
एलीट स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (SFF) न सिर्फ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम करने में शामिल रही है बल्कि इसे बांग्लादेश मुक्ति युद्ध और करगिल युद्ध के दौरान भी तैनात किया गया था. इसके अलावा कश्मीर और पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी इसने अलग नामों से हिस्सा लिया.
इस सीक्रेट यूनिट, जिसमें भारतीय अधिकारियों के नेतृत्व में तिब्बती शामिल हैं, का नाम हाल में सुर्खियों में आया जब इसका एक कमांडो पैंगोंग लेक के पास बारूदी सुरंग विस्फोट में शहीद हो गया. हाल के वर्षों तक इस यूनिट के बारे में अधिक कुछ नहीं पता था. लेकिन इंडिया टुडे ने हाई एल्टीट्यूड वाले योद्धाओं की इस यूनिट के अस्तित्व में आने से लेकर उनकी शौर्य गाथा को दो पार्ट की सीरिज में ट्रैक किया.
पहले पार्ट में हमने जाना कि कैसे तिब्बत में चीन के क्रूर दमन की वजह से SFF का जन्म हुआ और कैसे इसे भारतीय और अमेरिकी फोर्सेज की ओर से ट्रेंड किया गया.
दूसरे पार्ट में इस एलीट यूनिट के गुरिल्लाओं के हम उस पराक्रम पर गौर करेंगे जो वो भारत में शांति भंग करने की कोशिश करने वाले आतंकवादियों और देशविरोधी तत्वों के खिलाफ दिखाते रहे हैं.
70 के दशक के मध्य में, SFF कमांडोज को पैरा जंपिंग की फ्रीफॉल टैक्नीक का प्रशिक्षण दिया गया. समय बीतने के साथ, SFF बटालियन ने सीधे भारतीय सेना के तहत सेवा देना शुरू कर दिया.

माउंटेन वॉरफेयर में इन योद्धाओं की दक्षता और ज्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑपरेशन्स के लिए सुगमता को देखते हुए, SFF यूनिट्स को सियाचिन ग्लेशियर पर नियंत्रण के लिए 1984 ऑपरेशन मेघदूत में शामिल किया गया. उन्हें दक्षिणी ग्लेशियर क्षेत्र में नियंत्रण रेखा के साथ तुर्तुक में भी तैनात किया गया था. कुछ पाइंट्स पर, SFF का 'विकास रेजिमेंट' और इसकी बटालियनों का 'विकास बटालियन' के तौर पर जिक्र किया गया है. आज की स्थिति में एक विकास बटालियन सियाचिन में स्थायी रूप से तैनात है.
SFF ने 1999 के करगिल युद्ध के दौरान भी एक अहम रोल निभाया. तब इसकी पांचवीं बटालियन को 102 इन्फेंट्री ब्रिगेड में शामिल किया गया. सियाचिन के अलावा, यह ब्रिगेड चोरबत ला से श्योक नदी (सब-सेक्टर वेस्ट) और तुर्तुक से दक्षिणी ग्लेशियर (सब-सेक्टर हनीफ) के 10 किमी दक्षिण-पूर्व के क्षेत्रों की रक्षा के लिए जिम्मेदार थी., युद्ध के दौरान अन्य इंफैंट्री बटालियन्स के साथ युद्ध के दौरान विकास रेजिमेंट टीम के इस्तेमाल किए जाने के स्पष्ट सबूत मौजूद हैं.

इस बात की भी संभावना है कि तिब्बती सीमा के सामने पूर्वोत्तर के कुछ संवेदनशील इलाकों में SFF बटालियन तैनात हैं.
आतंक विरोधी ऑपरेशन्स
90 के दशक के मध्य में, कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में जब तेजी आई तो एक यूनिट के किसी जवान के हताहत होने की स्थिति में भारतीय अखबारों में उसके सम्मान में छपे विज्ञापनों में यूनिट का नाम 22 SF या 22 स्पेशल फोर्स दिया गया होता था. गौर करने लायक बात ये है कि उस समय या अब भी भारतीय सेना में इस नाम से कोई यूनिट नहीं है. तो, यह क्या था?
तो ये क्या था?
यह एक ऐसा संगठन था जिसके बारे में सेना के भीतर भी अधिक जानकारी नहीं थी. जबकि यह भारतीय सेना कार्मिकों की ओर 100 प्रतिशत भर्ती वाला था, तब भी यह सेना के नियंत्रण में नहीं था! यह विशेष ग्रुप था, जिसे बस SG के रूप में जाना जाता था.
यदि SSF को एक पहेली कहा जाए तो जो SG के अस्तित्व बारे में तो और भी बहुत कम लोगों को ही जानकारी थी.
1970 के दशक के दौरान, विमान अपहरण, बमबारी, बंधक बनाने जैसी घटनाओं के साथ वैश्विक स्तर पर आतंकवाद चरम पर था. इजरायली एथलीटों के म्यूनिख ओलंपिक हत्याकांड ने देशों को आतंकवाद विरोधी अभियानों में स्पेशल यूनिट्स की आवश्यकता का एहसास कराया.
1980 में तेहरान में अपने दूतावास में बंधकों को रिहा करने में नाकाम रहे अमेरिकी अभियान के कारण अमेरिका में डेल्टा फोर्स का जन्म हुआ. इस बीच, ब्रिटिश स्पेशल एयर सर्विस (SAS) ने ‘Operation Nimrod’ को कामयाबी से अंजाम देकर लीडिंग स्पेशल फोर्स के तौर पर अपनी साख बनाई. इस ऑपरेशन के दौरान उन आतंकियों को न्यूट्रलाइज (5 आतंकी मारे गए और एक पकड़ा गया), जिन्होंने लंदन स्थित ईरानी दूतावास में लोगों को बंधक बना लिया था. था.
भारत में भी इसी तरह के क्रैक काउंटर-टेरेरिज्म और होस्टेज रेस्क्यू (CT/HR) फॉर्मेशन के गठन की आवश्यकता महसूस की गई. हालांकि, एक नई यूनिट खड़ी करने के लिए भारतीय सेना के साथ काम करने या तीन पैरा कमांडो बटालियन्स (1,9 और 10) में से एक को बदलने की जगह एक नई यूनिट को महानिदेशक (सुरक्षा) के तहत स्थापित किया गया.
भ्रम से बचने के लिए इस यूनिट को 4 विकास कहा गया. इसका असली नाम स्पेशल ग्रुप था. हालांकि, यह ग्रुप अन्य विकास बटालियनों से अलग था क्योंकि इसमें 100 फीसदी भारतीय सैनिक और अधिकारी शामिल थे.
इजरायल के विशेष बलों के साथ प्रशिक्षण के लिए कुछ अधिकारियों को इजरायल भेजा गया. फिर उन्होंने बाकी पूरी यूनिट को ट्रेंड किया. यूनिट में चार स्क्वाड्रन शामिल हैं और प्रत्येक स्क्वाड्रन में चार सैनिक हैं.
कुछ ऑपरेशन्स जिनके बारे में माना जाता है कि उनमें SFF शामिल थी, असल में वो SG की ओर से किए गए. उदाहरण के लिए, ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान, एक SG टीम को सैन्य कार्रवाई में भाग लेने के लिए भेजा गया था. SG और 1 पैरा (SF) (तब 1 पैरा कमांडो या 1 पैरा Cdo के रूप में जाना जाता था) की एक साझा टीम ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के शुरुआती चरण का नेतृत्व किया.
ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले भी, SG की ओर से गोल्डन टैंपल परिसर के अंदर मौजूद खालिस्तानी अलगाववादियों के नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले को न्यूट्रलाइज करने या पकड़ने के मकसद से कार्रवाई की प्लानिंग की गई थी.
जब SG की कल्पना की गई, तो इसे पूरे भारत के लिए ऐसे एलीट फोर्स के तौर पर देखा गया जो ब्रिटिश SAS की तर्ज पर सभी CT/HR ऑपरेशन्स के लिए जिम्मेदार रहे. लेकिन ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद, गृह मंत्रालय के तहत एक नया CT/HR फोर्स बनाया गया जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) के रूप में जाना जाता है. NSG का कोर SG से आया है.
जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके बॉडीगार्ड्स ने हत्या कर दी गई तो एसजी को अगले प्रधानमंत्री और मृतक पीएम के परिवार को सुरक्षा देने के लिए SG को नियुक्त किया गया. जब जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद ने सिर उठाया, तब SG को वहां भी तैनात किया गया. यहीं पर 22 SF का जन्म हुआ था.
इस अवधि के दौरान, भारतीय सेना के पास केवल 4 पैरा (SF) बटालियन्स थीं, जिनके नाम 1, 9, 10 और 21 थे. अब, चूंकि ओबिचुएरी इसके सही नाम से नहीं दी जा सकती थीं, इसलिए कहानी यह है कि 21 पैरा (SF) की निरंतरता में 22 SF डेजिगनेशन गढ़ा गया. यह नाम रह गया और यहां तक कि औपचारिक पुरस्कार सूची में भी 22 SF/SG को आगे बढ़ाया गया.
SG के भीतर सभी अधिकारी/जवान भारतीय सेना से हैं, जिनमें से कई पैरा (SF) और पैराशूट बटालियन से ताल्लुक रखते हैं. हालांकि, बड़े सेलेक्शन नेट के सात इसमें अन्य रेजिमेंट्स और आर्म्स के अधिकारी और जवान भी शामिल हैं. ये डेप्युटेशन पर SG के साथ सर्विस करते हैं और उसके बाद, अपनी मूल यूनिट या रेजिमेंट में वापस आ जाते हैं.
खुफिया सेट-अप का हिस्सा होने के कारण, यह कहा जाता है कि यूनिट के पास नवीनतम हथियारों तक पहुंच है और इसे पैरा (SF) बटालियन जैसे आपूर्ति में नौकरशाही वाली देरी का सामना नहीं करना पड़ता. इसके अलावा, रॉ के एविएशन रिसर्च सेंटर (एआरसी) के जरिए शॉर्ट नोटिस पर भी इसे विभिन्न गतिविधियों के लिए एयर ट्रांसपोर्ट तक पहुंच हासिल है.
1975 में, एक रूल बनाया गया जिसके तहत तिब्बतियों को भारत-तिब्बत सीमा के 10 किलोमीटर के भीतर नहीं रखा जा सकता था. इसका कारण तिब्बती टीमों की ओर से कुछ क्रॉस बॉर्डर एक्शन्स थे, जिसमें चीन के साथ फायरफाइट में उलझना भी था. हालांकि, पूर्वी लद्दाख में चीनियों के साथ सीधे टकराव में SFF ट्रूप्स के इस्तेमाल की हालिया ख़बरों से लगता है निश्चित रूप से इस रूल को बहुत पहले ही खत्म कर दिया होगा.
लंबे समय से, भारतीय सेना SFF को अपने पूरे ऑपरेशनल कंट्रोल में लेने पर जोर दे रही है जिससे ऐसे अहम ऐसेट का इस्तेमाल और बेहतर तालमेल किया जा सके. जैसा कि है, कुछ विकास बटालियन हमेशा सेना के ऑपरेशनल कंट्रोल में में होती हैं, SFF के महानिरीक्षक सेना के मेजर जनरल होते हैं और इसका सपोर्टिंग स्टाफ और अधिकारी भी सेना के होते हैं.
SG के लिए भी यही बात है. सेना के 100 प्रतिशत कर्मचारी होने के बावजूद, यह सेना के नियंत्रण के दायरे से बाहर है. नए आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल ऑपरेशन्स डिविजन (AFSOD) को लेकर उपलब्ध सामग्री से पता चलता है कि इसका अधिकार क्षेत्र तीनों सेवाओं के स्पेशल फोर्सेज तक विस्तृत होगा. SG अभी भी सशस्त्र बलों के नियंत्रण से दूर रहना जारी रखेंगे. इसके कार्य और उद्देश्य रहस्य बने रहेंगे.
(नई दिल्ली से रोहित वत्स की रिपोर्ट)