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नरेंद्र मोदी @70, नए साल में सामने होंगी ये पांच बड़ी चुनौतियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिंदगी के 70 साल में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है. प्रधानमंत्री के तौर पर देश की सत्ता पर 6 साल से ज्यादा समय से काबिज हैं. इस दौरान मोदी सरकार के नाम कई ऐतिहासिक उपलब्धियां रही हैं, लेकिन मौजूदा समय में कई चुनौतियां भी हैं. इसके लिए देश उनकी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कोरोना के चलते देश की आर्थिक हालत खस्ता
  • चीन सीमा विवाद को हल करना मोदी की बड़ी चुनौती
  • रोजगार को लेकर देश भर में युवाओं का हल्लाबोल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज जन्मदिन है. उन्होंने जिंदगी के 70 साल में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है. प्रधानमंत्री के तौर पर वह 6 साल से ज्यादा समय से सत्ता पर काबिज हैं. इस दौरान मोदी सरकार के नाम कई ऐतिहासिक उपलब्धियां रही हैं, लेकिन मौजूदा समय में कई चुनौतियां भी हैं. इसके लिए देश उनकी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है. देश में आर्थिक मोर्चे पर सुस्ती छाई हुई है तो रोजगार के मुद्दे पर युवाओं ने हल्ला बोल रखा है. आने वाले समय में मोदी सरकार को इन पांच चुनौतियों से पार पाना होगा.  

1.चीन सीमा विवाद
चीन और भारत के बीच सीमा पर तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है. 15 जून को गलवान घाटी में चीन सैनिकों के साथ हुए हिंसक टकराव में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में चीन ने डोकलाम में हंगामा किया, जिससे निबटने में मोदी सरकार को लंबा वक्त लगा. अब चीन फिर से लद्दाख सहित अरुणाचल प्रदेश में परेशानी खड़ी कर रहा है. चीन अपनी आक्रामक विस्तारवादी नीति पर चलते हुए वर्चस्व स्थापित करने के लिए पैर पसार रहा है. 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा कि 'लद्दाख के पूर्वी सीमा पर विवाद है. चीन अरुणाचल प्रदेश में 90,000 वर्ग किलोमीटर पर भी अपना दावा ठोंक रहा है.' इससे साफ है चीन की मौजूदा नीति एक बार फिर भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. विपक्ष खासकर कांग्रेस लगातार चीन मामले पर मोदी सरकार को घेरने में जुटा है. राहुल गांधी चीन को लेकर मोदी सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं. ऐसे में मोदी सरकार के सामने चीन एक बड़ी चुनौती है. भारत को अपने हितों की सुरक्षा के लिए राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक और वाणिज्यिक मोर्चे पर कारगर रणनीतियां बनानी होंगी. मोदी सरकार के सामने चीन के साथ सीमा विवाद को हल करना एक बड़ी चुनौती है. 

2.अर्थव्यवस्था में सुधार
देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की वजह से सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ा है. प्रधानमंत्री मोदी जब अपने पहले कार्यकाल के अंतिम दिनों में थे, तब से ही देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतरनी शुरू हो चुकी थी. जीडीपी का आंकड़ा लगातार गिरता जा रहा था. कोरोना के चलते तो और भी तेजी से जीडीपी नीचे गिरी है. कोरोना ने इस गिरती अर्थव्यवस्था को और भी तबाह कर दिया है. रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास का जीडीपी निगेटिव का अनुमान सच साबित हुआ है. देश की आर्थिक स्थिति और भी डगमगाई हुई है, जिसका असर नौकरियों से लेकर व्यवसाय तक पर पड़ रहा है. सुस्त अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने की तमाम कोशिशों के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार को अभी तक बहुत सफलता नहीं मिली है. 

मोदी सरकार के सामने चुनौती है कि वो राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करे और साथ ही साथ बाजार में मांग बनाने के लिए कैश फ्लो करे. इसकी कोशिश हुई भी है. 20 लाख करोड़ के कोरोना राहत पैकेज में भी इसका जिक्र है, लेकिन ये पैसे नाकाफी दिख रहे हैं. आने वाले दिनों में कम से कम एक साल तक मोदी सरकार के लिए अर्थव्यवस्था एक बड़ी चुनौती है. देश की आर्थिक व्यवस्था को पटरी पर लाने, रफ्तार देने और उच्च विकास-दर हासिल करने के लिए मोदी सरकार को कई मोर्चों पर काम करने की चुनौती होगी. 

मौजूदा समय में खाने-पीने की वस्तुओं में महंगाई बढ़ी हुई है और जीडीपी लगातार नीचे जा रहे हैं. महंगाई बढ़ने से मांग प्रभावित होगी, ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती है. देश को शक्तिशाली बनाने के लिए शिक्षा, रोजगार और अर्थव्यवस्था को मजबूती दिए बिना संभव नहीं है. कोरोना संक्रमण के चलते देश की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती जा रही है, जिसे संभालना मोदी सरकार के लिए काफी चुनौती भरा माना जा रहा है. हालांकि, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पीएम मोदी ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है लेकिन विशेषज्ञ उसे लेकर ज्यादा अश्वस्त नजर नहीं आ रहे. 

3.कोरोना से सुरक्षा 
नरेंद्र मोदी सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती कोराना वायरस से लोगों की सुरक्षा करना है. इस वायरस के संक्रमण से लोगों को बचाने के लिए मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था की भी परवाह नहीं की. देश में लॉकडाउन लगा दिया और कहा कि जान है तो जहान है. लॉकडाउन के समय देश में कोरोना संक्रमण के आंकड़े 600 से भी कम थे. लेकिन अब ये आंकड़ा 50 लाख क्रास कर चुका है. देश में लॉकडाउन को खत्म कर दिया गया और कोरोना का संक्रमण हर रोज बढ़ता ही जा रहा है. इससे निबटने के लिए सरकार ने हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन अब भी कामयाबी नहीं मिल पाई है. हर रोज मौतों और संक्रमण के बढ़ते आंकड़े मोदी सरकार की चिंता बढ़ाए हुए है.  

4.राज्यों के चुनाव 
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी भले ही दूसरी बार देश की सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रही हो, लेकिन विधानसभा चुनावों में उनकी राह आसान नहीं है. कांग्रेस के साथ मिलकर क्षेत्रीय दल महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्य की सत्ता से बीजेपी को बेदखल करने में कामयाब रहे हैं. ऐसे में आने वाले एक सालों में बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां पार्टी को जिताने की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कंधों पर होगी. साल के अंत में बिहार चुनाव होने हैं, जहां सियासी बिगुल बज चुका है. बीजेपी यहां नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है. बिहार में नीतीश कुमार को 15 साल से सत्ता में होने के चलते सत्ताविरोधी लहर का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसकी वजह से सरकार बचाना चुनौतीपूर्ण हैं.

बिहार की चुनावी तपिश खत्म भी नहीं होगी कि  2021 में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम जैसे राज्य में चुनाव होने हैं. इसमें असम छोड़ कहीं भी बीजेपी की सत्ता नहीं है. ऐसे में बीजेपी के लिए 2021 काफी महत्वपूर्ण होगा. बीजेपी पश्चिम बंगाल में काफी उम्मीद लगाए हुए है, जहां मोदी के लिए ममता के मजबूत दुर्ग को भेदना एक बड़ी चुनौती है. असम में भी विपक्ष एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरने की रणनीति पर है. इसके अलावा असम में सीएए को लेकर भी नाराजगी है, जिसके चलते पूर्वोत्तर के प्रमुख राज्य में सत्ता को बचाए रखना पीएम मोदी के लिए बड़ा चैलेंज है. दक्षिण भारत में भी मोदी को अपना राजनीतिक करिश्मा दिखाना होगा. तमिलनाडु में बीजेपी AIDIMK के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरकर खाता खोलने की जुगत में है जबकि केरल में भी बीजेपी अपने जनाधार को मजबूत करने के लिए हाथ पांव मार रही है. 

5.रोजगार और पलायन
रोजगार और पलायन का मसला मोदी सरकार की एक और बड़ी चुनौती है. सरकार बनने के बाद विपक्ष ने रोजगार के आंकड़ों पर मोदी सरकार को घेरना शुरू कर दिया. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के आंकड़ों के मुताबिक देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी है, जो पिछले 45 साल में सबसे ज्यादा है. कोरोना का असर कितना है, इसका अंदाजा सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आंकड़े के अनुसार भारत में बेरोजगारी की दर देश के इतिहास में सबसे अधिक 27.11 फीसदी हो गई है. देश का हर चौथा नागरिक बेरोजगार है. सीएमआई के मुताबिक शहरों में बेरोजगारी की दर 29.22 फीसदी है, जबकि गांवों में ये आंकड़ा 26.69 फीसदी का है. 

नरेंद्र मोदी सरकार को विपक्ष लगातार रोजगार के मुद्दे पर घेर रहा है तो वहीं युवा और छात्र सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. भविष्य में बेरोजगारी का ये आंकड़ा और ज्यादा हो सकता है. कोरोना की वजह से जो प्रवासी मजदूर शहर छोड़कर गांव लौट गए हैं, वो अभी भी शहर वापस आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. मोदी सरकार इन बेरोजगारों के लिए रोजगार सृजन कैसे करेगी, ये एक बड़ी चुनौती है, जिससे खुद पीएम मोदी को पार पाना है. 


 

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