कुंभ पर आयोजित इंडिया टुडे के गोलमेज सम्मेलन के चौथे सेशन में कुंभ में महिला संन्यासी और साधुओं पर चर्चा हुई. इस चर्चा में लखनऊ के मनकामेश्वर मंदिर की महंत देव्यागिरी ने शिरकत की. इस दौरान उन्होंने बतौर महिला संन्यासी अपना अनुभव साझा किया, साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि कैसे उन्हें दीक्षा मिली. दरअसल हिंदू धर्म में जब हम संतों और अखाड़ों की बात करते हैं तो हमें दिखाई देता है कि इसमें पुरूषों की ज्यादा भागीदारी होती है. महिला संन्यासी का काम क्या होता और वह क्या काम करती हैं यह कम ही लोग जानते हैं. महंत देव्यागिरी ने बताया कि संत के नाम पर जूना अखाड़े में स्त्री और पुरूष का भेद खत्म हो होता है. जब हम साधू, संन्यासी या संत बोल रहे होते हैं तो वो अपने आप में भेद तोड़ रहा होता है. वो न स्त्री में रह जाता है न ही पुरूष में रह जाता है. कहने का मतलब यह है कि उसको दोनों कार्य करने होते हैं.
उन्होंने कहा कि अखाड़ों की जो उत्पत्ति है वो 1780 के आसपास की है. 13 अखाड़ों में जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है. और जैसे वह बड़ा है उसकी सोच भी बड़ी है. उन्होंने कहा कि 2003-04 के बीच उज्जैन कुंभ के दौरान मेरी दीक्षा हुई थी. उस दीक्षा के बाद पूर्ण संन्यासी माना जाता है.
उन्होंने कहा कि एक आम सभा से निकलकर कोई जाता है तो एक स्त्री के शरीर को लेकर उसकी जो समझ और झिझक होती है वह दीक्षा होने के बाद टूट जाती है. सबके सामने समूह में हम लोगों को दो कपड़े दिए जाते हैं. 24 घंटे एक मंत्र का जाप होता है. उसको करना होता है. उसके बाद रात्रि में 1-2 बजे के बीच स्नान कराया जाता है. स्नान के बाद सिर्फ दो कपड़े दिए जाते हैं.
महंत देव्यागिरी ने कहा कि 100 से 120 लोगों की साथ में दीक्षा होती है. लेकिन जो चीज मुझे वहां महसूस हुई वो यह रही कि यहां पर आकर शर्म खत्म हो गई. यानी कि आप निर्भीक होकर समाज के अंदर काम कर पाएंगे. यह भावना आपके अंदर तुरंत आ जाती है. यहां आकर यह मालूम पड़ जाता है कि कोई कार्य छोटा यह बड़ा नहीं है. जब हम जूना अखाड़े की बात करते हैं तो यहां पर एक समानता दिखती है.
उन्होंने कहा कि जो भारतीयता का विचार है वो समान रूप से है. वो साथ में कंधे से कंधे मिलाकर चलने का है. स्त्री को सहयोग चाहिए होता है और सहयोग के रूप में पुरूषों का साथ चाहिए होता है. यह समानता जूना अखाड़े में दिखने को मिलती है.