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भारत

दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली

दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली
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'दिल वालों की दिल्ली' यह एक जुमला मात्र है. हकीकत में यह दिल और दिमाग से कोसों दूर होती जा रही है. सड़कों पर छोटी-मोटी खरोचें और एक्सिडेंट में लोग एक-दूसरे की जान ले लेते हैं. आखिर क्यों है दिल्ली की सड़कों पर इतना गुस्सा? आइए चलते हैं इसकी तह में और जानते हैं दिल्ली वालों के गुस्से का कारण...
दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली
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दिन हो या रात, दिल्ली में गाड़ियों की आवाज से आप छुटकारा नहीं पा सकते. हर समय हॉर्न और गाड़ियों की तेज आवाज आपके कानों में 'सुरलहरी' की तरह आती रहती है.
दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली
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दिल्ली की सड़कों पर आपको ट्रैफिक तोड़ते 'श्रीमान' हर हमेशा दिख जाएंगे. ट्रैफिक पर खड़े हों, हॉस्पिटल हो या स्कूल, कहीं से भी गुजरते वाहन हॉर्न बजाना नहीं भूलते.
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दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली
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दिल्ली दिल वालों की है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इस आंकड़े से एक बात तो साफ है कि दिल्ली कार वालों की जरूर है.
दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली
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आगे-पीछे-दाएं-बाएं; आपको चारों तरफ से कोई घेर ले तो गुस्सा तो आएगा ही न! ट्रैफिक में दिल्ली वालों का गुस्सा शायद इसी वजह से सातवें आसमान पर रहता होगा.
दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली
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दिल्ली पुलिस की मुस्तैदी यहां भी कम नहीं है जनाब. आप भले ही गुस्से के उस्ताद हों पर एक बार धरे गए तो आपकी खैर नहीं.
दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली
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अपनी गाड़ी मतलब आन-बान-शान. अब उसे कोई ठोंक दे तो गुस्सा तो आना है भाई. फिर क्या था, मैंने भी उसे ठोंक दिया... आंकड़े तो शायद इसी मानसिकता की ओर इशारा कर रहे हैं.
दिल वालों की नहीं, गुस्से वालों की है दिल्ली
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दिल्ली के लोगों के पास पैसा भी है, गुस्सा भी है. बस इसे संभाल नहीं पाते हैं. अब क्या करें, महंगी गाड़ियों की स्पीड तो संभलती नहीं, इसे कहां से संभालें?
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