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देशी एलोवेरा से बनाए इको फ्रेंडली, सस्ते, टिकाऊ और बैटरी सेल

एलोवेरा से पोटेंशियल मिलने के बाद हमने कॉपर और जिंक जो कि ईको फ्रेंडली मेटल है, उनका उपयोग करके बैटरी बनाई जोकि हमारी दिनचर्या के उपकरण जैसे टीवी रिमोट, फ़्लैश लाइट खिलौने आदि को पावर देती है.

राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित स्टूडेंट्स स्टार्टअप एक्सपोजर प्रोग्राम राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित स्टूडेंट्स स्टार्टअप एक्सपोजर प्रोग्राम

  • 30 टन के एलोवेरा से बनाई जा सकती हैं 7 लाख 20 हजार बैटरी
  • ये बैटरी ईको फ्रेंडली, जमीन के लिए भी साबित होगी अच्छी

एलोवेरा को हिंदी में घृतकुमारी कहते हैं, जिनका उपयोग अभी तक हर्बल प्रोडक्ट्स के तौर पर होता आया है. लेकिन क्या कभी आपने एलोवेरा का उपयोग बैटरी सेल में सुना है. सुनने में अजीब लगेगा लेकिन लखनऊ की रहने वाली निमिषा वर्मा ने ये काम कर दिखाया है. उन्होंने एक ऐसी बैटरी बनाई है जिसके अंदर एलोवेरा जेल मौजूद है. ये बैटरी iso 9001:2015 और Iso 14001:2015 सर्टिफाइड हैं.

कौन हैं निमिषा वर्मा ?

निमिषा की बारहवीं तक पढ़ाई सेंट फिएडल कॉलेज लखनऊ से हुई. उसके बाद जेई मेंस में उनका सेलेक्शन हुआ और राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया. कंप्यूटर साइंस से बीटेक की पढ़ाई करते हुए निमिषा ने स्टार्टअप में रुचि दिखाई.

एलोवेरा क्यों है खास?

एलोवेरा को खास तौर पर अभी तक ब्यूटी प्रॉडक्ट्स या हर्बल दवाइयों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है वहीं इसका उपयोग औषधि के रूप में भी किया जाता रहा है. इसका जेल पेट और सिर के बालों के लिए बड़ा उपयोगी होता है. यही नहीं रक्तचाप से लेकर मधुमेह तक इन सभी आयुवेर्दिक औषधियों में इसका इस्तेमाल किया जाता है.

ऐसे की स्टार्टअप की शुरुआत

निमिषा का कहना है कि वर्ष 2017 में हालात को देखते हुए वेस्ट मैनेजमेंट पर स्टार्टअप करने की सोची. उनका कहना है कि भारत का गाजीपुर लैंड फिल साइट 6.2 करोड़ मीट्रिक टन वेस्ट पैदा करता है जो बहुत बड़ी समस्या है. निमिषा ने इस वेस्ट को कम करने की सोची और फिर इसपर रिसर्च करने लगीं और शोध के बाद पता चला कि भारत में इस वेस्ट मटेरियल का 78.5 परसेंट ई-वेस्ट है जिसमें 82 परसेंट बैटरी हैं.

निमिषा ने आगे बताया, 'आगे और रिसर्च करने पर पता चला कि यह बैटरी इंसान और पर्यावरण, दोनों के लिए ही घातक है. साथ ही इन बैटरीज को बनाने का सामान 148 बिलियन डॉलर का आता है जो भारत की इकोनॉमी को हानि पहुंचाता है.

बैटरीज नष्ट करने में होती है मुश्किल

इन बैटरीज को बिना किसी सही डिस्पोजल के ऐसे ही फेंक दिया जाता है. जब इनमें 20 से 30 परसेंट एनर्जी बची होती है और लोग इन्हें डिस्पोज नहीं कर पाते हैं इसीलिए वो इन्हें कूड़ेदान में फेंक देते है. कभी कभी ये बैटरीज लैंडफिल में फेंक दी जाती हैं जिससे कई बार इनमें ब्लास्ट भी हो जाता है. इन बैटरीज से जल, वायु और भूमि प्रदूषण होता है और बीमारियां होती हैं. इन्हीं बैटरियों द्वारा क्रोनिक किडनी की बीमारी, लिवर सिरोसिस की बीमारी बढ़ती जा रही है.

निमिषा बताती है, 'इन सब चीजों को देखते हुए हमने ईको फ्रेंडली बैटरियां बनाने की सोची. जिसके चलते हमने पहले नींबू, आलू, बैंगन आदि से बैटरी बनाई परन्तु अधिक पतला होने के कारण यह अधिक देर तक काम नहीं कर रही थी. फिर हमने अन्य पेड़ों पर रिसर्च की जैसे चावल, पपीते का पेड़, केले का पेड़ फिर हम एलोवेरा पर पहुंचे.

एलोवेरा से पोटेंशियल मिलने के बाद हमने कॉपर और जिंक जो कि ईको फ्रेंडली मेटल है, उनका उपयोग करके बैटरी बनाई जोकि हमारी दिनचर्या के उपकरण जैसे टीवी रिमोट, फ़्लैश लाइट खिलौने आदि को पॉवर देती है.

बैटरी बनाने की क्या है विधि

पहले पेड़ से एलोवेरा को तोड़ कर धो लिया जाता है, फिर इसका रस निकाल कर पतला करते है, फिर इसमें बराबर मात्रा में नींबू का रस आदि मिलाकर कॉपर और जिंक के साथ बंद करके बैटरी बनाते हैं. उसके बाद इसको कवर करके अलोए-ई सेल का टैग लगाकर हम इसे लीक प्रूफ बनाकर बैटरी को पूर्ण रूप देते हैं. ज़्यादा पैसे ना होने के कारण हम इस कार्य को हाथों से ही संपन्न करते हैं, इसीलिए एक बैटरी को बनाने में बीस से पच्चीस मिनट का समय लग जाता है.

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अगर बैटरी मशीनों द्वारा बनाई जाए तो समय में 98% की बचत होगी. निमिषा ने एलोवेरा से बैटरी बनाने के फायदे के बारे में बताया कि एलोवेरा बैटरी बनाने का अब तक का सबसे सस्ता रॉ मटेरियल है और एलोवेरा को कहीं पर भी उगाया जा सकता है.

30 टन एलोवेरा से हम 7 लाख 20 हजार बैटरी बना सकते हैं. इन बैटरियों को डिस्पोज करना बहुत आसान है क्योंकि इनमें इस्तेमाल होने वाले पदार्थ पूर्ण रूप से ईको फ्रेंडली है और भूमि के लिए भी अच्छे हैं.

प्रदूषण को 76.1%  तक कि कमी

इन बैटरियों के इस्तेमाल से भारत की आर्थिक स्थिति को 78% तक सुधारा जा सकता है क्योंकि एलोवेरा का इस्तेमाल करके हम 109 बिलियन डॉलर बचा सकते हैं. इससे किसानों को रोजगार भी मिलेगा जिससे दो एकड़ जमीन से वो एक लाख रुपए से ज़्यादा प्रति फसल कमा सकते हैं. अगर पर्यावरण की बात करें तो हम प्रदूषण को 76.1% तक कम कर सकते हैं और इनसे होने वाली बीमारियों को 97% तक कम कर सकते हैं.

मोबाइल बैटरी में लिथियम ऑयन का प्रयोग होता है, अगर एलोवेरा का इस्तेमाल किया जाए तो 70% तक हम लिथियम ऑयन का हम मोबाइल बैटरियों में कम कर सकते हैं और खतरों से भी बच सकते हैं. एलोवेरा से बनी बैटरियां सौ प्रतिशत ईको फ्रेंडली 0% खतरनाक और 0% विस्फोटक है. ये अभी इस्तेमाल होने वाली बैटरियों से सस्ती और दोगुना चलने वाली हैं.

डेमोंस्ट्रेशन के तौर पर निमिषा ने आजतक की टीम को अलार्म क्लॉक से एक नामी कंपनी की बैटरी निकाल कर खुद की एलोवेरा से बनाई हुई बैटरी दिखाया. वो घड़ी पूरी तरह काम कर रही थी.

स्टूडेंट्स स्टार्टअप एक्सपोजर प्रोग्राम में ले चुकी हैं भाग

निमिषा बताती है कि वो सौ विद्यार्थियों में से एक थी जिन्हें पिछले वर्ष 2018 में राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित स्टूडेंट्स स्टार्टअप एक्सपोजर प्रोग्राम  के अन्तर्गत यूएसए भेजा गया.  जहां निमिषा को गूगल, इंटेल, एप्पल, नासा हेडक्वार्टर (NASA) स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और ड्रापर यूनिवर्सिटी आदि में इस विचार को प्रस्तुत कर लोगों से परामर्श किया फिर उसके बाद इसके प्रोटो-टाइप को दुबई में स्टेप कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत किया.

अलोए ई-सेल की वजह से ग्लोबल इंटेपरेनुरशिप, बूटकैम्प थाईलैंड और ग्रीन एनर्जी कांग्रेस स्पेन में राष्ट्रीय विजेता भी रही हैं. वहीं क्लाइमेट लॉन्चपैड 2019 में क्षेत्रीय विजेता भी रहीं. उनकी जीत का सिलसिला यहीं नहीं रुका. अभी हाल ही में अक्टूबर में हुई गो ग्रीन इन दि सिटी प्रतियोगिता जोकि स्पेन के बार्सेलोना शहर में हुई थी. उसमें भी हम अंतरराष्ट्रीय विजेता बने. हमारी प्रगति को देखते हुए यूएस एम्बेसी ने हमें इनक्यूबेट करने का निर्णय लिया है.

आने वाले समय में हम वातावरण को दूषित करने वाली और हमारी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने वाली विस्फोटक एवं खतरनाक बैटरियों को बदलकर सबके लिए लाभदायक और 100% ईको फ्रेंडली बैटरी इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे हम 90% तक प्रदूषण और लैंड फिल कम कर सकते हैं. फिलहाल निमिषा स्टार्टअप इंडिया में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं.

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