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दलबदल विरोधी कानून: सुप्रीम कोर्ट के गंभीर सुझावों पर संसद ने नहीं उठाया कोई कदम

भारत में 1967 के आम चुनावों के बाद राज्यों में विधायकों द्वारा बड़ी संख्या में दलबदल किया गया था और इन दलबदलों के परिणामस्वरूप कई राज्यों में सरकारों को सत्ता से हटा दिया गया. तब तत्कालीन सांसदों ने इस मामले पर लोकसभा में गंभीर चिंता जताई थी.

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सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर संसद को कई सुझाव दिए थे सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर संसद को कई सुझाव दिए थे
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 1985 में वजूद में आई थी दसवीं अनुसूची
  • दसवीं अनुसूची से उस समय हुए थे तीन बड़े बदलाव
  • बिना दांत का बाघ बनकर रह गई दसवीं अनुसूची

भारत के संविधान का अनुच्छेद 102 उन आधारों को निर्धारित करता है, जिनके तहत एक विधायक को सदन का सदस्य होने से अयोग्य ठहराया जा सकता है. अनुच्छेद 102 का पहला भाग ऐसे कई उदाहरणों का जिक्र करता है, जिनसे ऐसी अयोग्यता की जा सकती है. 

अगर कोई व्यक्ति सरकार के अधीन लाभ के लिए कोई अघोषित पद धारण करता है, यदि उसे सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त घोषित किया जाता है या वह अनुन्मोचित दिवालिया आदि हो जाता है. अनुच्छेद 102 का दूसरा भाग संविधान की दसवीं अनुसूची को किसी भी सदस्य को अयोग्य घोषित करने का अधिकार देता है. यह दसवीं अनुसूची ही है जिसे दलबदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है.

दलबदल को "निष्ठा या कर्तव्य का सचेत परित्याग" के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसे आम भाषा में वफादारी और फर्ज को छोड़ देना कह सकते हैं. दरअसल, भारत में 1967 के आम चुनावों के बाद राज्यों में विधायकों द्वारा बड़ी संख्या में दलबदल किया गया और इन दलबदलों के परिणामस्वरूप कई राज्यों में सरकारों को सत्ता से हटा दिया गया. तब तत्कालीन सांसदों ने इस मामले पर लोकसभा में गंभीर चिंता जताई. 

नतीजतन समस्या की जांच के लिए तत्कालीन गृह मंत्री वाईबी चव्हाण की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया. कुछ ही समय बाद समिति ने इस मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें न केवल यह परिभाषित किया गया कि दलबदल क्या है, बल्कि उन मामलों के लिए अपवाद भी प्रदान किया जहां दलबदल वास्तविक था. इस समस्या से निपटने के लिए एक कानून लाने के दो असफल प्रयासों के बाद, आखिरकार 1985 में संविधान (52वां संशोधन) अधिनियम के माध्यम से दसवीं अनुसूची अस्तित्व में आई.
 
दसवीं अनुसूची ने उस समय यथास्थिति में तीन बड़े बदलाव किए-

1. इसने एक विधायक के खिलाफ सदन के अंदर और बाहर दोनों जगह उनके आचरण के लिए अयोग्यता की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दी. इससे विधायकों को सदन में अपनी सीट गंवाने का खतरा हो सकता है.

2. सदन के अध्यक्ष ही एकमात्र प्राधिकारी थे, जो अयोग्यता कार्यवाही पर निर्णय ले सकते थे.

3. एक पार्टी के भीतर विभाजन या किसी अन्य पार्टी के साथ विलय के मामलों में, विधायकों को अयोग्यता से सुरक्षित रखा गया था.

इस कानून के अस्तित्व में आने के कुछ समय बाद, विधायकों और राजनीतिक दलों ने इसे तनाव-परीक्षण के अधीन करना शुरू कर दिया. 1992 में, दसवीं अनुसूची की वैधता और संवैधानिकता को किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू और अन्य के ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी. एक अध्यक्ष की शक्तियों की सीमा और सदन के बाहर एक विधायक के कृत्यों को तय करने के लिए न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर किया गया था, जो अयोग्यता कार्यवाही को आकर्षित कर सकता था. उस समय, सुप्रीम कोर्ट ने अयोग्यता कार्यवाही पर निर्णय लेने के लिए अध्यक्ष की शक्ति को बरकरार रखा, लेकिन यह भी निर्धारित किया कि अध्यक्ष द्वारा लिया गया निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा.

साल 2003 में, संसद में संविधान (91वां संशोधन) अधिनियम पेश किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप दसवीं अनुसूची के तहत पार्टी में विभाजन के मामलों में विधायकों को दी गई सुरक्षा के प्रावधान हटा दिए गए थे. प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति ने पाया कि लाभ के पद का लालच दलबदल और राजनीतिक खरीद-फरोख्त को प्रोत्साहित करने में एक बड़ी भूमिका निभाता है. नए कानून में यह भी कहा गया है कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए गए किसी भी व्यक्ति को केंद्र या राज्य स्तर पर मंत्री पद से स्वचालित रूप से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा. हालांकि संशोधन दलबदल विरोधी कानून को मजबूत करने के इरादे से लाया गया था, फिर भी इसके साथ कुछ बड़ी दिक्कतें थीं.
 
ये कानून वो समय अवधि परिभाषित नहीं करता है, जिसके भीतर एक विधायक के खिलाफ अयोग्यता कार्यवाही का फैसला किया जाना चाहिए. इस कानून के आधार पर सदन के अध्यक्ष की भूमिका अधिक से अधिक राजनीतिक हो रही है, अयोग्यता का निर्णय या तो तुरंत किया गया या अनिश्चित काल तक लंबित रखा गया था, जो इस बात पर निर्भर करता था कि दोनों में से कौन सा राजनीतिक दल के अनुकूल था, जिससे अध्यक्ष पहले से संबद्ध था. 

इसके अतिरिक्त, अयोग्यता कार्यवाही पर न्यायालयों का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होने के कारण, केवल अध्यक्ष के निर्णय के खिलाफ या अयोग्यता कार्यवाही का निर्णय लेने में उनकी निष्क्रियता पर न्यायिक उपाय की मांग की जा सकती है. इसने दसवीं अनुसूची के तहत कार्यवाही को काफी हद तक बेकार बना दिया और विधायकों को जहाज से कूदने से हतोत्साहित नहीं किया. हालांकि 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा कि स्पीकर को "उचित समय" के भीतर उनके सामने लंबित अयोग्यता की कार्यवाही पर फैसला करना चाहिए.

2020 के कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष मणिपुर के मामले में न्यायमूर्ति रोहिंटन नरीमन का निर्णय दलबदल विरोधी कानून के लिए महत्वपूर्ण रहा है. न्यायमूर्ति नरीमन ने अपने फैसले में दलबदल के मामलों से निपटने के लिए एक बाहरी तंत्र स्थापित करने की बात कही थी.
 
हालांकि, दसवीं अनुसूची को बिना दांत वाले बाघ के रूप में छोड़कर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए गंभीर सुझावों को लागू करने के लिए संसद द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया है.

 

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