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खानाखराबः मुलायम सिंह के हसीन सपनों का लोटा, टिकेगा नहीं ये तो लुढ़केगा ही

क्या आप जानते हैं कि सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं गाड़ी चलाते वक़्त मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल से नहीं होतीं, बल्कि डे ड्रीमिंग यानी जागते हुए सपने देखने से होती है. दिवास्वप्न से बहुतों का दिवालिया निकल जाता है. मुलायम सिंह यादव फिर से मुलायम सपने देखने लगे हैं. तीसरे मोर्चे के कांधे पर चढ़ प्रधानमंत्री बनने के हसीन सपने. सीज़न चेंज बहुत सारे पुराने दर्द वापस ले आता है. जैसे-जैसे देश का राजनीतिक मौसम बदल रहा है, पुरानी टीस और खीस दोनों उभर रहे हैं.

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कितने कड़क हैं मुलायम के दावे
कितने कड़क हैं मुलायम के दावे

क्या आप जानते हैं कि सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं गाड़ी चलाते वक़्त मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल से नहीं होतीं, बल्कि डे ड्रीमिंग यानी जागते हुए सपने देखने से होती है. दिवास्वप्न से बहुतों का दिवालिया निकल जाता है. मुलायम सिंह यादव फिर से मुलायम सपने देखने लगे हैं. तीसरे मोर्चे के कांधे पर चढ़ प्रधानमंत्री बनने के हसीन सपने. सीज़न चेंज बहुत सारे पुराने दर्द वापस ले आता है. जैसे-जैसे देश का राजनीतिक मौसम बदल रहा है, पुरानी टीस और खीस दोनों उभर रहे हैं.

लोकतंत्र अंको का खेल है. अंकों के खेल में भी एक खेल है. हमारी मूल भाषा संस्कृत में तीन वचन हैं. एकवचन, द्विवचन और बहुवचन. एक, दो और तीन नहीं, बल्कि एक, दो और अनेक. अंग्रेजी में भी कहते हैं टू इज़ कम्पनी, थ्री इज़ क्राउड. दो से ज्यादा भीड़ है. तीन हो जाना और बहुत हो जाने में बहुत फर्क नहीं है. हमारे यहां त्रिमूर्ति हैं, पश्चिम में होली ट्रिनिटी है. गांधीजी के तीन बन्दर थे. क्योंकि तीन बहुवचन है.


तीसरे मोर्चे में वचन बहुत हैं, और बच्चन भी. सबके अपने सपने हैं. मुलायम को लगता है इस बार उनका नम्बर आएगा, जब खिचड़ी पकेगी तो सबसे ज्यादा एमपी उनकी जेब में होंगे. ऐसा लगना बुरा नहीं है और राजनीति में महत्वाकांक्षा का अपना महत्व है. पर दो में चुनना आसान है, तीन होते ही सब कुछ तीस हो जाता है. इस देश ने तीसरे का अनुभव किया है, कुनबे जुड़े हैं, टूटे हैं, विश्वास भी टूटा है.

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इस बार वामपंथी कमज़ोर हैं. ममता बेलाग है. जया मोदी की मित्र हैं पर उनकी प्रोफाइल पर स्टेटस अभी भी सिंगल है. चंद्रबाबू नायडू ने आई डू नहीं बोला है, बस मोदी की तरफ हाथ बढ़ाया है. अगर नीतीश ने हाथ से हाथ मिलाया तो लालू का साथ मिल सकता है. अगर अगर ऐसा नहीं हुआ तो नीतीश भी खड़े हैं समर्थन के बाज़ार में. ऐसे में इन सब का तीसरा हो जाना बड़ी संभावना है. मुलायम पिछले कई सालों से कांग्रेस की सरकार का हाथ बनते रहे हैं पर अब नया मोर्चा खोलकर हाथ आजमाना चाहते हैं. अगर हाथ ऊपर रहा तो हाथ के साथ, नहीं तो हाथ के साथ से मोर्चे का तम्बू लगा लेंगे.

मोदी हों या न हों, भाजपा कइयों के लिए विकल्प नहीं है. चुनाव के बाद कांग्रेस का समर्थन करने में इन्हें कोई संकोच नहीं है. पर कांग्रेस इस बार कमज़ोर है और उनको यह जोर है कि भाजपा को अलग रखने के लिए कांग्रेस इनको पीछे से मदद देगी, जैसे इन्होंने कांग्रेस को पीछे से मदद मुहैया कराई है. जब मौसम इतना अनुकूल हो तो रोमांटिक होना लाजिमी है.

पर जनता क्या चाहती है? सब का कहना है कि ध्रुवीकरण हो रहा है. मोदी इसके एक ध्रुव हैं, और राहुल दूसरे. तीसरा तो ध्रुव होता नहीं. ध्रुव का मतलब है निश्चित. जनता को तो किसी न किसी ध्रुव की तरफ जाना है, क्योंकि जो अध्रुव है उसका नष्ट होना निश्चित है. संस्कृत का एक श्लोक है:

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यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते,

ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति, अध्रुवाणि नष्टमेव हि!

जो ध्रुव को छोड़ अध्रुव की ओर जाता है, उसका ध्रुव नष्ट हो जाता है, अध्रुव तो नष्ट है ही. तीसरे मोर्चा स्वयं किसी ध्रुव की तरफ ही जाता है. मुलायम यूपीए को बाहर से समर्थन देते रहे हैं, नायडू ने एनडीए को बाहर से समर्थन दिया था. जनता ने तो यही देखा है, कि लुढ़कना लोटे का चरित्र है. लिफ़ाफ़े भर की देर है. परिणाम आएंगे और अगर संतोषजनक नहीं रहे तो लिफाफों पर नाम आएंगे. ये भी किसी ध्रुव के काम आएंगे. अभी तो सिर्फ मुलायम सपने आ रहे हैं, वक़्त आएगा तो अकड़ निकल जाएगी और मुलायम हो जाएंगे.

 

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