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राजस्थान: कांग्रेस के 7 CM कैंडिडेट, कई जातियों को एक साथ साधने की कवायद

राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस वापसी के लिए नई सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले के तहत अशोक गहलोत ने सीएम पद के लिए सात नाम को आगे बढ़ाया है.

रमेश्वर डूडी, राहुल गांधी, सचिन पायलट, अशोक गहलोत (फोटो-twitter) रमेश्वर डूडी, राहुल गांधी, सचिन पायलट, अशोक गहलोत (फोटो-twitter)

राजस्थान विधानसभा चुनाव की सियासी बाजी जीतने के लिए कांग्रेस हरसंभव कोशिश में जुटी है. कांग्रेस ने प्रदेश में किसी भी चेहरे को सीएम उम्मीदवार नहीं बनाया है. हालांकि सचिन पायलट और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नाम को लेकर चर्चाएं चल रही हैं, लेकिन गहलोत ने अपने और पायलट के अलावा भी सीएम पद के लिए पांच नए नाम को गिनाया है.

कांग्रेस की नई सोशल इंजीनियरिंग

दरअसल अशोक गहलोत से जब यह पूछा गया कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा, तब उन्होंने कहा कि पहले तो दो ही दावेदार थे, अब पांच हो गए हैं. रघु शर्मा, सीपी जोशी, गिरिजा व्यास, लालचंद कटारिया, रामेश्वर डूडी भी मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में है.

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कुछ भी ऐसे ही नहीं बोला करते जिसके पीछे कोई मकसद न हो. कांग्रेस के इस दांव के पीछे सूबे की जातीय और राजनीतिक साधने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. गहलोत ने ओबीसी से लेकर ब्राह्मण, जाट और गुर्जर समुदाय को सीएम बनाने की ख्वाब दिखाकर नई सोशल इंजीनियरिंग बनाने की कवायद की है.

गहलोत साध रहे ओबीसी

राजस्थान में कांग्रेस से सबसे प्रमुख नेता के तौर अशोक गहलोत का नाम आता है. गहलोत माली समाज से आते हैं, लेकिन प्रदेश में ओबीसी के सबसे बड़े चेहरे माने जाते हैं. प्रदेश में सबसे बडी आबादी ओबीसी समुदाय की है, जबकि माली समुदाय का वोट महज 4 फीसदी है. कांग्रेस गहलोत के जरिए ओबीसी मतदाताओं को साधने की रणनीति बना रही है.

पायलट के जरिए गुर्जर मतों पर नजर

राजस्थान में गुर्जर समुदाय की आबादी करीब 6 फीसदी है और प्रदेश की 30 से 40 सीटों पर असर रखते हैं. पिछले चुनाव में गुर्जर जाति से 13 विधायक जीते थे. गुर्जर समुदाय को बीजेपी का मूल वोट बैंक माना जाता है, लेकिन कांग्रेस ने सचिन पायलट के जरिए इस वोट को साधने की रणनीति बनाई है. यही वजह है कि गुर्जरों का वोट उपचुनाव में कांग्रेस और बीजेपी में आधा-आधा बंट रहा है.

डूडी-कटारिया के जिम्मे जाट वोटर्स

राजस्थान की सियासत में जाट समुदाय किंगमेकर माने जाते हैं. कांग्रेस ने रमेश्वर डूडी और लालचंद्र कटारिया के नाम को आगे बढ़ाकर जाट मतों को साधने की रणनीति बनाई है. प्रदेश में करीब 12 फीसदी जाट समुदाय के मतदाता हैं.

जाट वोटर 50 से 60 विधानसभा सीटों पर असर डालते हैं. शेखावटी इलाका जाट बहुल माना जाता है. जाट समाज के दबदबे का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि हर चुनाव में कम से कम 10 से 15 फीसदी विधायक जाट ही होते हैं. पिछले दोनों चुनावों में 31 से ज्यादा जाट विधायक रहे हैं. कांग्रेस ने सबसे ज्यादा जाट उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.

कांग्रेस के पास तीन ब्राह्मण चेहरे

राजस्थान में कांग्रेस के पास ब्राह्मण चेहरे के तौर पर सीपी जोशी, गिरजा व्यास और रघु शर्मा का नाम आता है. प्रदेश में 8 फीसदी वोट ब्राह्मण मतदाता हैं. प्रदेश की करीब 30 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण वोटर निर्णयक भूमिका में है. यही वजह है कि कांग्रेस ने राजस्थान के प्रभारी से लेकर  कांग्रेस के चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष भी ब्राह्मण समुदाय के हैं.

इसके अलावा मीणा समुदाय कांग्रेस का परंपरागत वोटर माना जाता है. प्रदेश में करीब 14 फीसदी दलित मतों में 8 फीसदी मीणा समुदाय के लोग हैं. इसके अलावा बीजेपी के परंपरागत वोटर माने जाने वाले राजपूत मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से नाराज माने जा रहे हैं. कांग्रेस ने मानवेंद्र सिंह को अपने साथ लाकर बड़ा राजपूत दांव चला है.

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