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क्यों ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी है उत्तराखंड से तीरथ सिंह रावत की विदाई?

तीरथ सिंह की तरह ममता बनर्जी भी राज्य की विधानसभा सदस्य नहीं हैं. कोविड के चलते पश्चिम बंगाल में अगर अगले कुछ महीनों में उपचुनाव नहीं हुए तो ममता बनर्जी के सामने भी तीरथ सिंह रावत जैसा संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो-PTI) पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ममता बनर्जी के सामने भी आ सकता है संकट
  • 6 महीने में विधायक बनने की संवैधानिक बाध्यता
  • पश्चिम बंगाल में भी उत्तराखंड जैसी ही स्थिति

चार महीने पहले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत ने शुक्रवार रात अपने पद से इस्तीफा दे दिया. दरअसल सीएम पद की शपथ लेते वक्त तीरथ सिंह रावत विधानसभा के सदस्य नहीं थे. छह महीने के भीतर उनका विधायक बनना जरूरी था. कोरोना के चलते राज्य में उपचुनाव नहीं हो पाएंगे. इसी ‘संवैधानिक संकट’ को तीरथ ने अपने इस्तीफे की वजह बताया है. 

तीरथ का ये ‘संकट’ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए भी सिरदर्द बन सकता है. तीरथ सिंह की तरह ममता बनर्जी भी राज्य की विधानसभा सदस्य नहीं हैं. कोविड के चलते बंगाल में अगर अगले कुछ महीनों में उपचुनाव नहीं हुए तो ममता के सामने भी तीरथ रावत जैसा संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है. 

बीजेपी ने ममता पर बढ़ाया इस्तीफे का दबाव

तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे के बाद बीजेपी अब ममता बनर्जी पर भी इस्तीफे का दबाव बना रही है. बीजेपी नेता अभी से ममता पर तंज कसने लगे हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य और पूर्व सांसद अनुपम हाजरा ने ट्वीट किया कि उत्तराखंड में छह महीने में चुनाव नहीं हो सकता था. इसलिए तीरथ रावत ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया. क्योंकि वह एक सभ्य व्यक्ति हैं. हालांकि सभी लोगों से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती है.

बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुने हुए केवल छह महीने तक ही कोई मुख्यमंत्री या मंत्री पद पर बना रह सकता है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164 (4) कहता है कि मुख्यमंत्री या मंत्री अगर छह महीने तक राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, तो उस मंत्री का पद इस अवधि के साथ ही समाप्त हो जाएगा. 

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उत्तराखंड में 8 महीने का बचा कार्यकाल

तीरथ सिंह रावत 10 मार्च 2021 को मुख्यमंत्री बने थे. वे राज्य की विधानसभा के सदस्य नहीं हैं. उनको ठीक छह महीने यानी 10 सितंबर 2021 से पहले विधायक चुनकर आना था. राज्य में दो विधानसभा सीटें रिक्त भी हैं, लेकिन कोरोना संकट के चलते उनपर चुनाव कराए जाने की संभावना नहीं बन रही. वैसे भी राज्य की विधानसभा का कार्यकाल अब महज 8 महीने का बचा है.

पिछले दिनों कोरोना संकट के बीच देश के पांच राज्यों में चुनाव कराए जाने को लेकर निर्वाचन आयोग की काफी किरकिरी हुई थी. मद्रास हाईकोर्ट ने तो चुनाव आयोग को ही दूसरी लहर का जिम्मेदार बताकर अफसरों पर मर्डर चार्ज लगाने तक की बात कही थी. ऐसे में जब कोरोना की तीसरी लहर का खतरा जताया जा रहा है, चुनाव आयोग उपचुनाव कराने का जोखिम उठाएगा, ऐसा लगता नहीं है. देश में करीब दो दर्जन विधानसभा सीटों और कुछ संसदीय सीटों पर चुनाव महामारी के चलते ही लंबित हैं.

पश्चिम बंगाल में भी उत्तराखंड जैसी ही स्थिति

पश्चिम बंगाल की चुनावी जंग फतह करने के बाद ममता बनर्जी ने 4 मई 2021 को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. खुद नंदीग्राम में चुनाव हारने के चलते ममता राज्य विधानमंडल की सदस्य नहीं हैं. ऐसे में उन्हें अनुच्छेद 164 के तहत छह महीने के अंदर यानी 4 नवंबर 2021 तक विधानसभा का सदस्य बनना जरूरी है और यह संवैधानिक बाध्यता है.

हालांकि, पश्चिम बंगाल में भवानीपुर विधानसभा सीट रिक्त हो गई है, लेकिन ममता विधानसभा की सदस्य तभी बन पाएंगी जब तय अवधि के अंदर चुनाव हो सकें. मौजूदा दौर में कोरोना संकट के चलते चुनाव आयोग अगर उपचुनाव नहीं करा पाता है तो 4 नवंबर को तीरथ सिंह रावत की तरह ममता बनर्जी को भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है. 


तीरथ से पहले एमपी के दो मंत्रियों की गई थी कुर्सी

पहले ये व्यवस्था थी कि एक बार पद से हटने के बाद ऐसे नेता दोबारा मंत्री पद की शपथ लेकर छह महीने की अपनी छूट को एक साल तक बढ़ा लेते थे. पंजाब में भी कांग्रेस नेता तेज प्रकाश सिंह को 1995 में मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था, वे उस समय राज्य के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. ऐसे में छह महीने का कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्होंने मंत्री पद इस्तीफा दे दिया था और 1996 में राज्य विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए बिना वे फिर से मंत्री नियुक्त किए गए. लेकिन बाद में अगस्त 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत करार देते हुए इसपर रोक लगा दी.

 



यही वजह है कि तीरथ सिंह रावत की ही तरह पिछले साल मध्य प्रदेश के दो कैबिनेट मंत्रियों तुलसीराम सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत को छह महीने में राज्य विधानसभा का सदस्य न चुने जाने के चलते मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. इसके बाद नंवबर में उपचुनाव जीतकर आने के बाद उन्हें दोबारा मंत्री बनाया गया था.

चुनाव के लिए चाहिए कम से कम 28 दिन का वक्त

पांच दशकों तक चुनाव आयोग के कानूनी सलाहकार के तौर पर काम करने वाले एस के मेंदीरत्ता ने एक वेबसाइट से बातचीत में बताया था कि आयोग को अधिसूचना के बाद चुनाव कराने के लिए केवल 28 दिन के समय की जरूरत होती है. इस लिहाज से यदि बंगाल में उपचुनाव कराया जाना है तो आयोग को अक्टूबर की शुरुआत में ही इसकी अधिसूचना जारी करनी होगी. अभी इसमें ठीक तीन महीने का समय है.

अगर कोरोना का खतरा कम हुआ तो ममता की राह आसान हो जाएगी वर्ना उन्हें भी तीरथ की तरह पद से इस्तीफे को मजबूर होना होगा. वैसे भी देश में करीब दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा और  संसदीय सीटों पर उपचुनाव होने हैं. बंगाल में जल्द उपचुनाव ममता बनर्जी की तो मजबूरी हो सकती है लेकिन चुनाव आयोग कोई भी फैसला कोविड के खतरे को देखते हुए ही लेगा.
 

 

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