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पुण्यतिथि: इंदिरा का वो इंटरव्यू जिसमें 'इमरजेंसी' को जायज ठहराती दिखी थीं 'आयरन लेडी'!

आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों को छीन लिए जाने पर इंदिरा ने कहा था कि युद्धकाल के समय कई सारे राजनीतिक अधिकार और नागरिक अधिकार लोगों से ले लिए जाते हैं, और भारत के लिए ये समय उतना ही गंभीर था जितना कि एक युद्धकाल...क्योंकि ये हमारे अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गया था.

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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आज पुण्यतिथि है (फोटो-Thames tv) पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आज पुण्यतिथि है (फोटो-Thames tv)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • इमरजेंसी लागू करने के लिए क्या थे इंदिरा के तर्क
  • 'मोरारजी जैसे लोग लोकतंत्र नष्ट कर रहे थे'
  • '...इस अराजकता को नहीं रोकते तो भारत बचता ही नहीं'

आज देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि है. 36 साल हो गए इंदिरा गांधी नहीं रहीं. 31 अक्टूबर 1984 को उनके ही बॉडीगार्ड बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी. इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है.

इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा की थी. इस दौरान नागरिक अधिकारों को कुचल दिया गया और बड़े पैमाने पर विपक्षी नेताओं और जनता को जेलों में ठूंस दिया गया. देश में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई, चोटी के नेता मोरार जी देसाई गिरफ्तार कर लिए गए. प्रेस की आजादी छीन ली गई. 

तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इंदिरा गांधी के कहने पर संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी. 

वो ऑल इंडिया रेडियो और बीबीसी का दौर था

वो दौर 70-80 का था. तब सोशल मीडिया की बात तो छोड़ ही दीजिए, सैटेलाइट चैनल का भी नामोनिशान न था. भारत के मुख्य संचार माध्यमों में अखबार, ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन और बीबीसी की छाप थी. आज की एक पूरी जेनेरेशन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को किताबों, कहानियों, किस्सों और उनके साक्षात्कारों के जरिए ही जानती है. ऐसे ही एक साक्षात्कार में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू करने के पीछे अपना तर्क बताया था. 

आपातकाल लागू करने के लिए इंदिरा गांधी ने बिना अफसोस जताए कहा था कि उस वक्त ऐसा करना देश की सुरक्षा के लिए जरूरी बन गया था, अन्यथा भारत के टूटने का खतरा था.

1977 का आम चुनाव हार चुकी थीं इंदिरा

1978 में जब ये बहुचर्चित इंटरव्यू लिया गया था. इससे पहले इंदिरा गांधी 1977 का आम चुनाव हार चुकी थीं. मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री थे. इंदिरा का इंटरव्यू लिया था ब्रिटिश पत्रकार थेम्स टीवी के जोनाथन डिंबलबाए  (Jonathan Dimbleby) ने. 

इस इंटरव्यू में इंदिरा गांधी का अंदाज, उनकी शैली और उनकी गंभीरता बताती है कि क्यों उन्हें आयरन लेडी कहा जाता है. इंदिरा से पत्रकार जोनाथन ने पूछा कि आखिर आपातकाल लागू करने से पहले आपको किस तरह के साजिश का आभास हुआ था. इसके जवाब में इंदिरा ने कहा कि, "ये साफ है कि पूरे उप-महाद्वीप को अव्यस्थित कर दिया गया है...इसे बाहरी ताकतों का समर्थन हासिल था...सवाल ये है कि अगर ये सिर्फ आंतरिक उथल-पुथल होता तो इसे ज्यादा आसानी से निपटा जा सकता था...लेकिन अंतरराष्ट्रीय एंजेंसियां सक्रिय थीं...आज जो हो रहा है, इस शक हमें पहले से ही था." 

भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (फोटो क्रेडिट-Thames tv)

'प्रधानमंत्री मैं हूं...जानना मेरी जिम्मेदारी है'

इंटरव्यू के दौरान जब इंदिरा से पूछा गया कि आखिर आपकी खुफिया एजेंसियों, आपके गृह मंत्री ने आपको किस तरह की जानकारी दी जो आपने आपातकाल लगाया. इसके जवाब में इंदिरा ने पत्रकार जोनाथन को टका सा जवाब दिया, "वो क्या मुझे कहेंगे ये इसके बारे में नहीं है, मैं प्रधानमंत्री हूं, जानना मेरी जिम्मेदारी है. और सारी जानकारियां पुलिस से ही नहीं आती हैं, और दूसरे स्रोतों से भी आती हैं, लेकिन उन्होंने भी इस तरह की रिपोर्ट दी थी."

1976 में चुनाव करवाते तो आसानी से जीत जाते-इंदिरा

शाह कमीशन की रिपोर्ट को एकतरफा और पूर्वाग्रह से ग्रसित बताते हुए इंदिरा गांधी ने कहा कि, "क्या एक संसदीय लोकतंत्र में एक जज संसद के फैसले को पलटने की योग्यता रखता है." आगे इंदिरा गांधी ने कहा कि, "मैंने जो फैसला लिया था उसे कैबिनेट ने और संसद ने स्वीकृति दी थी, न सिर्फ से इसे स्वीकार किया गया था बल्कि पूरे देश में इसकी तारीफ की गई थी. यदि हम 1976 में चुनाव करवा दिए होते तो हम आसानी से जीत जाते, लेकिन अर्थव्यवस्था की हालत खराब थी, इसलिए हमने ऐसा नहीं किया.' 

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बता दें कि शाह कमीशन आपातकाल के समय की गयी ज्यादतियों की जांच के लिए जनता पार्टी सरकार द्वारा 1977 में बनाया गया था. 

इंदिरा ने इंटरव्यू में कहा था कि उस वक्त हम जिन आर्थिक नीतियों पर चल रहे थे, अगर ये जारी रहीं तो हम भारत को एक मजबूत अर्थव्यवस्था दे सकते थे, यदि हम उसी समय चुनाव करवाते तो ये संभव नहीं था. इसलिए हमने अपने राजनीतिक भविष्य को खतरे में डाला और भारत को आर्थिक स्थिरता देने का फैसला किया, बजाय इसके कि हमने चुनावों की चिंता की.

'मोरारजी देसाई जैसे लोग लोकतंत्र नष्ट कर रहे थे'

इस दौरान पत्रकार जोनाथन डिंबलबाए ने इंदिरा से तीखा सवाल दागा. उन्होंने कहा कि तब मोरारजी देसाई को, जो कि बाद में भारत के पीएम बने, जेल में डालने की क्या जरूरत आ पड़ी थी, क्या वो भारत के लिए आर्थिक खतरा बन गए थे. इंदिरा ने इस सवाल के जवाब में बिना एक क्षण गंवाए कहा, "नहीं...क्योंकि ये ही लोग थे जो लोकतंत्र को नष्ट कर रहे थे."

'हमलोग प्रधानमंत्री के घर को घेरने जा रहे हैं'

इस पर जोनाथन ने हैरानी जताते हुए पूछा कि आखिर कैसे? इंदिरा ने अपना जवाब जारी रखते हुए कहा, "...क्योंकि उन्हें महसूस होने लगा था कि वे चुनाव नहीं जीत सकते हैं, उन्होंने कहा कि हम इस जंग को गलियों में ले जाएंगे...मिस्टर मोरारजी देसाई ने एक इंटरव्यू में ऑन रिकॉर्ड कहा था कि हमलोग प्रधानमंत्री के घर को घेरने जा रहे हैं...हम लोग संसद को घेरने जा रहे हैं, हमलोग ये सुनिश्चित करेंगे कि संसद में कोई काम न हो...न तो प्रधानमंत्री बाहर आ सकें...न ही कोई अंदर जा सके..."

इंदिरा ने कहा कि विपक्ष के एक दूसरे नेता ने तो यहां तक कहा था कि अगर हम बैलेट से नहीं जीत सके तो हम बुलेट से जीतेंगे.  

'...इस अराजकता को नहीं रोकते तो भारत बचता ही नहीं'

इंदिरा के जवाब पर पत्रकार जोनाथन ने प्रतिप्रश्न करते हुए पूछा कि आपने पहले से मौजूद कानूनों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया, अगर वे कानून तोड़ रहे थे तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया? इस पर इंदिरा ने ब्रिटिश पत्रकार को दो टूक कहा कि, "भारत ब्रिटेन जैसा एक छोटा सा देश नहीं है, ये एक बहुत बड़ा देश है और यहां की समस्याएं जटिल हैं, पूरे देश में इन लोगों ने अनुशासनहीनता की चरमसीमा का माहौल बनाकर रख दिया था...यहां एक तरह का नॉन फंक्शनल अनार्की (अराजकता) पैदा हो गई थी. अगर उस वक्त हमलोग इसे नहीं रोकते तो भारत नहीं बचा रहता...दुर्भाग्य से मौजूदा सरकार का कामकाज भारत को फिर से उसी रास्ते पर ले जा रहा है...सिर्फ एकमात्र अंतर यह है कि उस वक्त हमने एक अच्छी अर्थव्यवस्था दी थी इसलिए ये सरकार अबतक चल रही है."

'ये युद्ध जैसी ही स्थिति थी...'

आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों को छीन लिए जाने पर इंदिरा ने कहा था कि युद्धकाल के समय कई सारे राजनीतिक अधिकार और नागरिक अधिकार लोगों से ले लिए जाते हैं, और भारत के लिए ये समय उतना ही गंभीर था जितना कि एक युद्धकाल...क्योंकि ये हमारे अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गया था.

'मैंने इमरजेंसी लगाई, तो मैंने इसे वापस भी लिया'

प्रेस की आजादी पर लगे सेंसरशिप का जवाब देते हुए इंदिरा गांधी ने इस इंटरव्यू में कहा था कि उस समय हालात काबू से बाहर जा रहे थे और कुछ प्रतिबंध जरूरत हो गए थे. इंदिरा ने कहा कि विकासशील देशों में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र था जिसने शांतिपूर्ण तरीके से सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाने की कोशिश की. जब इन तरीकों को खतरा हुआ तो हमने अल्पकालिक कदम उठाए. मैंने आपातकाल की घोषणा की थी, लेकिन वो मैं ही हूं जिसने इमरजेंसी को वापस लिया. मैंने चुनाव करवाए...मैं नहीं समझती हूं कि दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई एक भी उदाहरण है.

'आज भी तो आपातकाल जैसी स्थिति है'

1978 के सामाजिक-राजनीतिक हालत का जिक्र करते हुए इंदिरा गांधी ने कहा कि आज भी आपातकाल जैसे हालात हैं. भले ही ये संवैधानिक नहीं है, वैध नहीं है, इसे संसद की स्वीकृति हासिल नहीं है, लेकिन हर दूसरे पहलू पर आज इमरजेंसी जैसे ही हालात हैं.

इंटरव्यू के दौरान एक बार इंदिरा गांधी से पूछा गया था कि क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ कि आपने किसी भी तरह से उस विश्वास का दुरुपयोग किया है जो भारत के लोगों ने आप में जताया है. इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने बिना अफसोस जताए कहा कि उन्हें ऐसा कभी नहीं लगता है.

बता दें कि देश में 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक आपातकाल लागू रहा. इसके बाद इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा की. इस चुनाव में कांग्रेस को जबर्दस्त हार का सामना करना पड़ा. 


 

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