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मोदी के खिलाफ महागठबंधन के नारे में कितना दम? ये हैं राह के 5 बड़े रोड़े

बिहार के सीएम और जेडीयू चीफ नीतीश कुमार ने कहा- विपक्ष को हर हाल में एकजुट होना पड़ेगा. इस बयान के बाद फिर से महागठबंधन के लिए आवाज बुलंद होने लगी है लेकिन महागठबंधन की राह में इतने रोड़े हैं की इसका चक्का बनने से पहले ही जाम लगने लगा है. महागठबंधन की राह के ये हैं 5 बड़े रोड़े-

2019 की सियासी जंग के लिए फिट होने लगी गोटियां 2019 की सियासी जंग के लिए फिट होने लगी गोटियां

2014 के आम चुनाव से शुरू हुआ बीजेपी और मोदी का विजयी अभियान यूपी के 2017 के विधानसभा चुनावों में भी जारी रहा. लोकसभा और विधानसभा के चुनावों यहां तक कि इस दौरान हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में भी बीजेपी ने परचम लहराकर साबित कर दिया कि 2019 की जंग में मोदी लहर को चुनौती देने के लिए बड़ी ताकत को जन्म लेना होगा. यूपी की हार के बाद विपक्षी दलों में एक बार फिर बिहार की तरह महागठबंधन की मांग उठ रही है. सोमवार को बिहार के सीएम और जेडीयू चीफ नीतीश कुमार ने कहा- विपक्ष को हर हाल में एकजुट होना पड़ेगा. इस बयान के बाद फिर से महागठबंधन के लिए आवाज बुलंद होने लगी है लेकिन महागठबंधन की राह में इतने रोड़े हैं की इसका चक्का बनने से पहले ही जाम लगने लगा है. महागठबंधन की राह के ये हैं 5 बड़े रोड़े-

1. महागठबंधन का नेता कौन?
यूपी चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत के तुरंत बाद महागठबंधन बनाने को लेकर कांग्रेस और जेडीयू के बयान आए थे. लेकिन साथ ही नेता कौन होगा इसपर भी बयानबाजी शुरू हो गई. कांग्रेस ने कहा कि राहुल गांधी के अलावा और कोई नेता नहीं हो सकता तो जेडीयू ने कहा कि मोदी को सिर्फ नीतीश ही टक्कर दे सकते हैं. अब नीतीश का बयान आया है कि अगर यूपी में कांग्रेस-बसपा और सपा मिलकर लड़े होते तो बीजेपी से 10 प्रतिशत ज्यादा वोट पाते. बिहार में बीजेपी इसलिए हारी क्योंकि यहां विपक्ष एकजुट था. अब यही एकजुटता पूरे देश में दिखानी होगी. तभी बेड़ा पार होगा. लेकिन यहां सवाल ये है कि मोदी के खिलाफ एक नेता पर क्या राय बनेगी. राहुल गांधी, नीतीश, मुलायम, ममता, लालू, मायावती, नवीण पटनायक में पीएम फेस को लेकर किस हद तक सहमति बन पाएगी इसपर सबकी निगाहें रहेंगी.

2. क्षत्रपों का सीमित जनाधार
महागठबंधन को लेकर बयान देना तो ठीक लेकिन तमाम विपक्षी दलों में ऐसा कोई नेता नहीं दिखता जिसका एक से ज्यादा राज्यों में असर हो. मुलायम सिंह या अखिलेश का प्रभाव सिर्फ यूपी में हो सकता है. मायावती यूपी से ही साफ हैं बाकी राज्यों में असर पर संदेह ही है. लालू की पार्टी ने नीतीश लहर के बूते जैसे-तैसे सत्ता में वापसी की है. नीतीश कुमार की पार्टी का बिहार के बाहर प्रभाव नहीं दिखता. बिहार विधानसभा में भी जेडीयू दूसरे नंबर पर है. पीएम पद की नीतीश की महत्वाकांक्षा को सहयोगी आरजेडी से कितना समर्थन मिलेगा इसपर भी संदेह है. ममता बनर्जी का बंगाल में अच्छा प्रभाव है लेकिन बाकी राज्यों के क्षेत्रीय दल उनके नेतृत्व को कितना मानेंगे. कांग्रेस का प्रभाव पूरे देश में माना जा सकता है लेकिन 2014 से अबतक कांग्रेस का ग्राफ गिरता ही गया है और इसे लेकर राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर पार्टी के अंदर ही सवाल उठने शुरू हो गए हैं.

3. राज्यों में आपस में भिड़ीं पार्टियों का क्या होगा?
मोदी विरोध तो ठीक लेकिन विपक्षी दलों के आपसी समीकरणों का क्या? बंगाल में कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस-लेफ्ट किस हद तक साथ आएंगे. साउथ में क्या डीएमके-एआईएडीएमके साथ आएंगे? बिहार में सपा-बसपा-कांग्रेस-आरएलडी क्या साथ आ सकेंगे. जैसे तमाम सवाल हैं जो मोदी लहर के खिलाफ विपक्षी एकजुटता पर सवाल खड़े करते हैं.

4. मोदी विरोध के अलावा फैक्टर क्या होंगे?
महागठबंधन का कॉन्सेप्ट तो ठीक है लेकिन क्या ये महागठजोड़ सिर्फ मोदी फैक्टर के खिलाफ जनता के बीच जाएगा. ऐसे वक्त में जब हर चुनाव में मोदी नाम से बीजेपी जीत रही है ऐसे में सिर्फ मोदी की आक्रामक नीति की खिलाफत कितना वोट दिला पाएगी ये भी बड़ा सवाल होगा. इस फैक्टर पर खुद कांग्रेस को ही संदेह है. यूपी चुनाव के बाद कांग्रेस की अंदरूनी रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि हिंदुत्व के खिलाफ पार्टी की छवि और सिर्फ मोदी विरोधी दिखने के कारण पार्टी को हाल के चुनाव में नुकसान हुआ है. खुद राहुल गांधी पार्टी की रणनीति को नए सिरे से आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

5. जमीनी स्तर पर गठबंधन का कैसे तय होगा समीकरण?
महागठबंधन के नाम पर अगर ये दो दर्जन से ज्यादा पार्टियां एक हो भी जाती हैं तो इनके कार्यकर्ता कितने साथ आएंगे ये फैक्टर भी अहम होगा. यूपी में सपा-कांग्रेस ने मिलकर चुनाव तो लड़ा लेकिन कई सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवार मैदान में उतर गए. चुनाव में हार के तुरंत बाद कई उम्मीदवारों ने एक-दूसरे की पार्टियों पर भितरघात की आरोप लगाना शुरू कर दिया. ऐसा हाल ही अन्य राज्यों में भी होगा.

बिहार और फिर यूपी के अनुभवों के बाद बीजेपी भी जानती है कि मोदी लहर को रोकने के लिए विपक्षी दल कोई भी समझौता करने को तैयार हो सकते हैं इसलिए शाह-मोदी की जोड़ी अब नई रणनीति पर काम कर रही है. 2014 के चुनाव में बीजेपी ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया था. लेकिन अब और आगे की रणनीति है. बीजेपी ने 160 ऐसी सीटों की पहचान की है जहां पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा था. इन सीटों के लिए अलग से रणनीति बनाई जा रही है. नए राज्यों पर फोकस किया जा रहा है. जैसे- पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पूर्वोत्तर के राज्य. अब बीजेपी इन राज्यों की सीटों को जीतने की योजना पर काम कर रही है.

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