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Opinion: मेरठ में स्वाभिमान और सेकुलरिज्म

राजधानी दिल्ली से बहुत नजदीक मेरठ शहर में एक रैली हुई जिसका नाम रखा गया था, स्वाभिमान रैली. यह रैली करवाई राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह ने जो पिछले चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के बाद हाशिये पर थे. अब उन्हें एक मुद्दा मिला है और वह कि अपने 27 साल पहले दिवंगत पिता की याद में उस बेशकीमती बंगले को उनका स्मारक बनवाना, जिसमें वे इतने दिन ठाठ से रहे.

राजधानी दिल्ली से बहुत नजदीक मेरठ शहर में एक रैली हुई जिसका नाम रखा गया था, स्वाभिमान रैली. यह रैली करवाई राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह ने जो पिछले चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के बाद हाशिये पर थे. अब उन्हें एक मुद्दा मिला है और वह कि अपने 27 साल पहले दिवंगत पिता की याद में उस बेशकीमती बंगले को उनका स्मारक बनवाना, जिसमें वे इतने दिन ठाठ से रहे.

सरकार ने उनसे बंगला क्या छीन लिया कि उन्हें पिता की याद सताने लगी और वे सक्रिय हो गए. जाहिर है यह एक ऐसा मौका है जिसका फायदा उठाकर वह राजनीति में फिर से स्थापित हो सकते हैं. इसलिए उन्होंने मेरठ में एक किसान स्वाभिमान रैली करवाई जिसमें बड़ी तादाद में कार्यकर्ता लाए गए. लेकिन उससे भी बड़ी बात यह रही कि भारतीय राजनीति के कई छत्रप भी वहां थे, जो पिछले लोकसभा चुनाव में जख्मी हो गए थे. उनके लिए किसान और सेकुलरिज्म ही फिर से वापसी का रास्ता दिखा सकता है. इनमें लालू यादव, शरद यादव, शिवपाल यादव, नीतीश कुमार और एचडी देवगौड़ा भी थे. देश में किसानों की क्या हालत है, यह सभी जानते हैं.

उत्तर प्रदेश की गन्ना मिलों में किसानों के करोड़ों रुपये आज भी फंसे पड़े हैं. हर साल गन्ना किसानों के पैसे वहां फंस जाते हैं और वे लाचार देखते हैं. बाढ़ से उनकी फसल डूब जाती है और वे पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते हैं. लेकिन ये नेता अब जमा हुए किसानों का भला करने और देश में सेकुलरिज्म लाने के लिए. उनकी बातों और भाषणों से यह बात साफ थी कि देश में वे किसानों की नहीं बल्कि अपने भविष्य की चिंता कर रहे थे, सेकुलरिज्म और किसान स्वाभिमान तो महज एक बहाना था. इतने सालों तक तो किसी ने किसानों की सुध नहीं ली, अब उन्हें किसानों की चिंता सता रही है. बड़े-बड़े बंगलों में रहने और लंबी कारों में दौड़ने वाले ये नेता अब किसानों की बातें करते हैं तो एक मजाक सा लगता है. कोई उनसे पूछे तो उन्होंने पिछले पांच वर्षों में किसानों के लिए क्या किया है?

सेकुलरिज्म का दांव अब इस देश में नहीं चलता. छद्म धर्मनिरपेक्षता ने इस देश को ज्यादा बांटा है. सेकुलरिज्म के नाम पर वोट की रोटियां सेंकने वालों ने यहां दोनों समुदायों के सहज रिश्तों में दरार पैदा की है. अब लगता है कि यह खेल फिर खेला जाएगा. लेकिन देश के युवा को अपने भविष्य की चिंता है और उसे रोजगार चाहिए न कि सत्ता में आने के लिए बेचैन नेताओं के खोखले नारे. अब युवा ही तय करेगा कि यह देश कहां जाएगा और किस रफ्तार से.

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