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'वंश' दिलाएगा वोट, राजस्थान में बेटा-बेटी के सहारे हैं बीजेपी-कांग्रेस

भले ही कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में नेता पुत्र व पुत्रियों को बीजेपी से कम टिकट दिया हो, लेकिन राजस्थान में पार्टी इस मामले में बीजेपी से काफी आगे है.

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सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो: पीटीआई)
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो: पीटीआई)

राजस्थान के चुनावी समर में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों ने राजनीतिक परिवारों के वंशजों पर दांव खेला है. सचिन पायलट और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को छोड़कर दोनों दलों ने कुल 26 ऐसे उम्मीदवार खड़े किए हैं, जिनके परिवार की कोई न कोई राजनीतिक विरासत रही है. कांग्रेस ने 18 और बीजेपी ने 8 ऐसे उम्मीदवारों को टिकट थमाया है, लिहाजा कहा जा सकता है कि कांग्रेस इस मामले में बीजेपी से कहीं आगे है.

कांग्रेस ने भंवरी देवी हत्याकांड में सजा काट रहे पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा की बेटी दिव्या मदेरणा को ओसियां से टिकट दिया है. ओसियां सीट पर 2000 में महिपाल मदेरणा जीते थे लेकिन 2013 के चुनाव में दिव्या की मां लीला मदेरणा जीतने में नाकाम रही थीं. वहीं भंवरी देवी हत्याकांड में सजा काट रहे मलखान सिंह विश्नोई के पुत्र महेंद्र विश्नोई को लूणी से टिकट दिया गया है. साल 2008 में मलखान सिंह विश्नोई ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 2013 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर मलखान सिंह की पत्नी अमरी देवी चुनाव हार गई थीं.

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पर नजर डालें तो दातारामगढ़ से वीरेंद्र चौधरी को टिकट दिया गया है जो कि विधायक नारायण सिंह के पुत्र हैं. इसी के साथ चूरू से रफीक पुत्र हाजी मकबूल मंडेलिया, सवाई माधोपुर से दानिश अबरार पुत्र दिवंगत केंद्रीय मंत्री अबरार अहमद, अनूपगढ़ से कुलदीप इंदौरा पुत्र हीरालाल इंदौरा, अंबर से प्रशांत शर्मा पुत्र सचदेव शर्मा, निवाई से प्रशांत बैरवा पुत्र पूर्व सांसद द्वारका प्रसाद बैरवा, वल्लभनगर से गजेंद्र सिंह पुत्र गुलाब सिंह शेखावत, मांडवा से रीता चौधरी पुत्री रामनारायण चौधरी, उदयपुर ग्रामीण से विवेक कटारा पुत्र खेमराज कटारा, झुंझुनू से ब्रिजेंद्र ओला पुत्र पूर्व केंद्रीय मंत्री सीसराम ओला, सागोद से भरत सिंह पुत्र जूझार सिंह, राजाखेड़ा से रोहित वोहरा पुत्र प्रद्युमन सिंह, फुलेरा से विद्याधर चौधरी पुत्र हरी सिंह चौधरी, डेगाना से विजयपाल मिर्धा पुत्र रिछपाल मिर्धा और भीम से सुदर्शन सिंह रावत पुत्र लक्ष्मण सिंह रावत को टिकट दिया गया है.

वहीं बीजेपी में राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने वाले उम्मीदवार हैं- डीग-कुम्भेर से शैलेष सिंह पुत्र दिगंबर सिंह, नसीराबाद से रामस्वरूप लांबा पुत्र दिवंगत सांसद सांवर लाल जाट, पिलानी से कैलाश मेघवाल पुत्र काका सुंदर लाल, प्रतापगढ़ से हेमंत मीणा पुत्र पूर्व मंत्री नंदलाल मीणा, लालसोट से राम विलास पुत्र राम सहाय, बामनवास से राजेंद्र पुत्र पूर्व विधायक कुंजीलाल और सादुलशहर से गुरवीर सिंह पौत्र विधायक गुरजंत सिंह.  

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बता दें कि अजमेर से सांसद सांवर लाल जाट के निधन के बाद फरवरी में हुए लोकसभा उपचुनाव में उनके पुत्र रामस्वरूप लांबा चुनाव हार गए थे. अब उन्हें नसीराबाद विधानसभा से उम्मीदवार बनाया गया है. हालांकि राजनीतिक वंश को आगे बढ़ाने वाले यह नेता एक सुर में कहते हैं कि परिवार की पार्टी में पैठ की वजह से शुरूआती मदद तो मिलती है, लेकिन यदि आप काम नहीं करेंगे तो जनता आपको नकार देगी.

वहीं राजनीतिक घरानों से उम्मीदवार खड़ा करने के पीछे सियासी दलों की रणनीति यह होती है कि इससे बगावत को नियंत्रण करने में तो मदद मिलती ही है, इसके साथ ही राजनीतिक विरासत से आए नेता पुत्र व पुत्रियों की तरफ जनता उम्मीद से देखती है, क्योंकि उनके समक्ष इन नेताओं के पूर्वजों द्वारा किए गए कार्य का उदाहरण या मॉडल होता है.

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