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असम-बंगाल से केरल तक कांग्रेस का सफाया, क्या राहुल-प्रियंका के लिए खड़ी होंगी चुनौतियां?

राहुल गांधी केरल तो प्रियंका गांधी ने असम में केंद्रित कर रखा था. ऐसे में असम और केरल तमाम संभावनाओं के बावजूद पार्टी की शिकस्त ने राहुल-प्रियंका के नेतृत्व व रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पार्टी में उठते विद्रोह और बढ़ते असंतोष के बीच कांग्रेस की हार ने बागी नेताओं को गांधी परिवार के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका दे दिया है. 

प्रियंका गांधी और राहुल गांधी प्रियंका गांधी और राहुल गांधी
17:10
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बंगाल में कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल सकी
  • केरल में राहुल गांधी की मेहनत पर फिरा पानी
  • असम में प्रियंका गांधी का चेहरा काम नहीं आया

देश के पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस अपनी हार के सिलसिले को तोड़ने में नाकाम साबित हो रही है, जिसके चलते पार्टी का हाथ एक बार फिर से खाली रह गया. राहुल गांधी ने केरल तो प्रियंका गांधी ने असम में अपना ध्यान केंद्रित कर रखा था. ऐसे में असम और केरल में तमाम संभावनाओं के बावजूद पार्टी की शिकस्त ने राहुल-प्रियंका के नेतृत्व व रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पार्टी में उठते विद्रोह और बढ़ते असंतोष के बीच कांग्रेस की हार ने बागी नेताओं को गांधी परिवार के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका दे दिया है. 

पांच राज्यों की चुनावी रणनीति का संचालन पूरी तरह कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व और उनके करीबी पार्टी रणनीतिकारों के हाथ में ही रहा. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी केरल के वायनाड से सांसद होने के चलते विधानसभा चुनाव में उनकी साख दांव पर लगी थी. इसीलिए राहुल ने सबसे ज्यादा फोकस केरल के चुनाव प्रचार पर रखा था जबकि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने खुद को असम के प्रचार में लगा रखा था. हालांकि पांच राज्यों में से इन दोनों ने मुख्यतः खुद को दो राज्यों पर ही केंद्रित रखा. इसके बावजूद गांधी परिवार के दोनों नेता अपने-अपने राज्य में कामयाब नहीं रहे. कांग्रेस नेतृत्व सत्ता विरोधी माहौल के बाद भी जनमत को लुभाने में कामयाब नहीं हुआ. 

असम में प्रियंका का नहीं चला जादू

असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी अपनी सरकार बचाने में एक बार फिर से सफल रही. वहीं, कांग्रेस का बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन करने का दांव भी फेल हो गया है. इतना ही नहीं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को असम में चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपकर प्रियंका ने एक निर्णायक प्रयोग भी किया है, लेकिन पार्टी को इसका लाभ नहीं मिल सका और कांग्रेस अपने पुराने नतीजों के इर्द-गिर्द सिमट गई. 

केरल की हार से राहुल के सामने चुनौती

वहीं, राहुल गांधी ने खुद को केरल पर केंद्रित रखा था. केरल में भी माना जा रहा था कि राहुल कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल बना सकेंगे, क्योंकि वह अपने प्रचार के तरीके को बदलकर लोगों के बीच घुलकर मिलकर संवाद कर रहे थे. इसके बावजूद राहुल गांधी वाममोर्चा के पिनराई विजयन के सियासी वर्चस्व को तोड़ पाने में फेल हो गए. केरल के सियासी इतिहास में चार दशक के बाद कोई पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी कर सकी है. असम और केरल चुनाव नतीजों से यह भी साफ झलक रहा है कि कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व सत्ता विरोधी माहौल के बाद भी जनमत को लुभाने में कामयाब नहीं हो पा रहा है. 

कांग्रेस में क्या मचेगा सियासी घमासान?
कांग्रेस के नए अध्यक्ष के चुनाव से ठीक पहले पांच राज्यों के चुनाव में पार्टी के लचर प्रदर्शन के चलते गांधी परिवार के प्रति सवाल खड़े हो सकते हैं. बंगाल में कांग्रेस का खाता न खुलना, असम-केरल में करारी मात और पुडुचेरी में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी में एक बार फिर उठापटक के आसार बढ़ गए हैं, क्योंकि पार्टी के असंतुष्ट समूह (जी-23) के नेताओं की ओर से कांग्रेस के लगातार सिकुड़ते आधार को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे. ऐसे में पार्टी का यह विद्रोही ग्रुप एक बार फिर से मोर्चा खोल सकता है. 

गांधी परिवार के सामने खड़ीं चुनौतियां

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए पार्टी के मौजूदा हालात को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब देना भी इन नतीजों के बाद आसान नहीं होगा. खासतौर पर इसलिए भी पार्टी की कमजोर हालत और नेतृत्व की दुविधा को लेकर सवाल उठाने वाले असंतुष्ट नेताओं की पांच राज्यों के चुनाव के दौरान कोई भूमिका नहीं थी. ऐसे में विद्रोही ग्रुप को गांधी परिवार को घेरने का एक बड़ा मौका मिल गया है. 

कांग्रेस के सामने अपनी अंदरूनी सियासी चुनौती में भारी इजाफे के साथ अब राज्य में ज्यादा मजबूत होकर उभरे क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक प्रभाव को थामने की दोहरी चुनौती होगी. बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन के मजबूत होने से साफ हो गया है कि एक ओर जहां सूबों में कांग्रेस का सियासी आधार लगातार घट रहा है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय पार्टियां व उनके नेता राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी राजनीति में उसकी जगह के लिए बड़ा खतरा बनते नजर आ रहे हैं. 

 

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