत जैसे बड़े देश में प्राकृतिक आपदाएं सामान्य सी बात हैं, हर साल कभी आंधी-तूफान तो कभी भूकंप और कभी बाढ़ के रूप में ये आती हैं और जन-धन पर कहर बरपा कर चली जाती हैं. जब तक देश संभलता है. दूसरी आपदा आकर खड़ी हो जाती है. चाहे इसके कारण कुछ भी हों लेकिन सच्चाई तो यह है कि देश को हर तरह से नुकसान झेलना पड़ता है. अभी हम कश्मीर के महाबाढ़ की बात ही कर रहे थे कि अब दक्षिण भारत में हुदहुद ने हाहाकार मचा दिया.

हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति नष्ट हो गई और दर्जनों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा. तीन राज्यों में इसने जबर्दस्त बर्बादी के आलम दिखाए. नए राज्य आन्ध्र प्रदेश, समुद्री तूफानों की मार झेलते रहने वाला ओडिशा और झारखंड में इसका विकराल रूप दिखा. विशाखापट्टनम शहर जो दक्षिण के बेहतरीन शहरों में था, पूरी तरह से उजड़ गया. वहां बड़े पैमाने पर मकान, बाजार, कल-कारखाने और यहां तक कि हवाई अड्डा भी नष्ट हो गया. वहां का प्रमुख राजमार्ग पानी की जबर्दस्त मार से बह गया. उन्हें फिर से बनने और संवरने में अब न जाने कितने साल लगेंगे. इन पर कितना खर्च आएगा इसका आकलन अभी बाकी है. यह राशि शायद लाखों करोड़ में हो. उधर भारी बारिश से ओडिशा और झारखंड में हजारों करोड़ रुपये की फसलें चौपट हो गईं. वहां किसानों के लिए बहुत संकट की घड़ी है क्योंकि दूरदराज के इलाकों में राहत पहुंच पाएगी या नहीं, यह बड़ा सवाल है. कुल मिलाकर यह बहुत बड़ी विपदा है. अमेरिका में आए समुद्री तूफान कैटरीना की तरह ही इसने भी भारी क्षति पहुंचाई और काफी समय तक इससे हुए नुकसान का आकलन किया जाएगा.

टेक्नोलॉजी ने हमें इन विपदाओं की सही भविष्यवाणी करना एक हद तक सिखा दिया है. अब हम समय रहते जान जाते हैं कि कब बाढ़ या तूफान आ सकता है. इसके अच्छे परिणाम हमने ओडिशा में देखे जब फेलिन नाम के तूफान ने वहां जबर्दस्त तबाही मचाई. लेकिन उस तूफान के आने के पहले लाखों लोगों को सुरक्षित जगहों पर भेज दिया गया जिससे हजारों जानें बच गईं. इस बार उपग्रहों से मिली पल-पल की जानकारी ने हमें सतर्क कर दिया और लाखों जिंदगियां बच गईं. अब हम टेक्नोलॉजी की मदद से लोगों की जानें बचा सकते हैं और उन्हें पहले से आगाह कर सकते हैं. लेकिन बड़ा सवाल है कि आपदा प्रबंधन के मामले में हम कब कुशलता से काम कर सकेंगे. यह आसान तो नहीं है लेकिन असंभव नहीं है. अभी भी इसमें काफी पिछड़े हैं और इस दिशा में काम होना बाकी है.

कितनी क्षति हुई है और उसका क्या निकारण हो, यह जानना बहुत जरूरी है. यह दुरूह कार्य है क्योंकि इस जैसे तूफान से हुए नुकसान का अंदाजा लगाना ही अपने आप में विकट है. इस दिशा में अभी काम होना है. लेकिन अभी युद्ध स्तर पर पीड़ितों को राहत दिलाना पहली वरीयता होनी चाहिए. पीएम मोदी का दौरा इसलिए भी जरूरी था कि सरकारी तंत्र कम से कम चाक चौबंद हो जाए. अब केन्द्र और राज्य सरकारों को राहत देने की एक रणनीति बनानी होगी और उस पर काम करना होगा.

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