राजस्थान के टोंक जिले की मालपुरा विधानसभा सीट पर बीजेपी का कब्जा है. जबकि एक दौर में कांग्रेस की यह परंपरागत सीट रही है. राजस्थान के 'व्यास परिवार' का मालपुरा की सीट पर दबदबा रहा है, लेकिन परिसीमन के बाद सियासी समीकरण ऐसे बदले की व्यास परिवार के हाथों से ये सीट निकल गई और जाट समुदाय की सियासत हावी हो गई.
कल्याणजी का मंदिर
मालपुरा विधानसभा की सबसे बड़ी पहचान डिग्गी कल्याणजी का मंदिर हैं, यहां सालभर श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है. श्रावण मास में यहां लगने वाले लक्खी मेला में आस्था का सैलाब देखते बनता है. मेले के दिनों में यहां लगभग 5 लाख से अधिक श्रद्धालु मंदिर में नाचते-गाते पहुंचते हैं. कई भक्त यहां पर कनक दंडवत करते हुए या फिर नंगे पांव पहुंचते हैं.
2013 के नतीजे
बीजेपी के कन्हैयालाल चौधरी को 76799 को वोट मिले
कांग्रेस के रामविलास चौधरी को 36578 को वोट मिले
2008 के नतीजे
निर्दलीय तौर पर रणवीर पहलवान को 31365 को वोट मिले
कांग्रेस के डॉ. चंद्रभान को 27552 वोट मिले
2003 के नतीजे
बीजेपी के जीतराम को 45876 वोट मिले
कांग्रेस के सुरेंद्र व्यास को 35046 वोट मिले
मालपुरा का सियासी इतिहास
देश की आजादी के बाद राजस्थान में हुए 1951 के पहले चुनाव में मालपुरा सीट से दामोदर व्यास ने चुनाव कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर जीतकर विधायक बने. इसके बाद 1957 में दामोदर व्यास दोबारा से निर्विरोध विधायक बने. मालपुरा सीट से निर्विरोध चुनाव जीतने का यह पहला और आखिरी मौका था, लेकिन अगले ही चुनाव 1962 में स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार जयसिंह ने दामोदर व्यास को चुनाव हरा दिया. हालांकि इसके बाद 1967 में हुए चुनाव में व्यास ने जीतकर वापसी की.
1972 में विधानसभा चुनाव में मालपुरा से दामोदर व्यास के पुत्र सुरेंद्र व्यास कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए. हालांकि 1977 में जनता पार्टी के नारायण सिंह से वो हार गए. जनता पार्टी के टूट जाने का 1980 में कांग्रेसी के सुरेंद्र व्यास को फायदा मिला और वो दोबारा से विधायक बने.
हालांकि 1985 में जनता पार्टी ने दोबारा वापसी. इसके 1990 में कांग्रेस से सुरेंद्र व्यास फिर जीत हासिल की थी. इसके बाद 1993 के चुनाव में जीतराम चौधरी विधायक बने. कांग्रेस ने 1998 में सुरेंद्र व्यास की जगह सरोज गुर्जर को चुनाव मैदान में उतारा. ऐसे में नाराज सुरेंद्र व्यास ने निर्दलीय रूप में उतर जीत हासिल की.
मालपुरा का जातीय समीकरण
मालपुरा के गांवों में जाट, गुर्जर और दलित जातियों का दबदबा है. दलित 50 हजार, जाट 42 हजार, गुर्जर 30 हजार, सैनी 20 हजार, मुस्लिम 18 हजार, राजपूत 15 हजार, ब्राह्मण 15, वैश्य 10 हजार इसके अलावा करीब 35 हजार अन्य समुदाय का वोट है.